जी के चक्रवर्ती
भारतीय ज्ञान परंपरायें, उसके ग्रंथ एवं ज्ञानार्जन के लिए विकसित की गई व्यवस्था एवं विद्या प्राप्ति के साधनों में आश्रम एवं गुरुकुल प्रणाली जैसी व्यवस्थायें का सामान्य परिचय भी प्रकृति एवं हम मनुष्यों के मध्य अति संवेदनशील संबंधों को न केवल उजागर करता है, वल्कि उसे हम मनुष्यों के कल्याण हेतु बनाए रखने का उत्तरदायित्व भी हम मानवों को स्पष्ट रूप से सौंपा है। हम लोग अपने निजी स्वार्थ में अंधे होकर इन संबंधों के महत्व को धीरे-धीरे धूमिल करते चले गए जिसके परिणामस्वरूप हम मनुष्यों ने प्रकृति का शोषण जम कर करते रहे और यह आज भी बदस्तूर जारी है।हमने प्रकृति का अंधा-धुंध दोहन करने से आगे भविष्य में उससे होने वाले क्षति की ओर से मुँह मोड़कर उसे उस स्तर तक पहुंचा दिया जहां से उसकी क्षतिपूर्ति कर पाना लगभग असंभव सा हो गया है। भारत की ज्ञानार्जन की परंपराओं में प्रकृति का विशेष प्रभाव होने से उसके अधिकतर प्राचीन ग्रंथों में प्रकृति एवं हम मनुष्यों के मध्य के आवश्यकताओं एवं संबंधों को दर्शाया गया है, जिन कारणों से सम्पूर्ण विश्व का हमसे अपेक्षा रखना उचित है कि भारत स्वमं प्रकृति के अनुचित दोहन के मामले में कभी भागीदार नहीं बनेगा, लेकिन देश के स्वतंत्रता प्राप्ति के बाद से जिस प्रकार की प्रगति एवं विकास करने की अंधी दौड़ में पश्चिमी सभ्यताओं को अपनाने की होड़ में हम स्वमं अपने ही द्वारा बनाये गए मान्यताओं एवं नियमों के निर्वाह करने वाले उस उत्तरदायित्व से स्वयं ही विमुख हो गये।
आधुनिकता के चकाचौंध के मकड़जाल में फंस कर हम भारतीयों लोगों ने भी स्वयं वही काम किया जो दुनिया के अन्य लोग कर रहे थे। जिसके परिणामस्वरूप आज सम्पूर्ण दुनिया विनाश के उस चौराहे पर आ खड़ी हुई है जहां से इस स्थिति को संम्भालना असंभव सा प्रतीत होने लगा है। अब वैश्विक स्तर पर भी यह माना जाने लगा कि इस तरह की स्थितियों को बदलने के लिए प्रथम आवश्यकता तो इस बात की है कि प्रकृति एवं पर्यावरण शिक्षा को देश के प्रत्येक व्यक्ति तक पहुंचाना पड़ेगा। जिससे प्रत्येक व्यक्ति की समाज के प्रति जिम्मेदारी तथा परिवार एवं लोगों में अनुशासन एवं मान्यताओं के प्रति बोध उतपन्न करने के साथ ही साथ लोगों के दैनिक क्रिया कलापों में नैतिकता एवं प्रकृति से प्रेम जैसी भावनाओं का समावेश किया जाना चाहिए जिससे उनके भीतर प्रकृति के शोषण करने से पहले हम एक बार सोचने पर मजबूर अवश्य होंगे कि वे कौन से मूल्य एवं कार्य कौशल हैं।
