वीआईपी क्षेत्र में रुतबा न मिलने का मलाल

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भाजपा और बसपा खेमे में थी उदासीनता, बसपा साथ थी तो क्यों कम हुआ मतदान

डॉ. दिलीप अग्निहोत्री
सत्ता शीर्ष से जुड़े चुनाव क्षेत्र वीआईपी माने जाते है। यह बात संविधान की भावना के प्रतिकूल भले हो, लेकिन डंके की चोट पर यह मेहरबानी की जाती है। संबंधित क्षेत्र के लोग भी इसकी अपेक्षा रखते है। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने उत्तर प्रदेश में चल रही इस परंपरा को बंद कर दिया था। गोरखपुर और फूलपुर में मतदान प्रतिशत कम होने का यह बड़ा कारण था। जबकि सपा को इसका लाभ मिला।
उदासीनता केवल भाजपा खेमें में नहीं थी। बल्कि बसपा के समर्थकों ने भी उत्साह नहीं दिखाया। अन्यथा मतदान इतना कम नहीं होता। सपा यह दिखाने की कोशिश कर रही है कि बसपा उसके समर्थन में आ गई है। सपा प्रमुख अखिलेश स्वयं मायावती के घर पहुंचे। एक दिन पहले नेता प्रतिपक्ष रामगोविंद भी मायावती का आभार प्रकट करने गए था। उस समय उनकी लचक देखने लायक थी। जबकि विचार इस बात पर करना चाहिए था कि बसपा समर्थक मतदान के प्रति उदासीन क्यों रहे। लेकिन जीत के बाद अन्य तथ्य पीछे रह जाते है। यदि भाजपा समर्थक उत्साहित होते तो परिणाम बदल सकता था।
इसमें संदेह नहीं कि गोरखपुर और फूलपुर में जीतने से सपा का मनोबल बढ़ा है। लेकिन यह सपा बसपा गठजोड़ की सफलता भी नहीं है। यदि बसपा के समर्थकों ने रुचि दिखाई होती तो मतदान का प्रतिशत इतना कम नहीं होता। फिर भी सपा की जीत अंतिम सच्चाई है।
 
