अभिषेक
मरते व्यक्ति की सम्मान से मृत्यु उसका अधिकार है। गंभीर रूप से बीमार व्यक्ति या पीवीएस (परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट) यानी लगातार बनी हुए जड़ अवस्था के मामलों में, जहां बचने की उम्मीद नहीं रह जाती, वहां व्यक्ति की पीड़ा को कम करने के लिए मृत्यु की प्रक्रिया को तेज करना उसके सम्मान से जीवन जीने का अधिकार है। अगर वह इसका इस्तेमाल करता है तो उसे ऐसा करने से रोका नहीं जा सकता। पिछले माह सुप्रीम कोर्ट ने अपने ऐतिहासिक फैसले में पैसिव यूथेनेसिया(परोक्ष इच्छा मृत्यु) का कानून सम्मत बताया है। उसने कहा है कि कोई व्यक्ति ‘लिविंग विल’ तैयार करके यह मांग कर सकता है। शीर्ष अदालत का यह फैसला काॅमन काॅज संस्था की एक याचिका पर आया है जिसमें उसने लिविंग विल को मान्यता दिए जाने को लेकर दिशानिर्देश जारी करने की मांग की थी। इस मांग के साथ उसने दलील दी थी कि जब कोई मेडिकल एक्सपर्ट लाइलाज बीमारी के मरीज के बारे में यह राय दे दे कि मरीज की हालत उस स्तर पर पहुंच गयी है, जहां से उसमें सुधार संभव नहीं है, तो उसे जीवन रक्षक प्रणाली के इस्तेमाल से इन्कार का अधिकार दिया जाना चाहिए।
रोजमर्रा के जीवन में अक्सर लोगों से यह कहते सुना गया है कि हाथ-पैर चलते ही मौत आ जाये तो अच्छा है। मौत के मामले में हर व्यक्ति की यही ख्वाहिश होती है कि उसे घिसट-घिसटकर और दूसरों पर बोझ बनकर न मरना पड़े। मानव इतिहास में शायद जीवन की इसी बड़ी सच्चाई के कारण इच्छा मृत्यु की अवधारणा ने जन्म लिया होगा। वैसे देखा जाए तो भारत में इच्छा मृत्यु की अवधारणा प्राचीनकाल से ही चली आ रही है। भारतीय शास्त्र-पुराण में भी इसका जिक्र है। जैसे भगवान श्रीराम से भेंट होने और कुटिया से उनके प्रस्थान के पश्चात् शबरी का स्वयं को योगाग्नि में भस्म कर लेना इच्छा मृत्यु का ही एक रूप है। इच्छा मृत्यु के वरदान स्वरूप ही महाभारत युद्ध के दौरान बाणशैय्या पर पड़े भीष्म पितामह ने सूर्य के उत्तरायण होने पर ही अपने प्राण त्यागे। सीता जी ने धरती की दरार में कूदकर अपनी जान दी थी। श्रीराम और लक्ष्मण जी ने सरयू नदी में जलसमाधि ली थी। आधुनिक युग में भी देखें तो इच्छा मृत्यु के कई उदाहरण हमारे सामने हैं। जैसे 2 जुलाई 1902 में स्वामी विवेकानन्द ने स्वेच्छा से योगसमाधि की विधि से प्राण त्यागे थे। आचार्य विनोबा भावे ने अपने अंतिम दिनों में इच्छा-मृत्यु का वरण किया। उन्होने जैन धर्म की मान्यता के अनुसार ’समाधि मरण/संथारा’ का मार्ग अपनाया और जिसके तहत् खाना-पीना और दवा आदि लेने तक का त्याग कर दिया था। उस वक्त इंदिरा गांधी जब उन्हें देखने के लिए गईं थीं, तब वहां मौजूद पत्रकारों की यह मांग ठुकरा दी गई थी कि भावे जी को अस्पताल में दाखिल किया जाए। 15 नवंबर 1982 को उनकी मृत्यु हो गयी। इसी तरह गायत्री परिवार के जनक पं. श्रीराम शर्मा आचार्य ने भी अपनी मृत्यु की तारीख और समय कई वर्ष पूर्व तय कर ली थी और पूर्व निर्धारित तिथि 2 जून 1990 को ही अपने प्राण त्यागे।
इच्छा मृत्यु पर ऐतिहासिक फैसला
इच्छा मृत्यु पर देश में लंबे समय से चली आ रही बहस पर देश के सर्वोच्च न्यायालय का ऐतिहासिक फैसला आने के बाद विराम लगा। सर्वोच्च न्यायालय ने अपने निर्णय में कहा है कि सम्मान के साथ जीना मौलिक अधिकार है तो सम्मान के साथ मृत्यु पाना भी मौलिक अधिकार माना जाना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने एक एनजीओ काॅमन काॅज की इच्छा मृत्यु मामले की याचिका पर सुनवाई करते हुए इच्छा मृत्यु को सशर्त सही ठहराया है। चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की बेंच ने कहा कि हर व्यक्ति को गरिमा के साथ मरने का अधिकार