आशीष बिन्दलकर
बिहार में दो साल पहले हुई शराबबंदी के सकारात्मक और उत्साहजनक नतीजे दिखने लगे हैं। राज्य की महिलाओं की जिंदगी संवरने लगी हैं और परिवार में उन्हें सम्मान की नजरों से देखा जाने लगा हैं। जिन पैसों से कभी शराब खरीदी जाती थी अब उन्हीं पैसों से महिलाओं के लिए महंगी साड़ियां ली जा रही हैं। घरों में शराब की जगह दूध, दही, लस्सी और पनीर का सेवन बढ़ गया है और ये सब पिछले छह महीनों में हुआ है।
एशियाई विकास अनुसंधान संस्थान (एडीआरआई) और सरकारी वित्त पोषित संस्था (डीएमआई) की ओर से किए अध्ययन में ये तथ्य उजागर हुए हैं। शोध बताता है कि 19 प्रतिशत परिवारों ने शराब पर पैसे न खर्चकर प्रॉपर्टी खरीदी। एडीआरआई की रिपोर्ट बताती है कि महंगी साड़ियों में बेतहाशा बिक्री दर्ज की गई, जो 1751 प्रतिशत थी। इसी तरह 910 प्रतिशत महंगे कपड़े और 46 प्रतिशत प्रॉसेस्ड फूड की बिक्री हुई। उधर डीएमआई के अपने एक अन्य अध्ययन ‘शराबबंदी के अर्थव्यवस्था पर पड़े ठोस प्रभाव’ में भी खुश करने वाली चीजें मौजूद हैं।
इसमें कहा गया है कि शराब पर रोक लगने के बाद परिवारों में प्रति सप्ताह खर्च 1005 से बढ़कर 1331 रुपये हो गया। ये अंतर बताने को काफी है कि किस तरह शराबबंदी के बाद बिहार में सामाजिक आर्थिक परिवर्तन की सुखद बयार बहने लगी है। बता दें कि डीएमआई ने शोध में राज्य के पांच जिलों नवादा, पूर्णिया, समस्तीपुर, पश्चिम चंपारण और कैमूर के 2,368 परिवारों को शामिल किया था।
बिहार में नीतीश कुमार सरकार ने साल 2016 में राज्यभर में शराबबंदी कराई थी। उस वक्त पंजाब एवं हरियाणा और हिमाचल प्रदेश का हवाला देकर कहा जाता था कि देश के बेहद पिछड़े राज्य में शराबबंदी लागू करना नामुमकिन है। ऐसा लगने भी लगा था। शराबमाफियाओं ने अन्य पड़ोसी राज्यों से शराब मंगानी शुरू की तो बिहार की नीतीश सरकार ने सख्ती दिखाते हुए उनके मंसूबों पर पानी फेर दिया। मुझे याद है कि मैं उस वक्त ‘दैनिक हिन्दुस्तान’ की गोरखपुर शाखा में अपकंट्री एडिशन देख रहा था।
देवरिया और कुशीनगर से अक्सर ऐसी खबरें आया करती थीं कि बिहार से रोजाना सैकड़ों लोग सब्जी और घरेलू उपयोग का सामान खरीदने आ रहे हैं। ये चार पहिया वाहनों से देर शाम आकर इन जिलों में मदिरापान कर लुत्फ उठाते और रात में चले जाते। बता दूं कि देवरिया और कुशीनगर बिहार से सटे उत्तर प्रदेश के जिले हैं और यहां किसी तरह शराब पर कोई पाबंदी नहीं हैं। चोरी छिपे इन पड़ोसी जिलों से कुछ हद तक शराब की तस्करी भी हुई, लेकिन इस तरह जुगाड़ से लाई गई शराब से कुछ रसूखदारों और ऊंची पहुंच के लोगों का ही गला तर हो पाता था। बाकी साधारण किस्म के लोग शराब की तलब में अलग तरह के नशे करने लगे।
उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल के जिलों में उन दिनों देशी दारू की भट्टियों में देशी शराब का उत्पादन अचानक बढ़ गया। बिहार से सटे यूपी के सीमावर्ती गांवों में रातों रात देशी दारू की ढेरों भट्टियां खुल गईं। पूर्वांचल में देशी दारु को आम बोलचाल में ‘कच्ची’ भी कहा जाता है। यहां से बनी ‘कच्ची’ की सप्लाई बिहार में चोरी छिपे की जाने लगी। बाद में गांव की महिलाओं की शिकायत पर पुलिस ने दिखावे के लिए ही सही कच्ची की भट्टियों पर छापे डाले और उन्हें तहस नहस किया। ये काम पुलिस ने खुशी खुशी किया होगा, ऐसा आप कतई न समझे। कई गांवों में तो पुलिस के उदासीन रवैए के खिलाफ महिलाओं ने मोर्चा भी खोला। महिलाओं का कहना था कि गांवों में कच्ची के अड्डे खुलने से उनके पति रात में दारू पीकर उनसे मारपीट करते हैं। घर खर्च के पैसे भी नहीं देते। हालत की नजाकत और आला अफसरों के दबाव की वजह से मजबूरन स्थानीय पुलिस को कार्रवाई करनी पड़ी।
गोरखपुर समेत स्थानीय जिलों के अखबारों में पुलिस की इस कार्रवाई को फोटो समेत प्रमुखता से प्रकाशित किया गया। ढेरों कुंतल लहन और ‘कच्ची’ नष्ट करते पुलिसकर्मियों की फोटो छापकर उनके कार्य की सराहना की गई। यहां मजे की बात बता दूं कि पुलिस और आबकारी विभाग की इस कार्रवाई में ‘कच्ची’ का कोई माफिया कभी नहीं पकड़ा गया। मौके पर पुलिस को ‘कच्ची’ की सुलगती भट्टियां, लहन और बनाने में इस्तेमाल की जाने वाली सामग्री ही मिलती थी। न्यूज रूम में अक्सर पुलिसिया कार्यशैली का मैं डेस्क के अन्य साथियों के साथ मजाक बनाया करता था क्योंकि थाना क्षेत्र में ‘कच्ची’ की भट्टियां पुलिस और आबकारी विभाग की मिलीभगत के बिना चला पाना मुमकिन नहीं है। खबरों में किसी के पकड़े न जाने का तर्क ये दिया जाता था कि कच्ची माफियाओं को पुलिस और आबकारी विभाग की छापेमारी की सूचना उनके आने से पहले ही मिल जाया करती थी। इसलिए मौके से सभी नौ दो ग्यारह हो जाते थे।
‘मशहूर गजल गायक पंकज उधास की गजल की पंक्ति है– शराब चीज ही ऐसी है कि ना छोड़ी जाए, ये मेरे यार के जैसे है कि ना छोड़ी जाए। हरियाणा में शराबबंदी की विफलता और बिहार में शराब की जमाखोरी के तरीकों के बाद मेरा पंकज उधास की गजल की सत्यता पर यकीन हो गया था। कहा भी जाता है कि जो जिस चीज को ढूंढता है उसे वो मिल ही जाती है।’
साल 2017 में एक और खबर आई कि एक तालाब से अंग्रेजी शराब की एक बड़ी खेप पकड़ी गई। पुलिस के गोताखोरों ने तालाब में घुसकर कांच की बोतलों में रखी गईं शराब की सैकड़ों बोतलें बाहर निकालीं। शराब माफिया ‘लाल परी’ की जमाखोरी के कैसे–कैसे रास्ते निकाल सकते हैं, इसका ज्ञान होने पर मुझे भी उनके शातिराना अंदाज का लोहा मानना पड़ा।
मशहूर गजल गायक पंकज उधास की गजल की पंक्ति है– शराब चीज ही ऐसी है कि ना छोड़ी जाए, ये मेरे यार के जैसे है कि ना छोड़ी जाए। हरियाणा में शराबबंदी की विफलता और बिहार में शराब की जमाखोरी के तरीकों के बाद मेरा पंकज उधास की गजल की सत्यता पर यकीन हो गया था। कहा भी जाता है कि जो जिस चीज को ढूंढता है उसे वो मिल ही जाती है।
शराब का नशा ही ऐसा है कि सूरज डूबने के बाद जब तक दो पैग गले के नीचे न उतरे जिंदगी खाली–खाली सी लगती है। लेकिन हालिया सर्वे रिपोर्ट कुछ और बताती है। बिहार बदल रहा है। लोग शराब की जगह दूध, लस्सी, पनीर और शहद का सेवन कर रहे हैं। महिलाओं को महंगी साड़ियां देकर उन्हें परिवार में सम्मानजनक सदस्य होने का एहसास कराया जा रहा है। बिहार में बदलाव की ये बयार सुखद है।







