डॉ दिलीप अग्निहोत्री
भारतीय चिंतन व ज्ञान में विश्व कल्याण की कामना समाहित रही है। तलवार के बल पर अपने मत के प्रचार की इसमें कोई अवधारणा ही नहीं है। सबसे प्राचीन सभ्यता में ऐसा एक भी उदाहरण नहीं है। यही वह तत्व थे जिसने भारत को विश्व गुरु पद पर प्रतिष्ठित किया था। सदियों की परतंत्रता में यह गौरव कमजोर हुआ। सवा सौ वर्ष पहले स्वामी विवेकानन्द ने शिकागो में भारतीय संस्कृति के मानवतावादी स्वरूप का उद्घोष किया। यह ऐतिहासिक भाषण शिकागो की पहचान से जुड़ गया। एक सौ पच्चीसवीं जयंती पर शिकागो में विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। अठारह सौ तिरानबे को स्वामी विवेकानंद ने शिकागो में आयोजित विश्व धर्म संसद को संबोधित किया था। इसकी जयंती पर विश्व हिंदू सम्मेलन का आयोजन किया गया। इसमें अस्सी देशों के ढाई हजार से ज्यादा प्रतिनिधि शामिल हुए। भारत के उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू, राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ प्रमुख मोहन भागवत सहित अनेक प्रमुख लोगों ने इस सम्मेलन को संबोधित किया। मोहन भागवत ने सुमनत्रिते सुविक्रांते अर्थत सामूहिक रूप से चिंतन वीरतापूर्वक प्राप्त करें पर विचार व्यक्त किया। उन्होंने ठीक कहा कि हिंदुओं में अपना वर्चस्व कायम करने की कोई आकांक्षा कभी नहीं रही।
हिन्दू समाज में प्रतिभावान लोगों की संख्या सबसे ज्यादा है। लेकिन एकता की भावना का अभाव है। बेहतर समाज की स्थापना के लिए कार्य करने का एकजुट प्रयास होना चाहिए।
तभी मानव कल्याण संभव होगा।
हजारों सालों से हिन्दू प्रताड़ित हुए। मोहन भागवत ने सटीक उदाहरण दिया। कहा कि यदि कोई शेर अकेला होता है, तो जंगली कुत्ते भी उस पर हमला कर अपना शिकार बना सकते हैं। हिंदुओं में अपना वर्चस्व कायम करने की कोई आकांक्षा नहीं है। लेकिन उनका विचार तभी सुना जाएगा ,जब वह शक्तिशाली होंगे।शक्तिशाली तब होंगे जब वह संघठित होंगे। यह सब अपने वर्चस्व के लिए नहीं बल्कि मानवता के कल्याण के लिए करना होगा। भागवत ने कहा भी हिंदू समाज तभी समृद्ध होगा जब वह समाज के रूप में काम करेगा।
पूरे विश्व को एक टीम के तौर पर लाने का महत्वपूर्ण मूल्य अपने अहं को नियंत्रित करना और सर्वसम्मति को स्वीकार करना सीखना होगा। हिंदू हजारों सालों से पीड़ित हैं क्योंकि उन्होंने इसके मौलिक सिद्धांतों और आध्यत्मवाद को भुला दिया। आज उनको ही अपने आचरण में लाने की आवश्यकता है। हिन्दू जीवन शैली, चिंतन और दर्शन का अलग रूप है ,तो यह हिंदुओं के जीवन में दिखना चाहिए। तभी विश्व के लोग इसके महत्व को स्वीकार करेंगे। तभी विश्व को नफरत, आतंकवाद, हिंसा से मुक्ति मिलेगी। हिन्दू तो कीड़ों को भी जीवन का अधिकार देता है। हिन्दू जीवन संस्कृति सार्वजनिक मूल्य बन गए हैं। प्रत्येक परिस्थितियों में भारत आध्यात्मिक गुरु की तरह हैं।
इसी संस्कार को सदैव याद रखना चाहिए। हिंदुओं को यह कठिन कार्य करना है। इस सम्मेलन में आर्थिक, शैक्षणिक, मीडिया, सांगठनिक, राजनीतिक, महिलाओं और युवाओं से जुड़े मुद्दों पर सत्र का आयोजन किया गया। यह सम्मेलन हिंदुओं को आपस में जोड़ने, विचारों का आदान-प्रदान करने का व्यापक अवसर था। यह प्रयास सार्थक रहा। तीन वर्ष पहले संयुक्त राष्ट्र संघ ने अंतरराष्ट्रीय योग दिवस की घोषणा की थी। भारतीय संस्कृति के प्रति लोगों की जिज्ञाषा बढ़ रही है।
उपराष्ट्रपति वेंकैया नायडू ने यही सब बात बड़े रोचक ढंग में प्रस्तुत की। उन्होंने कहा कि हम नाग पंचमी पर सांप को दूध पिलाते हैं जबकि कई बार सांप हमें काट लेता है। हम चींटी को चीनी खिलाते हैं जबकि कई बार चींटी भी हमें काट लेती है। पशु-पक्षी सहित सबको साथ लेकर चलना और सबका ख्याल रखना हिंदू की पद्धति है। भारत अकेला ऐसा देश है, जिसने सभी धर्मों को उनके वास्तविक रूप में स्वीकार किया। एक समय में भारत को विश्व गुरु माना जाता था। हमारे संस्कृति में महिलाओं को इतना सम्मान दिया जाता है कि देश में सारी नदियों का नाम महिलाओं के नाम पर है। यहां तक कि हम लोग देश को पितृभूमि नहीं मातृभूमि कहते हैं।
आज विश्व में कहीं हिंसा हो रही है, कहीं उपभोगवादी संस्कृति ने लोगों के सामने संकट उत्त्पन्न किया है। मानवता के कल्याण हेतु शांति सौहार्द का होना आवश्यक है। यह संस्कार भारत से ही मिल सकता है। शिकागो से यही सन्देश दिया गया।