है। कोर्ट ने कहा कि अगर डॉक्टर कहता है कि मरीज की बीमारी लाइलाज है तो वह मरीज इच्छामृत्यु मांग सकता है। इसके तहत् व्यक्ति की पीड़ा कम करने के लिए मृत्यु की प्रक्रिया को तेज करना भी शामिल है। साथ ही कोर्ट ने कोमा में जा चुके या मौत की कगार पर पहुंच चुके लोगों को वसीयत (Living Will) के आधार पर निष्क्रिय इच्छामृत्यु (Passive Euthanasia) का हक होगा। पिछले साल 11 अक्टूबर को इस याचिका पर फैसला सुरक्षित रख लिया था और पिछले माह को इस पर फैसला दे दिया गया। पांच सदस्यीय संविधान बेंच में चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा के अलावा जस्टिस एके. सिकरी, जस्टिस एएम. खानविल्कर, जस्टिस डीवाई. चंद्रचूड़ और जस्टिस अशोक भूषण शामिल थे।
सिद्धार्थ ने निर्वाण को तलाशा तो हो गये बुद्ध
जस्टिस एके सिकरी ने अपने निर्णय में कहा कि यूथेनेसिया एक बड़ी बहस और विवाद का विषय रहा है, इसे सिर्फ कानूनी सीमा में नहीं बल्कि सामाजिक, दार्शनिक, नैतिक और धार्मिक क्षेत्रों में भी देखने की जरूरत है। उन्होने कहा कि कोई भी अंतिम समय में दुख और पीड़ा भोगना नहीं चाहता। उन्होने गौतम बुद्ध का उदाहरण देते हुए कहा कि युवराज सिद्धार्थ को बुढ़ापा और शब देखकर कष्ट हुआ, वे इन्हें नहीं भोगना चाहते थे, इसीलिए निर्वाण की तलाश में उन्होंने सांसारिक जीवन का त्याग किया और गौतम बुद्ध कहलाए। जस्टिस सिकरी ने बौद्ध, जैन और हिंदू धर्म में अच्छी मौत की अवधारण को भी निर्णय में परिभाषित किया इनमें सम्मानजनक मृत्यु को अच्छी मृत्यु बताया गया है। आखिरी घड़ियां शांत और सरल हों तो मृत्यु के दारान जीवन का सम्मान कायम रखा जा सकता है।
मौत नहीं, पीड़ा और दर्द का डर बड़ा
जस्टिस डा. डीवाई चंद्रचूड़ ने अपना निर्णय में कहा कि जीवन का मौत से संपर्क कभी नहीं टूटता लेकिन लोगों में मौत से ज्यादा इससे होने वाली पीड़ा और दर्द को भोगने का डर होता है। इनसे मुक्ति पाना अपने आप में एक आजादी पाने जैसा है। ऐसे जीवन के आखिरी वक्त में कोई कैसा जीवन चाहता है, यह उसके व्यक्तित्व का हिस्सा है। उन्होने कहा कि यूथेनेसिया को लेकर दुनिया भर में बहस होती रही है। डाॅक्टर, मरीज, वकील और मरीज के परिजन सभी उलझन में हैं। दूसरी तरफ कानून और तकनीक के बीच लगातार संघर्ष जारी है। चिकित्सा से जुड़ी तकनीकें लगातार सुधर रही हैं, आधुनिक हो रही हैं जिसने जीवन को बढ़ाया है। आधुनिक चिकित्सा विज्ञान को पता है कि मानव शरीर कैसे काम करता है। इसके फायदे हैं तो नुकसान भी, यह व्यक्ति पर निर्भर करता है कि वे इसे कैसे देखते हैं। हमारे लिए यह विचार भी बहस के लिए मौजूद है कि किसी मरते हुए व्यक्ति का जीवन बचाना सही है या गलत? कोर्ट को कानूनी मामले के बजाए सांस्थानिक, सरकारी और सामजिक स्तरों पर जाकर यूथेनेसिया पर फैसला करना है।
हिपोक्रेटस के सामने प्लेटो
जस्टिस अशोक भूषण ने डाॅक्टरों द्वारा ली जाने वाली हिपोक्रेटस की शपथ का उल्लेख करते हुए कहा कि निश्चित तौर पर यह शपथ डाॅक्टरों को मरीज को मरता छोड़ने से रोकती है। उन्होने कहा कि ग्रीक दार्शनिक प्लेटो ने अपनी पुस्तक ’रिपब्लिक‘ में डाॅक्टरों के लिए लिखा है, वे ऐसे मरीज को चिकित्सा सुविधा देना रोक सकते हैं, जिन्हें बचाना संभव न रहे। इस उदाहरण के साथ जस्टिस भूषण ने अपेक्षा जतायी कि डाॅक्टरों के बीच यूथेनेसिया को लेकर मौजूद झिझक में एक विचार जोड़ा जा सकेगा। उन्होने कहा, चिकित्सा विज्ञान ने बहुत तरक्की की है, मानवाधिकार भी उन्नत हुए हैं। अपना निर्णय लेने का अधिकार इसी के जरिए दुनिया में स्वीकारा जा रहा है। जस्टिस भूषण ने सुप्रीम कोट के निर्देशों में स्पष्ट किया कि इसमें व्यक्ति को अपने अंतिम समय के लिए चिकित्सा संबंधित दस्तावेज बनाने के लिए अधिकार दिया है।
सुप्रीम कोर्ट के पांच जजों के संविधान पीठ ने जब इच्छा मृत्यु पर कुछ शर्तों के साथ मुहर लगाई तो दरअसल वे जीवन और मृत्यु के दार्शनिक संबंध या मृत्यु की अपरिहार्यता पर ही नहीं, उस सामाजिक संकट पर भी ध्यान दे रहे थे जो हमारे समाज में वृद्धों के अकेलेपन और बीमारी से पैदा हुआ है। भारतीय समाज में यह एक नई परिघटना है- ऐसे बुजुर्ग बढ़ रहे हैं जिनको अपने लिए यह इच्छामृत्यु चाहिए। निस्संदेह एक गरिमापूर्ण जीवन के गरिमापूर्ण अंत की कामना से ही यह जरूरत उपजी है।
सरकार का पक्ष
सरकार ने कोर्ट में कहा कि इच्छा मृत्यु पर हम गंभीरता से विचार कर रहे हैं। इस पर कानून लाने की तैयारी भी है। प्राइवेट मेंबर बिल और 241वी विधि आयोग की रिपोर्ट भी तैयार है, लेकिन स्वास्थ्य मंत्रालय यूथेनेसिया का समर्थन नहीं करता इसकी कई वजह है। मसलन- डाॅक्टरों द्वारा ली गयी हिपोक्रेटिक शपथ जानबूझकर मरीज को मरने नहीं देती। व्यक्ति अगर किसी पल मरने की ख्वाहिश करे, तो जरूरी नहीं कि वह ख्वाहिश स्थायी हो। अवसाद से जन्मी भी हो सकती है। ऐसे में सब्र करना चाहिए, मनोचिकित्सक इस ख्वाहिश को इलाज से बदल सकते हैं। दर्द को मापा नहीं जा सकता। कोई व्यक्ति हमेशा शैया पर रहेगा, यह भी मेडिकल साइंस में बताना संभव नहीं है। क्या कोई डाॅक्टर पुख्ता दावा कर सकता है कि किसी बीमारी का इलाज नहीं है और मरीज को बचाया नहीं जा सकता। उन डाॅक्टरों और मेडिकल आॅफिसर्स की मनोदशा और सदमे के बारे में भी सोचना जरूरी है, जो यूथेनेसिया देंगे।
एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दाखिल कर कहा था कि संविधान के आर्टिकल 21 के तहत जिस तरह नागरिकों को जीने का अधिकार दिया गया है, उसी तरह उन्हें मरने का भी अधिकार है। कॉमन कॉज के वकील प्रशांत भूषण ने कहा कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे लोगों को ‘लिविंग विल‘ बनाने का हक होना चाहिए। खासकर वो पैसिक यूथनेशिया की पैरवी कर रहे हैं। इस पर केंद्र सरकार ने कहा कि इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) लिखने की अनुमति नहीं दी जा सकती, लेकिन मेडिकल बोर्ड के निर्देश पर मरणासन्न का सपोर्ट सिस्टम हटाया जा सकता है।
लिविंग विल
इसे एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव भी कहते हैं। यह किसी भी व्यक्ति के वे दिशा-निर्देश होते हैं जिसमें वह घोषणा करता है कि भविष्य में किसी ऐसी बीमारी या दशा से अगर वह ग्रस्त हो जाता है जिसमें तमाम आधुनिक इलाजों के बावजूद सुधार मुश्किल हो, तो उसरका इलाज किया जाए या न किया जाए। आॅस्ट्रेलिया में ‘एडवांस डायरेक्टिव’ का प्रावधान है जिसमें लोगों को यह पहले ही तय करने की सहूलियत दी गयी है कि भविष्य में उनका कैसे इलाज किया जाए। दरअसल लाइलाज या मरणासन्न स्थिति में हो सकता है कि व्यक्ति अपनी राय देने में असमर्थ हो, लिहाजा लिविंग बिल का प्रावधान है। पेशेंट सेल्फ डिटरमिनेशन एक्ट अमेरिकी नागरिकों को यह अधिकार देता है कि वे अपने स्वास्थ्य से जुड़े निर्णय कर सकें। इस कानून में एडवांस डायरेक्टिव या लिविंग विल का प्रावधान है। इसी कानून की तर्ज पर काॅमन काॅज संस्था ने भी लिविंग विल की मांग की है। इस तरह की प्रक्रिया अमेरिका, इंग्लैंड, कनाडा में भी अलग-अलग स्वरूपों में अपनायी जा रही है।
मृत्यु की पावर आॅफ अटार्नी
इस पर चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा और जस्टिस एएम खानविल्कर ने अपने आदेश में कहा कि ऐसे मामले जिनमें मरीज अपने को अभिव्यक्त नहीं कर पा रहे हैं, यूथेनेसिया को लेकर जटिलताएं पैदा हो सकती हैं। ऐसे में एडवांस मेडिकल डायरेक्टिव्ज जारी किये जाते हैं। इन्हें कई देशों में पहले से लागू किया जा रहा है। यह मरीज का अधिकार है और इनका पालन नहीं होता है तो यह मरीज को उसकी इच्छा के अनुरूप सुगम मृत्यु के अधिकार से रोकने के बराबर होगा। इन्हें मेडिकल पावर आॅफ अटार्नी भी कहा जा सकता है जिनमें व्यक्ति अपने किसी एक विश्वस्त को नियुक्त कर सकता है, जो व्यक्ति के स्वास्थ्य से संबंधित निर्णय व्यक्ति की किसी वजह से अनुपस्थिति में ले सकता है।
पीछे मुड़कर देखें तो तीन नजीरों ने इच्छा मृत्यु की बात यहां तक बढ़ाई कि इस पर सुप्रीम कोर्ट द्वारा इतना बड़ा ऐतिहासिक फैसला लिया जा सका। ’एक ही ईश्वर है, मृत्यु। उससे एक ही प्रार्थना की जाती है, आज नहीं।‘ यह कथन बहुचर्चित पुस्तक ‘गेम्स आॅफ थ्रोन’ का एक किरदार सीरियो फोरेल का है, जिसके जरिए मृत्यु और जीवन के संबंधों को समझा जा सकता है। सुप्रीम कोर्ट के इच्छा मृत्यु पर निर्णय के संबंध को समझाने के लिए इन अहम मामलों पर विस्तार से मंथन हुआ और कोर्ट ने अपना मत भी व्यक्त करते हुए अपने निर्णय में इन्हें ध्यान में रखा।
माना गया जीने के अधिकार के साथ न जीने का अधिकार
पी रथिनम और नागभूषण पटनायक ने याचिका दायर कर आईपीसी की धारा 309 को चुनौती दी, जिसमें आत्महत्या का प्रयास करने पर एक साल के कारावास व जुर्माने जैसी सजा का प्रावधान है। अनुच्छेद 14 (विधि के समक्ष समानता का अधिकार) व 21 (व्यक्तिगत स्वतंत्रता व जीवन की सुरक्षा) का उल्लंघन बताया। इस याचिका के जरिए सुप्रीम कोर्ट ने जीवन की सुरक्षा के प्रश्न पर उदाहरण दिया कि पहाड़ी क्षेत्रों में रहने वाले नागरिकों के लिए सड़कें जीवन की सुरक्षा का मामला है, ऐसे में यह अनिवार्य है कि उनके लिए सड़कें बनायी जाएंगी। मृत्यु के अधिकार जैसे प्रश्न पर सुप्रीम कोर्ट ने बांबे हाईकोर्ट द्वारा मारुति श्रीपति दुबल मामले में दिए नजरिए का समर्थन किया कि एक अधिकार उसी से संबंधित दूसरे अधिकार को भी सुनिश्चित करता है। यानी अगर नागरिक को बोलने का अधिकार है तो उसे चुप रहने का अधिकार खुद ही मिल जाता है। इसी तरह जीवन का अधिकार है तो न जीने का अधिकार भी उसे मिला हुआ है। मगर जब इस निर्णय की आलोचना को विभिन्न तबकों ने सामने रखा तो सुप्रीम कोर्ट के दो जज की बेंच ने 1994 में कहा कि किसी व्यक्ति को क्षति पहुंचाते हुए उसे जीने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। यह अधिकार का नकारात्मक हिस्सा है। साथ ही निर्णय में सुप्रीम कोर्ट ने आईपीसी 309 को कानून की किताब से खत्म करने लायक बताया।
आईपीसी धारा 309 पुनः संवैधानिक करार
पी रथिनम मामले में आया निर्णय ज्यादा समय तक अस्तित्व में नहीं रहा। वर्ष 1996 में ज्ञान कौर बनाम पंजाब राज्य के मामले में इसे बदल दिया गया। ज्ञान कौर मामले में ट्रायल कोर्ट ने कुलवंत कौर आत्महत्या के लिए उकसाने के मामले में आईपीसी की धारा 306 के तहत सजा दी थी। याचिका में कौर की ओर से कहा गया कि जब आईपीसी 309 को सुप्रीम कोट असंवैधानिक करार दे चुका है, तो आत्महत्या के लिए उकसावे को कैसे यथावत रखा जा सकता है? यह भी असंवैधानिक ही हुआ। सुनवाई संवैधानिक पीठ ने की, जिसने कहा कि आत्महत्या करने वाले व्यक्ति का यह कदम जीने के अधिकार से जोड़कर नहीं देखा जा सकता। जीवन का अधिकार प्रकृतिक अधिकार है, आत्महत्या अप्राकृतिक है। अन्य मूल अधिकारों की तरह, जीवन के अधिकार को नहीं देखा जा कसता, इसलिए इनके अनुसार जीवन के अधिकार की प्रकृति भी निर्धारित नहीं की जानी चाहिए। बोलने के अधिकार में चुप रहने का अधिकार तो शामिल है, लेकिन जीवन के अधिकार में मृत्यु के अधिकार को शामिल नहीं माना जाना चाहिए। इसी मामले में इच्छा मृत्यु पर कहा गया कि जीवन का अधिकार मानव सम्मान के साथ जीने को लेकर है। यह जीवन प्राकृतिक तौर पर खत्म होने तक चलता है। ऐसे में मानव सम्मान के साथ मृत्यु के अधिकार को अप्राकृतिक तौर पर मृत्यु का अधिकार न समझा जाए, जिसमें जीवन की अवधि को कम किया जाता है। इसके साथ ही कोर्ट ने आईपीसी धारा 309 को भी संवैधानिक घोषित किया।
