डॉ दिलीप अग्निहोत्री
मक्का मस्जिद बम विस्फोट के आरोपी न्यायपालिका से बरी हुए। लेकिन हिन्दू आतंकवाद से कांग्रेस का बरी होना आसान नहीं है। यह बात अलग है कि न्यायिक निर्णय के साथ ही हिन्दू आतंकवाद का कांग्रेसी अविष्कार भी बेमानी साबित हुआ। लेकिन इससे कांग्रेसी अपराध का निराकरण नहीं हो सकता। उनके नेताओं के इस संबन्ध में बयान रिकॉर्ड पर है। इनमें से किसी ने भी इन बयानों के लिए अभी तक माफी नहीं मांगी है। कांग्रेस के प्रवक्ता जरूर आगे आये है। लेकिन उनके बयान इस प्रकार के है जैसे यूपीए सरकार के मंत्री सचिव के इशारों पर चलते थे। उनका अपना कोई नजरिया नहीं था। इस प्रकार कांग्रेस यह बताना चाहती है कि उस समय आर के सिंह गृह सचिव थे। वह इस समय भाजपा के सांसद और केंद्र सरकार में राज्य मंत्री है। लेकिन इस बात से यूपीए सरकार के वह मंत्री बरी नहीं हो सकते, जिन्होंने सार्वजनिक तौर पर हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग किया था। सचिव को इसके लिए दोषी नहीं कहा जा सकता न सार्वजनिक तौर पर उसकी जबाबदेही होती है। कांग्रेस प्रवक्ताओं को यह भी बताना चाहिए कि क्या वह पूर्व कोयला सचिव को भी सही मानते है। जिन्होंने कहा था कि कोयला घोटाले की जानकारी तत्कालीन प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह को थी। सचिव ने आवंटन नीति में बदलाव का सुझाव दिया था, जिसे सरकार ने नहीं माना।दूसरा तर्क दिया जा रहा है कि अरुण जेटली ने नरेंद्र मोदी के पक्ष में ध्रुवीकरण की बात कही थी। इसकी जानकारी विकीलीक्स ने दी थी। इस बात का जबाब अरुण जेटली दे सकते है। लेकिन बात में व्यवहारिक तथ्य है। यूपीए ने वोटबैंक के लिए जैसा ध्रुवीकरण किया था, अनेक क्षेत्रीय पार्टियां भी इस होड़ में शामिल थी, उसकी प्रतिक्रिया तो होनी ही थी। महत्वपूर्ण यह है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार ने चार वर्षों में किसी के साथ भेद भाव नहीं किया है। मक्का बम ब्लास्ट के आरोप में गिरफ्तार लोगों के विरुद्ध तीन वर्ष तक तक कोई आरोप पत्र दाखिल नहीं किया जा सका। जबकि केंद्र और संबंधित राज्य में उस समय कांग्रेस की सरकार थी।
जाहिर है कि कथित आरोप के पुख्ता आधार नहीं थे। लेकिन हिन्दू आतंकवाद का ऐलान कर दिया गया। यहां कांग्रेस के इतिहास की चर्चा आवश्यक नही है। लेकिन कुछ ही समय के अंतराल पर एक संयोग सामने आया है। कुछ दिन पहले कर्नाटक की कांग्रेसी सरकार ने लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया था। यह निर्णय हिन्दू धर्म को बांटने वाला था। अब न्यायिक निर्णय के बाद हिन्दू आतंकवाद का मसला भी सामने आ गया। सवाल यह है कि कांग्रेस का हिन्दू धर्म के बारे में नजरिया क्या है।
क्या उसके नेता किसी अन्य मजहब के साथ आतंकवाद शब्द लगाने का साहस कर सकते है। तब तो यह कहा जाता है कि आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता। मतलब कांग्रेस के हिसाब से आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, इसके बाबजूद हिन्दू आतंकवाद होता है। दूसरी बात यह कि क्या कांग्रेस की सरकार किसी अन्य धर्म में विभाजन की कल्पना कर सकती है। करनी भी नहीं चाहिए। यह सब किसी राजनीतिक पार्टी या सरकार का कार्य नहीं हो सकता। उनको यह अधिकार नहीं है। प्रत्येक धर्म के लोग ही अपने धार्मिक विषयों पर निर्णय के अधिकारी है। लेकिन कांग्रेस की सरकार ने दुस्साहस किया। कर्नाटक में लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा दिया।
मतलब कांग्रेस अपनी मर्जी से कभी हिन्दू आतंकवाद शब्द चला देगी, कभी हिन्दू धर्म में विभाजन कर देगी। बटाला पर आँखे नम हो जाती है। राजनीति में चुनावी समीकरण बनाने में कोई पार्टी पीछे नहीं रहती। लेकिन इसकी भी एक सीमा होनी चाहिए। समीकरण के लिए हिन्दू आतंकवाद शब्द का प्रयोग, लिंगायत को अलग धर्म का दर्जा देना आपत्तिजनक है।
विकिलीक्स की एक केबल के अनुसार पूर्व अमेरिकी राजदूत टिमोथी जे. रोएमर ने अपने विदेश मंत्रालय को लिखे एक पत्र में राहुल के बयान का हवाला दिया था, जिसमें उन्होंने हिंदू आतंकवाद की बात कही थी। टिमोथी के हस्ताक्षर वाले टेलिग्राम में राहुल से बात का जिक्र किया गया था। तीन अगस्त दो हजार नौ को भेजे इस टेलिग्राम में रोएमर ने लिखा था, ‘हम राहुल गांधी और अन्य युवा सांसदों से बातचीत कर रहे हैं और इसके निष्कर्ष को भेज रहे हैं।’ राहुल ने हिन्दू आतंकवाद को लश्कर तैयबा से ज्यादा खतरनाक बताया था। तत्कालीन केंद्रीय गृहमंत्री पी. चिदंबरम ने सबसे पहले भगवा आतंकवाद का जिक्र किया था। उन्होंने कहा था, ‘देश के कई बम धमाकों के पीछे भगवा आतंकवाद का हाथ है। भगवा आतंकवाद देश के लिए नई चुनौती बनकर उभर रहा है।’ दो हजार तरह में तत्कालीन केंद्रीय गृह मंत्री सुशील कुमार शिंदे ने भी जयपुर में कांग्रेस के चिंतन शिविर में ‘हिंदू आतंकवाद’ शब्द का इस्तेमाल किया था।
जब कांग्रेस के सबसे प्रभावशाली नेता राहुल गांधी और यूपीए सरकार के सबसे प्रभावी मंत्री पी चिदंबरम और सुशील कुमार शिंदे एक जैसे आरोप लगा रहे हो, तो उसका क्या उद्देश्य हो सकता है। भाजपा और संघ पर तो उनका हमला अनवरत जारी रहता है । इसे प्रजातन्त्र का अधिकार माना जा सकता है। लेकिन हिन्दू या भगवा शब्द का ऐसा नकारात्मक प्रयोग घृणित है। .लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं







