सीबीआई को जांच सौपना कारगर

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डॉ दिलीप अग्निहोत्री
उन्नाव प्रकरण की जांच सीबीआई को सौपने का निर्णय कारगर रहा। एसआईटी रिपोर्ट मिलने के तत्काल बाद सरकार ने सीबीआई जांच का निर्णय लिया था। इससे जाहिर हुआ कि सरकार विधायक सहित किसी भी आरोपी को बचाना नहीं चाहती थी। बल्कि मसले की गंभीरता देखते हुए वह जांच में अनेक तथ्यों को शामिल करने का प्रयास कर रही थी। यह सही है कि हाई कोर्ट को इस मामले में हस्तक्षेप करना पड़ा। सरकार और जांच ने उसका पालन किया।
लेकिन इतना तय था कि सीबीआई जांच के बाद आरोपी विधायक को गिरफ्तार होना ही था। सीबीआई ने आरोपी विधायक को कोर्ट में पेश किया। उसे चौदह दिन की न्यायिक हिरासत में भेजा गया। सीबीआई ने चौदह दिन की रिमांड मांगी। विधायक के वकील ने इसका विरोध नहीं किया। कोर्ट ने इक्कीस अप्रैल तक उन्हें सीबीआई के हवाले कर दिया। इससे जाहिर है कि सरकार इस मामले की निष्पक्ष, त्वरित और व्यापक जांच का मन बना चुकी थी। उसी दिशा में वह चल रही थी। पीड़ित परिवार के प्रति सहानुभति स्वभाविक थी। पीड़िता के पिता की मौत दर्दनाक थी। इस आरोप में विधायक के भाई पहले ही गिरफ्तार हो चुके थे।
स्थानीय स्तर पर पुलिस की भूमिका पर सवाल उठने स्वभाविक थे। सरकार ने शुरुआत में एसआईटी जांच का निर्णय लिया था। एसआईटी, डीआईजी जेल और उन्नाव जिला प्रशासन की रिपोर्ट पर सफीपुर के सीओ और दो डॉक्टरों को सस्पेंड कर दिया था। अब पीड़िता के पिता पर क्रॉस केस की जांच भी सीबीआई करेगी। जेल के तीन अन्य डॉक्टरों के खिलाफ भी सरकार ने निर्णय पहले ही लिया था। एसआईटी ने ही बताया था कि दोनों परिवारों के बीच पुरानी रंजिश रही है। इसके अलावा पीड़िता के बयान को विरोधाभाषी बताया गया था। संभव है कि इस कारण विधायक की गिरफ्तारी में बिलंब हुआ। लेकिन सरकार की नीयत ठीक थी। इस कारण एसआईटी रिपोर्ट के बाद ही सीबीआई जांच का निर्णय लिया गया। सीबीआई ने विधायक पर शिकंजा कस दिया था। उनके खिलाफ तीन मामलों में रिपोर्ट दर्ज कर कार्रवाई प्रारंभ की गई थी। इसमें रेप, पीड़िता के पिता से मारपीट और उसके बाद उनकी मौत का मामला शामिल है। पांच घण्टे में ही सीबीआई ने जांच शुरू कर दी थी। पीड़िता के पिता को मारने में विधायक के भाई को दोषी पाया गया था। इस कारण एसआईटी ने विस्तृत जांच का सुझाव दिया था। इससे भी जाहिर है कि सरकार इस मामले में लगातार कार्रवाई कर रही थी।
निश्चित ही मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के लिए ये कठिन समय था। उन्हें विपक्ष के साथ अपने लोगों की नाराजगी झेलनी पड़ी। विपक्ष ने इस प्रकार आलोचना की जैसे वह उत्तर प्रदेश में सुशासन की विरासत छोड़ कर गए थे। वैसे विपक्ष का कार्य आलोचना करना होता है।