इच्छा मृत्यु पर बहस हुई तेज
आत्म हत्या और उकसाने के विवाद तो खत्म हुए, पर इच्छा मृत्यु का विवाद बना रहा। 27 नवंबर 1973 की रात मुंबई के किंग एडवर्ड मेमोरियल (केईएम) अस्पताल में जूनियर नर्स के तौर पर काम कर रहीं अरुणा शानबाग से वार्ड ब्वाय ने कुत्तों को बांधने वाली जंजीर से बांधकर उसका बलात्कार किया। इस दरिंदगी के दौरान अरुणा के दिमाग में आक्सीजन की सप्लाई रुक गयी और दिमाग को नुकसान पहुंचा। वे हादसे के दिन से जड़ अवस्था (परसिस्टेंट वेजिटेटिव स्टेट) में थीं और जिंदगी के आखिरी दिनों तक वह ऐसे ही बनी रहीं। उनकी मित्र ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर कर प्रार्थना की कि अरुणा का भोजन बंद कर दिया जाए ताकि वह शांतिपूर्वक मृत्यु पा सकें। तीन डाॅक्टरों की टीम से अरुणा की अवस्था, मानसिक स्थिति की जांच करवाई गयी। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि यह कोर्ट निर्धारित नहीं कर सकती कि स्थिति क्या है? एक्विव और पैसिव यूथेनेसिया का विवाद भी सामने आया। एक्टिव यूथेनेसिया यानी गंभीर मरीज को सीधे मृत्यु देना। पैसिव यानी अप्रत्यक्ष रूप से उसकी मौत निश्चित करना। जैसे किडनी की जरूरत वाले मरीज को डायलिसिस मशीन मुहैया न करवाना या कोमा के मरीज को मशीन सपोर्ट से हटा लेना। पीसीएस मामले में भोजन न देना पैसिव यूथेनेसिया में आता है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इच्छा मृत्यु पर निर्णय एक कानून बनाकर उसके तहत ही दिया जा सकता है। यह समाज, कानून, चिकित्सा विज्ञान, संविधान सभी परिप्रेक्ष्यों को ध्यान में रखते हुए होना चाहिए। इस तरह विस्तृत विचार के लिए मामले को सुप्रीम कोर्ट की संवैधानिक पीठ को दिया गया।
किसकी इच्छा से मृत्यु
इस तरह अरुणा अनजाने में ही देश में यूथेनेसिया को वैध करने के लिए चल रही विवादित बहसों का चेहरा बन गयीं। इच्छा मृत्यु से जुड़ी बहस देश में तब शुरू हुई, जब 1986 में एक कार एक्सीडेंट में सिजेफ्रेनिया और मानसिक रोगों का शिकार हुए एक पुलिस कांस्टेबल मारुति श्रीपति दुबल ने खुद को जलाकर मारने की कोशिश की। अक्टूबर 2010 में उत्तर प्रदेश के कानपुर की झुग्गी बस्ती में रहने वाली 21 साल की ब्लड कैंसल की मरीज अलका तिवारी ने इच्छा मृत्यु के लिए सरकार की अनुमति मांगने के लिए अपील दायर की। अर्जी में लिखा था कि या तो सरकार उनके इलाज के लिए आर्थिक मदद मुहैया कराए या उन्हें मरने की इजाजात दे। इसके बाद केंद्रीय स्वास्थ्य मंत्रालय से उन्हें मदद का आश्वासन तो दिया गया पर कोई आर्थिक मदद नही मिली। जुलाई 2012 में तमिलनाडु के इरोड जिले के कलेक्ट्रेट में एक ऐसी ही याचिका आई, जिसमें एक महिला ने सेरेब्रल पाल्सी से पीड़ित अपनी 14 वर्षीय बेटी के लिए इच्छा मृत्यु की मांग की थी। उस मां का कहना था कि उनकी बच्ची बिना किसी मदद के कुछ भी कर पाने में असमर्थ है और किसी भी स्पेशल स्कूल में उसके दाखिले का प्रयास भी असफल रहा।
मरने के अधिकार का समर्थन
