डॉ दिलीप अग्निहोत्री
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रम्प ने पाकिस्तान के खिलाफ अब तक का सबसे कठोर कदम उठाया है। उसको मिलने वाली भारी सहायता पर रोक लगा दी गई है। इतना ही नहीं ट्रम्प ने उसके खिलाफ अब तक के सबसे कठोर शब्दों का भी प्रयोग किया है। उन्होंने पाकिस्तान को विश्वासघाती बताया है, जो एक तरफ आतंकियों को पनाह देता है, दूसरी तरफ आतंकियों को बढ़ावा भी देता है। उधर पाकिस्तानी प्रधानमंत्री चीन और अरब देशों के सामने झोली फैलाकर दौड़ रहे हैं।चर्चा है कि यह भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की कूटनीति का परिणाम है, जिसके चलते अमेरिका ने ये कदम उठाए है। मोदी प्रत्येक वैश्विक मंच से आतंकवाद का मुद्दा उठाते रहे हैं। वह कहते रहे है कि विश्व की प्रत्येक आतंकी घटना के तार किसी न किसी रूप में पाकिस्तान से जुड़े रहते है। ऐसे में पाकिस्तान पर नियंत्रण किये बिना आतंकी समस्या का समाधान नहीं हो सकता है। डोनाल्ड ट्रम्प का बयान भी इन्हीं विचारों के अनुकूल है।
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान पर नकेल कसी है। वह पहले राष्ट्रपति है जिन्होंने पाकिस्तान की हकीकत को इतने बेबाक अंदाज में स्वीकार किया है। ट्रम्प का कहना है कि पाकिस्तान अमेरिका के लिए कोई काम नहीं करता और वहां की सरकार ने अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को छिपने में मदद की थी। दो हजार ग्यारह में अमेरिकी के नेवल स्पेशल वारफेयर डेवलपमेंट ग्रुप बल ने हेलीकॉप्टर से वहां हमला किया था। पाकिस्तान को बताए बिना लादेन को मार गिराया गया था। उसे पाकिस्तान ने सुरक्षित सैन्य इलाके में पनाह दी थी। जबकि अमेरिका पाकिस्तान को प्रतिवर्ष एक अरब डॉलर से ज्यादा की सहायत देता है। कितना अजीब है कि जहां लादेन को छिपाया गया था, उसी मुल्क को सहायता दी जा रही थी।

इस वर्ष की शुरुआत में भी ट्रम्प ने पाकिस्तान को दी जाने वाली सैन्य सहायता पर रोक लगाई थी। तब अमेरिका ने अफगान तालिबान और हक्कानी नेटवर्क पर कार्रवाई को लेकर पाकिस्तान की दो सौ पचपन मिलियन डालर की सैन्य सहायता पर रोक लगा दी थी। अमेरिकी विदेश विभाग ने कल कहा कि अमेरिका मानता है कि इन आतंकवादी संगठनों के ऊपर कार्रवाई नहीं होने से क्षेत्र में अस्थिरता फैल रही है। जब तक इन आतंकवादी संगठनों पर कार्रवाई नहीं होती तबतक सैन्य सहायता स्थगित रहेगी।
पाकिस्तान को दी जाने वाली अधिकांश सुरक्षा मदद और सैन्य उपकरणों की आपूर्ति को रोक लगाई गई थी । अमेरिका का कहना था कि पाकिस्तान ने राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप और अन्य नेताओं से चेतावनियां मिलने के बावजूद आतंकवादियों को पनाह देना जारी रखा है। पाकिस्तान को सैन्य उपकरणों की आपूर्ति या सुरक्षा से संबंधित वित्तीय मदद नहीं करना अमेरिकी नीति में शामिल हो गया था। अमेरिका ने कहा था कि रोक तब तक लागू रहेगी जब तक पाकिस्तानी सरकार अफगानिस्तान के तालिबान और हक्कानी नेटवर्क सहित आतकंवादी संगठनों के खिलाफ निर्णायक कार्रवाई नहीं करती है। लश्कर-ए-तैयबा प्रमुख हाफिज सईद के खिलाफ कोई कार्रवाई करने में विफल रहना पाकिस्तान की मुसीबत बन रहा है। अगस्त दो हजार सत्रह में ट्रंप प्रशासन द्वारा करीब पचीस करोड़ डॉलर की विदेशी सैन्य मदद पर रोक लगा दी थी। पाकिस्तान चीन के कर्ज में फंस चुका है। अमेरिका से मिल रही आर्थिक सहायता का उपयोग पाकिस्तान आतंकी गतिविधियां रोकने में कम और भारत के ख़िलाफ़ आतंकी गतिविधियों को बढ़ावा देने के लिए ज़्यादा करता था।
राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने पाकिस्तान को करोडों डॉलर की सैन्य सहायता रोके जाने के अपने प्रशासन के फैसले को उचित बताया। पाकिस्तान अमेरिका के लिए कोई काम नहीं करता और वहां की सरकार ने अलकायदा सरगना ओसामा बिन लादेन को छिपने में मदद की थी। दो हजार ग्यारह में अमेरिकी के नेवल स्पेशल वारफेयर डेवलपमेंट ग्रुप बल ने हेलीकॉप्टर से वहां हमला किया था और लादेन को मार गिराया था। पाकिस्तान में सैन्य अकादमी के समीप रहता था। वहां के लोग उसे जानते थे।
पाकिस्तान को साल में एक अरब डॉलर से ज्यादा दिए जाते थे। पाकिस्तान ने अपने बचाव में अमेरिका से सवाल किया। लेकिन यह सवाल खुद उसके गले पड़ गया। पाकिस्तान ने कहा था कि अमेरिका उसे दोष न दे, अपना मूल्यांकन करना चाहिए कि नाटो के एक लाख चालीस हजार, ढाई लाख अफगान सौनिकों तथा एक ट्रिलियन डॉलर अफगान युद्ध पर खर्च करने के बावजूद आज तालिबान पहले से ज्यादा मजबूत क्यों है। इसका सीधा जबाब है कि पाकिस्तान के दोहरे खेल से स्थिति में सुधार नहीं हुआ। वह आतंकी संघठनों को पनाह देता रहा। पिछले पन्द्रह वर्षों में पाकिस्तान को तैतीस अरब डालर की सहायता दिया जाना एक मूर्खतापूर्ण कदम था। उसके बदले में अमेरिका को सिवाय धोखे तथा विश्वासघात के कुछ नहीं मिला। पाकिस्तान की ओर से दोनों संगठनों पर कोई कार्रवाई ना करने से हताश हो कर ट्रम्प प्रशासन को यह निर्णय लेना पड़ा। इन संगठनों ने काफी समय से पाकिस्तान में शरण लिए हुए हैं और इनके हमलों से अफगानिस्तान में अमेरिकी, अफगानी और अन्य देशों के कई जवान मारे जा चुके है।
इमरान के अनुसार नाइन इलेवन के बाद पाकिस्तान ने आतंकवाद के खिलाफ छेड़ी गई लड़ाई में अमेरिका का साथ देने का फैसला किया। इमरान खान अपना दुखड़ा सुना रहे है। उनका दावा है कि अमेरिका की इस लड़ाई में पचहत्तर हजार पाकिस्तानी मारे गए और अर्थव्यवस्था को एक सौ तेईस अरब डॉलर का नुकसान हुआ जबकि अमेरिका से मिलने वाली राहत सिर्फ बीस अरब डॉलर की थी। अमेरिकी रुख ने इमरान को परेशान कर दिया है। वह कटोरा लेकर भटक रहे है। सऊदी और चीन ने पाकिस्तान को छह-छह अरब डालर की मदद का भरोसा दिया है। पाकिस्तान को अपना कामकाज चलाने के लिए मौजूदा वित्तीय वर्ष में करीब बारह करोड़ डॉलर चाहिए। पिछले दो महीनों में दूसरी बार इमरान सऊदी अरब गए है। इमरान सऊदी अरब से करीब छह सौ करोड़ डॉलर की नकद मदद और खरीदे गए तेल का भुगतान बाद में करने की गुहार लगाने गए थे। पाकिस्तान को ऋण देने को लेकर अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष ने अपनी शर्ते कड़ी कर दी हैं।
इमरान अब पाकिस्तान की हकीकत का सामना कर रहे है। आतंकवाद विरोध के अभियान में सहयोग से हुए नुकसान का विवरण दे रहे है। लेकिन वास्तविकता यह है कि अमेरिकी सहायता का नेताओं और सेना में बंदरबांट हुआ। आतंकियों की आपसी हिंसा में पाकिस्तानी मारे गए। पाकिस्तान सीमापार आतंकवाद फैलाता रहा।
यह अच्छा है कि अमेरिका ने पाकिस्तान के आतंकी रूप को पहचाना है। डोनाल्ड ट्रंप का निर्णय पाकिस्तान पर दबाब बनाएगा। अमेरिका को यहां तक लाने में नरेंद्र मोदी की कूटनीति का अहम योगदान है।








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