यह मानना होगा कि योगी आदित्यनाथ ने अपने गढ़ से पराजय स्वीकार की है,लेकिन क्षेत्र विशेष को वीआईपी दर्जा  उन्होंने प्रदान नहीं किया। उपमुख्यमंत्री के रूप में यह कार्य केशव प्रसाद मौर्य ने भी नहीं किया। योगी आदित्यनाथ ने चुनाव प्रचार के दौरान ही कहा था कि गोरखपुर को  वीआईपी दर्जा वह नहीं देंगे। मुख्यमंत्री ने पूरे प्रदेश के प्रति अपनी जिम्मेदारी स्वीकार की। सरकार बनने के साथ ही उन्होंने वीआईपी दर्जे की परंपरा समाप्त कर दी। विजली के समान वितरण का आदेश दिया। सड़क, अन्य सुविधाओं के बारे में भी यही आदेश दिए गए। जबकि पहले मुख्यमंत्री के गांव, नगर, चुनाव क्षेत्र को विशिष्ट महत्व मिलता था। इधर शपथ ग्रहण हुआ, उधर सबसे पहले चौबीस घण्टे विजली आपूर्ति का फरमान जारी हो जाता था। सड़क ,पानी आदि की भी विशेष सुविधा मिल जाती थी। दूसरी सरकार आती थी तो उस क्षेत्र के तार हटा कर, अपने इलाके में जुड़वा देती थी। सपा, बसपा में यह नजारा प्रत्यक्ष रूप में देखा जाता था। बल्कि संबंधित क्षेत्र के लोग भी विशिष्ट दर्जे की आकांक्षा रखते थे। यदि योगी ने गोरखपुर और केशव ने फूलपुर में ऐसा किया होता तो परिणाम कुछ अलग हो सकता था।
योगी आदित्यनाथ ने पूरे प्रदेश के प्रति अपने कर्तव्य का निर्वाह किया। उनकी सभी नीतियां प्रदेश के सर्वागीण विकास को ध्यान में रख कर चलाई जा रही है। पिछली सरकारों के मुकाबले  चार गुना खाद्यान्न क्रय केंद्रों से खरीदा गया।    सैंतीस लाख  मीट्रिक टन गेंहू  और तैतालिस लाख मीट्रिक टन धन की किया गया। किसानों के खाते में सीधे धनराशि भेजी जा रही है।  बाजार हस्तक्षेप योजना शुरू की गई । इसके तहत दो लाख मीट्रिक टन आलू  खरीदा जाएगा । पांच सौ उनचास प्रति क्विंटल का समर्थन मूल्य घोषित किया गया। छह लाख लोगों को दस महीने में आवास बना कर दे दिए गए। शासन के कार्यो में पारदर्शिता लाने के लिए व्यवस्था बदली गई । खनन विभाग बहुत बदनाम रहा है।  योगी इसमें भी पारदर्शिता ले आये। इससे कुछ महीने कार्य बाधित रहा। लोगों को कठिनाई भी हुई । लेकिन गड़बड़ी की जड़े बहुत गहरी थी, इसलिए समय लगा। अब यह कार्य पटरी पर आ चुका है। नकल विहीन परीक्षा ही सकती है, सरकार ने यह करके दिखा दिया। बहुत लोग इससे भी नाराज रहे होंगे। इन्वेस्टर्स समिट का केवल सफल आयोजन ही नही किया गया, बल्कि प्रस्तावों के समयबद्ध अनुपालन की व्यवस्था भी हो गई। इससे संबंधित पूरी व्यवस्था ऑनलाइन कर दी गई है।
निश्चित ही एक वर्ष में योगी सरकार ने अनेक सराहनीय कार्य किये है। जातिवाद, क्षेत्रवाद , को  शासन  में स्थान नहीं दिया। उपचुनाव परिणामों से विपक्ष का खुश होना स्वभाविक है। लेकिन बसपा और सपा  अपने कार्यकाल में उपचुनाव जीत लेती थी। सपा के समय तो बसपा ने संभावित पराजय से बचने के लिए उपचुनाव में उतरना बन्द कर दिया था।  लेकिन आम चुनाव  और उपचुनाव में कोई समानता नहीं देखी गई। इसलिये  सत्तापक्ष को समीक्षा अवश्य करनी चाहिए, लेकिन निराशा की कोई बात नहीं है। कुछ मंत्रियों और अधिकारियों की कार्यप्रणाली बदलने पर मुख्यमंत्री को अवश्य ध्यान देना होगा। यह भी स्वीकार करना होगा कि भजपा संघठन अपने कार्यकर्ताओं और समर्थकों की उदासीनता को समझ नहीं सका।
सपा ने पूरे उत्साह से मतदान कराया। उसका समीकरण सटीक बैठा। भाजपा के समर्थक उदासीन रहे। संघठन को इस ओर विशेष ध्यान देना होगा। निश्चित ही संघर्ष के दौर में साथ रहने वालों के साथ संवादहीनता बढ़ी है। उनकी जगह अवसरवादी तत्वों की आमद तेज हुई है। सामान्य पसाधिकारियों तक के रंग ढंग  एक दम से बदले है। कुछ दाधिकारियों ने अपनी टीम बना ली है। ऐसा लग रहा है जैसे वह भाजपा के समानांतर संघठन चला रहे है। एक वर्ष में भी अनेक महत्वपूर्ण पद भरे नहीं जा सके। जो भरे गए, उसके लिए भी लगता है कि समर्पित लोगों का अभाव हो गया है। अपवाद छोड़ दें तो विश्विद्यालयों के कुलपति की नियुक्ति में समर्पित और अर्हता रखने वालों की उपेक्षा हुई है।
इसी प्रकार अनेक मंत्री भी सरकार की छवि पर बोझ बन गए है। इन पर भी विचार करने का समय आ गया है।  गोरखपुर में बीमारी के समय एक मंत्री और अभी फूलपुर में एक अन्य मंत्री के बयान से भी लोग नाराज थे। इसमें संदेह नहीं कि योगी आदित्यनाथ अपने कर्तव्यों का बखूबी निर्वाह कर रहे है। वह परिवारवाद से मुक्त है। राज्य में एक ईमानदार व्यवस्था लागू करने का प्रयास कर रहे है। इसमें एक हद तक कामयाबी भी मिली है। इस कारण भी अनेक लोग नाराज हो सकते है। योगी उत्तर प्रदेश को बीमारू छवि से निजात दिलाने की दिशा में भी प्रभवी कदम उठा रहे है।    लेकिन एक वर्ष की अवधि अभी कम है। उत्तर प्रदेश के पिछले उदाहरण देखें तो एक वर्ष में गोरखपुर और फूलपुर की वीआईपी दर्जा देकर भी चुनाव में बेहतर प्रदर्शन किया जा सकता है। लेकिन योगी आदित्यनाथ ने क्षेत्र नहीं प्रदेश को ऊपर रखा। आम चुनाव में यही सिद्धान्त असर दिखायेगा।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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