मरने के अधिकार के समर्थन में ’काॅमन काॅज‘ जैसे एनजीओ हैं, जो ‘लिविंग विल’ को कानूनी मान्यता दिलाने के लिए लड़ रहे हैं और अब फैसला उनके पक्ष में गया है। एक और संस्था ’द सोसायटी फाॅर द राइट टू डाई विद डिग्निटी‘ के संयुक्त सचिव डाॅ. सुरेंद्र ढेलिया भी इस बात का समर्थन करते हैं। उन्होने तो अपनी लिविंग विल भी बना ली है, जिसमें लिखा है कि वो दृढ़ रूप से प्रतिबद्ध हैं कि विल में साफ-साफ बतायी गयी परिस्थितियों में उन्हें किसी भी प्रकार के जीवन रक्षक मेडिकल ट्रीटमेंट से दूर रखा जाए। इसमें आने वाली कानूनी अड़चनों का अंदेशा लगाते हुए ढेलिया ने एक पावर आॅफ अटाॅर्नी भी बनायी है। अरुणा के केस का हवाला देते हुए ढेलिया लिविंग विल का महत्व बताते है कि अरुणा की स्थिति को देखते हुए जजों ने यह पूछा था कि क्या अरुणा ने किसी कानूनी वसीयत में इच्छा मृत्यु का समर्थन या विरोध किया है, पर दस्तावेज न होने की दशा में कोर्ट को निर्णय देने के लिए बाकी साक्ष्यों का सहारा लेना पड़ा।
लिविंग विल के गलत इस्तेमाल की संभावना
अगर दूसर नजरिए से देखें तो लिविंग विल को इच्छा मृत्यु के एक बड़े कारण के रूप में देखा जा सकता है, तो क्या लिविंग विल के समर्थक मानते हैं कि व्यक्ति को खुद को ऐसे मौत के हवाले कर देना चाहिए? ‘काॅमन काॅज’ की वकील स्वप्ना झा कहती हैं, ’नहीं, बिलकुल नहीं… वास्तव में, अगर देखा जाए तो लिविंग विल के माध्यम से वे चुन सकते हैं कि बिना किसी कृत्रिम माध्यम का सहारा लिए प्राकृतिक रूप से वे कब तक जीना चाहेंगे या नहीं। ये सम्मानीय मृत्यु पाने की एक संभावना देता है।‘
हालांकि, लंबा जीवन जीने का समर्थन करने वाले इसके दूसरे पहलू यानी गलत इस्तेमाल को लेकर भी सशंकित हैं, जिसकी संभावनाओं को नकारा नहीं जा सकता। क्या गारंटी है कि इच्छा मृत्यु के अधिकार का प्रयोग कमजोर, बूढ़े, विकलांग, मानसिक रूप से अक्षम लोगों को किसी निजी स्वार्थ की वजह से मारने के लिए नहीं किया जायेगा? इच्छा मृत्यु के गलत इस्तेमाल की बहस पर अपना पक्ष रखते हुए ढेलिया कहते हैं कि क्या सिर्फ गलत इस्तेमाल की संभावनाओं के चलते इच्छा मृत्यु की बहस को ही खत्म कर देना चाहिए? एक सर्जन द्वारा इस्तेमाल किए जाने वाले चाकू का भी गलत इस्तेमाल किया जा सकता है। ऐसे में क्या सर्जन को चाकू के प्रयोग करने से रोक देना चाहिए?
उत्तर प्रदेश में कानपुर के किदवई नगर में रहने वाले वकील शरद कुमार त्रिपाठी (35) ने रजिस्ट्री ऑफिस में इच्छा मृत्यु की वसीयत (लिविंग विल) रजिस्टर कराई है। वसीयत में वकील ने अपने जूनियर वकील अमितेश सिंह को अधिकार दिया है कि वह भविष्य में किसी अप्रिय स्थिति में उसके जीवन से संबंधित कोई फैसला ले सके। इच्छामृत्यु पर सुप्रीम कोर्ट की गाइडलाइन के बाद यह लिविंग विल का देश में संभवतः पहला फैसला है।
धार्मिक मतों को लेकर भी उलझन
इच्छा मृत्यु से जुड़ी बहस को एक बड़ा कारण और उलझा देता है। वो है धार्मिक मत। हर धर्म में मृत्यु के समय और कारण को ईश्वर की मर्जी से जोड़कर देखा जाता है। ऐसे में इच्छा मृत्यु को ईश्वर के काम में इंसानी दखल माना गया है। सिख धर्म इच्छा मृत्य को ईश्वर की इच्छा का विरोध कहता है, पर कष्ट भोगने को व्यक्ति के कर्मों का फल माना गया है। इस्लाम इच्छा मृत्य को सिरे से खारिज करता है पर बहुत ही निराशाजनक परिस्थिति में अगर मरीज किसी आर्टीफिशियल तरीके से अपना जीवन नहीं जीना चाहता, तब ‘डू नाॅट रिससिटेट(डीएनआर) आर्डर’ को मानते हुए अग्रिम निर्देश दिए जाएंगे।(डीएनआर एक कानूनी आदेश होता है, जो कि रोगी की सहमति के अनुसार, इमरजेंसी में डाक्टरों द्वारा उसे सीपीआर या एडवांस्ड कार्डिएक लाअव सपोर्ट देने से रोकने के लिए होता है) यहूदी (ज्यूइश) मान्यताओं में मानव जीवन का संरक्षण हीी सबसे बड़ा विषय है, हालांकि 16वीं सदी के एक कानून की नयी व्याख्या कहती है ’अगर आत्मा के जाने के रास्ते में कोई बाधा है तो उसे हटा देना ही जायज है क्योंकि यह कोई अलग कार्य नहीं है, बस उस अवरोध को हटा देना ही मृत्यु के प्राकृतिक तरीके की ओर ले जाएगा।‘(वेंटीलेटर?)