लेकिन कई अपनों के भी स्वर बदल गए। भाजपा की एक प्रवक्ता ने सीधे राष्ट्रीय अध्यक्ष अमित शाह से गुहार लगा दी। यहां तक कहा कि सरकार के निर्णय शर्मशार करने वाले है। इसमें जल्दी हस्तक्षेप न किया गया तो नरेंद्र मोदी और पार्टी के सपने टूट जाएँगे।  मीडिया और विपक्ष ऐसी टिप्पणियों के इंतजार में रहता है। टिप्पणी भी सोशल मीडिया में जारी कर दी जाती है, जिससे वह सभी लोगों तक पहुंच जाए। यदि किसी को वास्तव में पार्टी की चिंता है, तो वह हाईकमान तक अपनी बात पहुंचता। लेकिन सोशल मीडिया का सहारा लेने के साथ ही उद्देश्य बदल जाता है।
जबकि यह मानना होगा कि योगी आदित्यनाथ ने एक वर्ष में ऐसा कोई कार्य नहीं किया है, जिसके चलते भाजपा को शर्मशार होना पड़े। इतना अवश्य है कि उनको मिली विरासत अनुमान से कहीं ज्यादा बदहाल है। पीड़िता के अत्यधिक घायल पिता को अस्पताल की जगह जेल में रखने का फैसला, व्यवस्था में बड़ी गड़बड़ी का ही परिणाम है। ऐसा भी नही की यह सब पहली बार हुआ है। कई बार सजायाफ्ता नेता दर्द की शिकायत करते है, उन्हें जेल भेजने की जगह अस्पताल ले जाया जाता है। कई मामलों में उनका स्वास्थ्य सामान्य पाया जाता है। वही घायल व्यक्ति को इलाज नसीब न हो, यह व्यवस्था में दशकों से चली आ रही अंधेरगर्दी का परिणाम है। योगी आदित्यनाथ ने इसे गंभीरता से लिया है। पूरे प्रकरण में नीचे से ऊपर तक के पुलिस वालों की भूमिका  भी सीबीआई जांच के दायरे में है। गड़बड़ी करने वालों पर शिकंजा कसना तय है।
योगी ने मीडिया ट्रायल भी झेले। खैर ये सब लोकतंत्र में चलता रहता है। किसी से शिकायत का यह अवसर नहीं है।  लेकिन सरकार व्यापक दायरे में जांच चाहती थी। जांच एजेंसी अपना कार्य कर रही है। दोषी का निर्णय न्यायपालिका को करना है। वहाँ तक पहुंचने का इंतजार करना होगा। एक वर्ष पहले और आज के बयानों में अंतर का अवश्य ही कोई कारण होगा। यह भी जांच का विषय है। सीबीआई ने इस ओर भी ध्यान दिया है।
पीडि़ता के उस कथित बयान की भी व्यापक जांच होनी चाहिए जिसे एक साल पूर्व वर्तमान में चल रहे मुकदमें के संदर्भ  में दिया गया बताया जा रहा है।इसमें  जिसमें पीडि़ता ने औरैया निवासी दो लोगों का नाम लिया था। तब पीडि़ता के चाचा ने भी गत वर्ष उस बयान को सही माना था। यद्यपि उन्होंने उस समय भी पुलिस की भूमिका पर प्रश्न उठाये थे।  यह सही है कि बिना व्यापक जांच के किसी निष्कर्ष पर नहीं पहुंचा जा सकता। सोशल मीडिया पर चलने वाली बातों की सत्यता भी जांचनी होगी ।
यह मानना होगा कि सीबीआई अपनी तरफ से कोई भी बिंदु नजरअंदाज नहीं कर रही है। वह सभी कड़ियों को जोड़ते हुए आगे बढ़ रही है।  इसके तहत सीबीआई ने उस महिला को भी गिरफ्तार किया है, जिस पर पीड़िता ने विधायक की परिचित होने और उनसे मिलवाने का आरोप लगाया था। यह भी ठीक है कि हाई कोर्ट भी इस मामले की निगरानी कर रहा है।  जांच की दिशा, दशा पर भी उसकी नजर है। वस्तुतः योगी आदित्यनाथ ऐसी ही जांच चाहते थे, जो न्याय और निष्पक्षता पर आधारित हो। इसमें कुछ दिन का बिलंब हुआ, लेकिन सीबीआई को सौपने के बाद जांच में तेजी आई है।
.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है

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