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    विकसित देशों की सीमित सोच

    By July 4, 2018 Current Issues No Comments6 Mins Read
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    डॉ दिलीप अग्निहोत्री
    विकसित देशों की सीमित सोच एक बार फिर खुल कर सामने आ गई है। इनके द्वारा विश्व में व्यापार युद्ध का माहौल बनाया जा रहा है। यह शीत युद्ध का नया अध्याय साबित हो सकता है। इसमें  अंततः सभी को नुकसान उठाना होगा। कनाडा, चीन, अमेरिका, रूस, ने व्यापार के क्षेत्र में मोर्चाबंदी शुरू कर दी है।
    कनाडा में बारह अरब डॉलर से अधिक के अमेरिकी इस्पात, एल्युमीनियम और टिकाऊ उपभोग की वस्तुओं पर शुल्क लागू होगा। प्रधानमंत्री जस्टिन ट्रूडो ने कहा अमेरिका द्वारा लगाए गए शुल्क के बाद कनाडा के पास जवाबी कदम उठाने के अलावा कोई विकल्प नहीं बचा था। कनाडा की शुल्क सूची में ढाई सौ से अधिक अमेरिकी उत्पाद शामिल है।
    महाशक्ति बनाने की चाहत में चीन अनेक देशों में भारी निवेश कर रहा था। अब ट्रेड वार के तहत वह इनसे अलग हो रहा है। तोड़कर अपनी ताकत बढ़ाने के लिए पिछले 5 साल में किए गए अंधाधुंध निवेश से चीन ने अचानक हाथ खींचने शुरू कर दिए हैं। ये निवेश एशिया, अफ्रीका में कर्ज के रूप में किया गया था। इनमें से अनेक परियोजनाएं चीन की महत्वाकांक्षी बेल्ट एंड रोड योजना से इन देशों के जुड़ने पर हुए समझौते के तहत चलाई जा रही थीं। चीन मन्दी की चपेट में आ रहा है। विकसित देशों का का यह विवाद जी सेवन की शिखर बैठक में भी सामने आ गया था। विकसित देशों के संघठन से एक महारथी पहले ही कम हो गया था। इसलिए इसको जी-एट से जी सेवेन नाम देना पड़ा था अमेरिका, फ्रांस, ब्रिटेन जर्मनी, इटली, जापान और कनाडा इसके सदस्य है। अब इस पर संकट के बादल है। कनाडा में आयोजित हुआ शिखर सम्मेलन कटुता और विवाद के बीच समाप्त हुआ। यह सम्मेलन किसी उपलब्धि के लिए नहीं बल्कि बाकायदा झगड़े के लिए याद किया जाएगा। विश्व ने शिखर स्तर पर होने वाले शब्द युद्ध को भी दिलचस्पी से देखा।
    अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने कनाडा के प्रधानमंत्री ट्रूडो को झूठा और बेईमान बताया, युवा ट्रूडो भी पीछे क्यों रहते, उन्होंने ट्रम्प को खरी खोटी सुनाई। नौबत यहां तक पँहुची की इतने महत्वपूर्ण संघठन के शिखर सम्मेलन का कोई साझा बयान जारी नहीं हुआ। डोनाल्ड ट्रम्प सम्मेलन को बीच में छोड़ कर सिंगापुर चले गए। जहाँ उनकी उत्तर कोरिया के तानाशाह से वार्ता होनी थी। ट्रम्प अपने निर्धारित समय से बहुत पहले यहां पहुंच गए। क्योकि कनाडा सम्मेलन में वह निर्धारित समय तक नही रुके थे। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर जी सेवेन से ज्यादा चर्चा शंघाई सहयोग संघठन के शिखर सम्मेलन को मिली।
    उधर कनाडा में साझा बयान पर हस्ताक्षर करने से ट्रम्प ने इनकार कर दिया। उनका कहना था कि कनाडा और पश्चिमी यूरोपीय मुल्क अमेरिकी किसानों, श्रमिको और कम्पनियों पर भारी टैक्स लगा रहे है। जबकि कनाडा के प्रधानमंत्री ने कहा था कि अमेरिका मैक्सिको से आयात होने वाले स्टील और एलुमिनियम पर लगाये गए शुल्क के बदले में अमेरिकी उत्पाद पर एक जुलाई से शुल्क लगाया जाएगा। ट्रम्प इसी बात से नाराज थे। वैसे इस विवाद पर फ्रांस की टिप्पणी स्वागत योग्य है। उसने कहा कि अंतरराष्ट्रीय सहयोग को क्रोध और टिप्पणियों से नहीं चलाया जा सकता। ट्रूडो ने भी उचित समझदारी नहीं दिखाई।
    उन्होंने कहा कि कनाडाई सभ्य और ज़िम्मेदार होते हैं, लेकिन आप उन्हें चौतरफा परेशान नहीं कर सकते हैं। ट्रूडो के जवाब में अमरीकी राष्ट्रपति ट्रंप कहा कि कनाडाई प्रधानमंत्री ने गलत बयान दिया है। ट्रंप ने कहा कि अमरीका इसकी साझा वार्ता में शामिल नहीं होगा। व्यापार नियमों, पर्यावरण, ईरान और रूस के इसमें पुन: प्रवेश के मुद्दों पर शुरुआती बैठक में ही अमेरिका और जी सेवेन के बाकी देशों के बीच गंभीर मतभेद पैदा हो गए। रूस को पुनः शामिल करने के मुद्दे पर तो शुरू में ही मतभेद हो गए थे। ट्रम्प चाहते थे कि रूस को शामिल किया जाए। लेकिन अन्य देश इससे सहमत नहीं थे। उनका कहना था कि रूस को यूक्रेन में लोकतंत्र की रक्षा करनी चाहिए।
    वस्तुतः इस सम्मेलन में ऐसा कोई मसला नहीं था, जिसका वार्ता के माध्यम से समाधान निकालना संभव नहीं था। लेकिन अक्सर शीर्ष स्तर पर अहम का टकराव भी किसी समाधान तक पहुंचने नहीं देता। स्वार्थ की संकुचित सोच भी परेशानी उतपन्न करती है। इस शिखर सम्मेलन में ये दोनों बात देखी गई। यहाँ अहम का टकराव भी था और निहित स्वार्थ भी थे।
    इस संघठन में सभी विकसित देश है। धनी होने के कारण इनकी जिम्मेदारी भी अधिक है। लेकिन विश्व की कुछ जटिल समस्यायों के प्रति इनकी लापरवाही अनुचित है। इस्लामिक आतंकवाद और पर्यावरण को लेकर इन्हें कोई  साझा रणनीति बनानी चाहिए। लेकिन इनकी चिंता स्टील और एलयूमिनींम पर शुल्क तक दिखाई दी। यह सम्मेलन का सबसे बड़ा संकट बन गया। अमेरिकी बाजार में जर्मन व कनाडाई कार कंपनियों का दबदबा है। पहले बताया गया था कि प्रस्ताव से सहमत हैं, लेकिन बाद में प्रशासनिक अधिकारी ने उन्हें बताया कि ट्रूडो के बयान ने ट्रंप को गुस्सा कर दिया है। ट्वीट में उन्होंने उसे खारिज कर दिया है।
    ट्वीट से पहले एक प्रेस वार्ता में ट्रूडो ने कहा था कि स्टील व एल्युमीनियम के आयात पर लगाए कर के मामले में ट्रंप का रवैया कनाडा के उन बुजुर्गो का अपमान है जो पहले विश्व युद्ध में उसके साथ खड़े हुए थे। उन्होंने यहां तक कहा कि कनाडा के लोग किसी सूरत में पीछे हटना बर्दाश्त नहीं करेंगे। व्हाइट हाउस से अमेरिका के आर्थिक सलाहकार लैरी कुडलॉ ने कनाडा पर पीठ में छुरा मारने का आरोप लगाया। उनका कहना था कि अमेरिका हर प्रस्ताव पर सहमत था, लेकिन ट्रूडो ने प्रेस कांफ्रेंस करके अमेरिका पर सीधा हमला कर दिया। इससे ट्रंप को ठेस लगी और उन्होंने प्रस्ताव को खारिज करना का फैसला अचानक ले लिया।
    जाहिर है कि अमेरिकी राष्ट्रपति और कनाडाई प्रधानमंत्री दोनों ने समझदारी से काम नहीं लिया। ट्रूडो ने जब यह कहा कि कनाडा के लोग समझदार होते है, तो उनका अपरोक्ष निशाना ट्रम्प की तरफ था। इसका मतलब था कि अमेरिका के लोग और वहां के राष्ट्रपति समझदार नहीं है। इस प्रकार की टिप्पणी से कटुता बढ़ती है।
    वैसे इस संघठन का स्वरूप भी पूर्ण नहीं है । रूस इससे निलंबित है। भारत और चीन सबसे तेजी से उभरती आर्थिक शक्तियां है। इनके बिना यह संघठन अधूरा है। फिलहाल कहा जा सकता है कि यह सम्मेलन किसी बेहतर परिणाम के लिए नहीं बल्कि संकुचित विचारों और निहित स्वार्थों के लिए याद किया जाएगा।

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