बुद्ध धर्म की अवधारणाएं कुछ अलग हैं। उनकी धार्मिक पुस्तक ‘त्रिपिटक’ में बताया गया है कि स्वयं बुद्ध ने एक बीमार, शारीरिक रूप से कमजोर हो चुके भिक्षुक के आत्महत्या करने को गलत न मानते हुए माफ किया। ईसाई धर्म में किसी भी व्यक्ति के लिए इच्छा मृत्य का प्रस्ताव रखना, उसे जीवन के लिए अयोग्य मानने जैसा है पर वो विकल्प देते हैं। क्रिश्चियन मेडिकल एंड डेंटल एसोसिएशन मानती है कि किसी रोगी, जो दिन-ब-दिन शारीरिक तौर पर कमजोर होता जा रहा है, जिसके ठीक होने की भी कोई उम्मीद नही है, के लाइफ सपोर्ट को हटा देने का विरोध नहीं होना चाहिए। कानून, धर्म और मानवाधिकारों के बीच कुछ व्यक्तियों का मृत्यु आने तक उपवास रखने की प्रथा भी एक उलझा हुआ पहलू है। हिंदू धर्म ग्रंथों में इच्छा मृत्य की खिलाफत की गयी है पर प्रयोपवेशन (मृत्यु आने तक उपवास करना) को आत्महत्या नहीं अपवाद माना गया है। जैन धर्म में भी इसी तरह के उपवास यानी ’संथारा‘ की प्रथा प्रचलित है। मृत्यु के लिए तैयार होने पर आहार छोड़ देने की इस प्रथा को ‘दिव्य बुलावे’ की तरह देखा जाता है।
सरकार और विभिन्न धर्म ’लिविंग डेड‘ के बारे में समान रूप से अनिश्चितताओं से घिरे हैं। इनके बीच एक समानता देखी जा सकती है, वो ये है कि कैसे कुछ ‘विशेष’ लोगों को अपनी मृत्यु का अधिकार चुनने की आजादी दे रहे हैं। सरकार द्वारा जंग के मैदान में भेजे जाने वाले सैनिक और धर्म का पालन के नाम पर आहार छोड़कर मृत्यु के लिए उपवास कर रहे व्यक्ति दोनों अपनी परिणिति जानते हैं और ऐसे में कानून या धर्मों का इच्छा मृत्य का वैध न मानना अस्वाभाविक है। देश के लिए जान देने वालों को शहीद कहते हैं और धर्म के लिए ये त्याग है। इच्छा मृत्य को लेकर चल रही तमाम पेचीदा बहसों के बावजूद जो लोग इसका समर्थन करते हैं और जो लोग समर्थन नहीं करते उनको भी यह कहते अक्सर सुना गया है कि हाथ-पैर चलते ही मौत आ जाये तो अच्छा है। घिसट-घिसटकर और दूसरों पर बोझ बनकर कोई भी मरना नहीं चाहता। … क्या यही इच्छा मृत्यु है? ..
लिविंग विल की प्रक्रिया
ये कर सकेंगे
- वयस्क व्यक्ति जिसका मानसिक स्वास्थ्य ठीक हो, स्वस्थ अवस्था में हो।
- बिना जोर जबरदस्ती के पूरी जानकारी के साथ हस्ताक्षर किया जाएगा।
- स्पष्ट किया जाएगा कि जब इलाज बंद किया जाएगा, उसका परिणाम मृत्यु होगा।
क्या होगा इसमें
- उस निर्णय और उन हालात का साफ उल्लेख किया जाएगा। जब इलाज या मेडिकल सपोर्ट बंद किया जाना है।
- भाषा व शर्तें साफ होंगी, जो यह दिशा-निर्देश हस्ताक्षर करेगा, वह चाहे तो इन्हें कभी भी खारिज कर सकेगा।
- उस विश्वस्त का नाम व जानकारियां दी जाएंगी जो व्यक्ति के खुद को अभिव्यक्त न कर पाने की स्थिति आने पर निर्णय लेगा।

कैसे दर्ज होंगे, कौन संरक्षण करेगा
- इन निर्देशों को दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में हस्ताक्षर किया जाएगा। प्रथम श्रेणी के न्यायिक मजिस्ट्रेट काउंटर हस्ताक्षर
- करेंगे, जिन्हें जिला जज जिले भर के लिए निर्धारित करेंगे।
- न्यायिक मजिस्ट्रेट दस्तावेज की एक काॅपी अपने पास रखेंगे। एक काॅपी जिला अदालत को भेजेंगे।
- जिस व्यक्ति के लिए दस्तावेज तैयार होगा, उसके परिवार का कोई सदस्य मौके पर नहीं है, तो मजिस्ट्रेट खुद परिवार को इस बारे में सूचित करेंगे।
कब प्रभावी होगा दस्तावेज
- जिस व्यक्ति के बारे में निर्देश है, वह गंभीर रूप से बीमार हो जाए, उसके बचने की संभावना नहीं हो, तो उसका इलाज कर रहे डाक्टरों को इस दस्तावेज के बारे में बताया जाएगा।
- डाॅक्टरों को लगता है कि मरीज की वह अवस्था है, जिसके लिए उसने दिशा निर्देश का दस्तावेज तैयार करवाया था, तो दस्तावेज के अनुरूप निर्णय लेंगे।
- दस्तावेज की जांच होगी और डाॅक्टर इसे ध्यान में रखते हुए पूरी तरह आश्वस्त होने पर निर्णय लेंगे। यह भी पुख्ता करेंगे कि मरीज को बचना नामुमकिन है, वह लाइफ सपोर्ट पर जीवित है।
- पहला मेडिकल बोड बनाया जाएगा, जिसमें तीन विशेषज्ञ डाॅक्टर होंगे। उन्हें 20 वर्ष का चिकित्सीय अनुभव होना चाहिए।
- बोर्ड सहमति देता है तो मजिस्ट्रेट को बताया जाएगा, जो सीएमओ के जरिए एक और विशेषज्ञ समिति बनाकर जांच करवाएंगे। समिति के सदस्यों की योग्यता पहले मेडिकल बोर्ड के समान होगी। वे साथ जाकर मरीज को देखेंगे और समस्त पहलुओं को देखकर मत देंगे।
बोर्ड ने यूथेनेसिया से मना किया तो…
मेडिकल बोर्ड ने यूथेनेसिया की अनुमति देने से इनकार कर दिया तो पीड़ा भोग रहे मरीज या उसके परिजन या उसके उस विश्वस्त जिसने दस्तावेज पर हस्ताक्षर किया था, इन सभी के सामने हाईकोर्ट में याचिका दायर करने का विकल्प होगा। इस तरह की याचिका पर चीफ जस्टिस एक डिविजन बेंच बनाएंगे, जहां के जज परिस्थितियों के अनुसार ’मरीज के हित को सर्वोपरि रखते हुए‘ यूथेनेसिया की अनुमति दे सकते हैं, या याचिका को नकार सकते हैं। इसके लिए हाईकोर्ट एक और विशेषज्ञ चिकित्सकों की समिति बनवाकर मरीज के मामले की जांच करवा सकती है।
जहां दस्तावेज नहीं, उन मामलों में यूथेनेसिया….