जिनको अपनाकर हम प्रकृति को बिना क्षति पहुचाएं विकास की प्रक्रिया को लगातार जारी रख सके लेकिन इसी के साथ ही हमे यह भी ध्यान देने की आवयश्कता है कि किसी भी सूरत में यह विकास विनाश की ओर न मुड़ जाए! ऐसे वक्त हमारे बुद्धिजीवियों, शिक्षाविदों एवं चिंतकों तथा विभिन्न क्षेत्रों के विद्वानों द्वारा देश के लोगों में ऐसी शिक्षा व्यवस्था की कल्पना को साकार रूप देने की आवश्यकता है जिससे कि विकास एवं प्रगति की सतह को एक सुदृढ़ एवं समुचित आधार मिल सके इसके साथ ही साथ प्राचीन भारतीय मनीषियों द्वारा हमारे समाज के लिए जो साहित्य दर्शन छोड़ा गया है, उसका पुनरूचिंतन एवं अध्ययन करने की आवश्यकता है। हमारे प्राचीन भारतीय साहित्य दर्शन आज भी उतना ही महत्व रखता है जिसे विश्वव्यापी सोच एवं चर्चा में लाने के लिए प्राचीन भारतीय सभ्यता एवं संस्कृति के उन सभी तरह के तत्वों के अंतर्निहित महत्व को हम सभी को समझना पड़ेगा अब वह समय आ गया है कि हम पेड़-पौधे, जीव-जंतुओं, नदियों-पहाड़ों-जंगलों को देवत्व स्वरूप देखे जाने की आवश्यकता है।
मौजूदा समय में देश के लोगों को नई शिक्षा नीति के सामने आने एवं उसके लागू होने की उत्सुकतापूर्वक प्रतीक्षा है। नई शिक्षा नीति के लागू होने में और कितना वक्त और लगेगा यह तो कह पाना मुश्किल है, लेकिन शिक्षा के क्षेत्र में विशेषतः राष्ट्रीय एवं अंतरराष्ट्रीय स्तरों पर बहुत कुछ नया करने की आवश्यकता बहुत लम्बे अर्से महसूश की जा रही थी।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने वर्ष 2015 के बाद का विकास एजेंडा’ स्वीकृत होने के समय सतत विकास लक्ष्य-2030 को स्वीकार किया। इसमें चौथे लक्ष्य के रूप में शिक्षा को शामिल किया गया था, ‘समावेशी एवं न्यायसंगत गुणवत्ता युक्त शिक्षा की उपलब्धता देश के सभी लोगों के लिए सुनिश्चित करने के साथ सभी को सीखने का पूर्ण अवसर देगा।’
वर्तमान समय लगभग सभी अभिभावकों को निजी स्कूलों द्वारा लगातार मनमानी फीस वसूलने के बढ़ते शोषण का सामना करना पड़ रहा है। अनेक राज्य सरकारें इन पर नियंत्रण करने के लिए नियम बनाने की घोषणा करती हैं, लेकिन जमीनी धरातल पर उनका पालन होना, करा पाना लगभग असंभव ही पाया गया है। कारण स्पष्ट है- अभिवभावकों के पास कोई विकल्प मौजूद नहीं है, सरकारी एवं सहायता प्राप्त स्कूलों की स्थिति सुधारने के लिए कोई सुनियोजित एवं ठोस प्रयास अभी तक शुरू नहीं हुए हैं। क्योकि प्राथमिक स्कूली शिक्षा का महत्व अब माता-पिता अभिभावक अच्छी तरह समझते हैं सही प्राथमिक शिक्षा इन सरकारी स्कूलों में उपलब्ध न होना भी उन्हें निजी स्कूलों की ओर जाने के लिए मजबूर करता है। इसका सीधा संबंध स्कूल शिक्षा की गुणवत्ता से जुड़ता है। सभी के लिए कौशल प्रशिक्षण एवं व्यावसायिक शिक्षा की उपलब्धता का प्रबंध करना पाना एक ऐसा आवश्यक लक्ष्य है जिसका कोई भी विकल्प मौजूद है ही नहीं! कौशलों में देश के बच्चों की रुचि का विकास तो प्रारंभिक स्तर से ही प्रारम्भ हो जाना चाहिए जिसके फायदे इन बच्चों के भविष्य में होंगे।