- सुप्रीम कोर्ट ने साफ किया कि ऐसे मामले जहां पूर्व में मरीज ने दस्तावेज हस्ताक्षर नहीं किया है, वहां भी निर्धारित प्रक्रिया अपनाई जाए
- मरीज का डाॅक्टर या अस्पताल खुद बोर्ड बनाकर उसके मामले की जांच करेगा। परिजनों की राय पर यह जांच होगी, उन्हें सभी संभावित परिस्थितियों के बारे में बताया जाएगा।
- बोर्ड अस्पताल को यूथेनेसिया की रजामंदी देता है तो अस्पताल को जिला मजिस्ट्रेट से संपर्क करना होगा। इसके आगे पहले से तय दस्तावेज हस्ताक्षर कर चुके मामलों की तरह ही प्रक्रिया का पालन किया जाएगा।
हाईकोर्ट को बताना होगा
- यूथेनेसिया के किसी भी मामले में मरीज से लाइफ सपोर्ट हटाए जा रहे हैं तो संबंधित क्षेत्र के हाईकोट को इसकी पूर्व सूचना देना
- अनिवार्य होगा। इसका समस्त रिकार्ड रखा जाएगा और डिजिटल प्रारूप में हाईकोट रजिस्ट्री को भेजना होगा। यह सभी निर्देश तब तक
- प्रभावी रहेंगे जब तक कि संसद यूथेनेसिया पर कानून नहीं बना लेती।
किन देशों में है इच्छा मृत्यु का प्रावधान
अमेरिकाः यहां सक्रिय इच्छा मृत्यु गैर-कानूनी है लेकिन ओरेगन, वॉशिंगटन और मोंटाना राज्यों में डॉक्टर की सलाह और उसकी मदद से मरने की इजाजत है।
स्विट्जरलैंडः यहां खुद से जहरीली सुई लेकर आत्महत्या करने की इजाजत है, हालांकि इच्छा मृत्यु गैर- कानूनी है।
नीदरलैंड्सः यहां डॉक्टरों के हाथों सक्रिय इच्छा मृत्यु और मरीज की मर्जी से दी जाने वाली मृत्यु पर दंडनीय अपराध नहीं है।
बेल्जियमः यहां सितंबर 2002 से इच्छा मृत्यु वैधानिक हो चुकी है।
ब्रिटेन, स्पेन, फ्रांस और इटली जैसे यूरोपीय देशों सहित दुनिया के ज्यादातर देशों मेंः इच्छा मृत्यु गैर-कानूनी है।
13 साल की लड़ाई के बाद फैसला
11 मइर्, 2005: काॅमन काॅज की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का केंद्र को नोटिस।
16 जनवरी, 2006: शीर्ष अदालत ने मेडिकल काउंसिल आॅफ इंडिया को हस्तक्षेप की अनुमति देते हुए संबंधित दस्तावेज दायर करने को कहा।
28 अप्रैल, 2006: विधि आयोग ने निष्क्रिय इच्छा मृत्यु पर विधेयक लाने का सुझाव दिया। कहा- ऐसे मामले हाईकोट में दायर किये जाने चाहिए, जो विशेषज्ञों की राय के बाद फैसला करे।
31 जनवरी, 2007: शीर्ष अदालत ने सभी पक्षों को दस्तावेज दायर करने का आदेश दिया।
2 मार्च, 2011: पिंकी विरानी की याचिका पर सुप्रीम कोट ने फैसला सुरक्षित किया।
23 जनवरी, 2014: तत्कालीन चीफ जस्टिस पी सदाशिवम की अध्यक्षता में तीन जजों की खंडपीठ ने इस मामले में अंतिम सुनवाई शुरू की।
25 फरवरी, 2014: कोर्ट ने शानबाग सहित कई मामलों में इच्छा मृत्यु को लेकर दिए फैसलों में असंगति का हवाला देते हुए इसे संविधान पीठ को सौंप दिया।
15 जुलाई, 2014: पांच जजों की संविधान पीठ ने सुनवाई शुरू की। सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस भेजा और टीआर अंध्यारूजिना को अदालत मित्र नियुक्त किया। सुनवाई के दौरान उनकी मृत्यु हो गई।
15 फरवरी, 2016: केंद्र ने कहा कि वह इस मामले में विचार कर रहा है।
11 अक्टूबर, 2017: चीफ जस्टिस दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच जजों की संविधान पीठ ने दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया।







