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    Home»ब्लॉग»Current Issues

    राजनीति: जहरीला होता जमीन का पानी

    By March 21, 2018 Current Issues No Comments7 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    देश के तीन सौ साठ जिलों को भूजल स्तर में गिरावट के लिए खतरनाक स्तर पर चिह्नित किया गया है। भूजल स्तर बढ़ाने के लिए प्रयास तो किए जा रहे हैं लेकिन खेती, औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण जहर होते भूजल को लेकर कोई चिंता नहीं की जा रही। बारिश, झील व तालाब, नदियों और भूजल के बीच यांत्रिकी अंतर्संबंध है। जंगल और पेड़ भूजल स्तर बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।

     

    जमीन में पानी का अकूत भंडार है। यह पानी का सर्वसुलभ और स्वच्छ स्रोत है। लेकिन यदि एक बार दूषित हो जाए तो इसका परिष्करण लगभग असंभव होता है। भारत में जनसंख्या बढ़ने के साथ घरेलू इस्तेमाल, खेती और औद्योगिक उपयोग के लिए भूगर्भ जल पर निर्भरता बढ़ती जा रही है। जमीन से पानी निकालने की प्रक्रिया ने भूजल को खतरनाक स्तर तक जहरीला बना दिया है। इसके लिए समाज और सरकार दोनों जिम्मेदार हैं। भारत कृषि प्रधान देश है। दुनिया में सबसे ज्यादा खेती भारत में ही होती है। यहां पांच करोड़ हेक्टेयर से ज्यादा जमीन पर जुताई होती है। खेतों की जरूरत का इकतालीस फीसद पानी सतही स्रोतों से व इक्यावन फीसद जमीन से मिलता है। पिछले पचास सालों के दौरान भूजल के इस्तेमाल में एक सौ पंद्रह गुना का इजाफा हुआ है।

    भूजल के बेतहाशा दोहन से एक तो जल स्तर बेहद नीचे चला गया है, साथ ही जहरीला भी होता जा रहा है। देश के लगभग एक-तिहाई जिलों का भूगर्भ जल पीने लायक नहीं है। दो सौ चौवन जिलों में पानी में लौह तत्त्व की मात्रा अधिक है, तो दो सौ चौबीस जिलों के जल में फ्लोराइड तय सीमा से बहुत ज्यादा है। एक सौ बासठ जिलों में खारापन और चौंतीस जिलों में आर्सेनिक पानी को जहर बनाए हुए है। सनद रहे कि देश के तीन सौ साठ जिलों को भूजल स्तर में गिरावट के लिए खतरनाक स्तर पर चिह्नित किया गया है। भूजल स्तर बढ़ाने के लिए प्रयास तो किए जा रहे हैं, लेकिन खेती, औद्योगीकरण और शहरीकरण के कारण जहर होते भूजल को लेकर कोई चिंता नहीं की जा रही। बारिश, झील व तालाब, नदियों और भूजल के बीच यांत्रिकी अंतर्संबंध है। जंगल और पेड़ भूजल स्तर बढ़ाने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। इसी प्रक्रिया में कई जहरीले रसायन जमीन के भीतर रिस जाते हैं। ऐसा ही दूषित पानी पीने के कारण देश के कई इलाकों में अपंगता, बहरापन, दांतों का खराब होना, त्वचा के रोग, पेट खराब होना जैसी बीमारियां फैली हुई हैं। ऐसे ज्यादातर इलाके आदिवासी बहुल हैं और वहां पीने के पानी के लिए भूजल के अलावा कोई विकल्प नहीं है।

    दुनिया में चमड़े के काम का तेरह फीसद भारत में और भारत के कुल चमड़ा उद्योग का साठ फीसद तमिलनाडु में है। चेन्नई के आसपास पलार और कुंडावानुर नदियों के किनारे चमड़े के परिष्करण की हजारों इकाइयां हैं। चमड़े को साफ करने की प्रक्रिया से निकले रसायनों के कारण राज्य के आठ जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा का आधिक्य पाया गया है। दांतों और हड्डियों का दुश्मन फ्लोराइड सात जिलों में निर्धारित सीमा से कहीं अधिक है। दो जिलों में आर्सेनिक की मात्रा भूजल में बेतहाशा पाई गई है। आंध्रप्रदेश के दस जिलों के भूजल में नाइट्रेट की मात्रा पैंतालीस मिलीग्राम से भी ज्यादा पाई गई है। जबकि फ्लोराइड की डेढ़ मिलीग्राम के खतरनाक स्तर से अधिक मात्रा वाला भूजल ग्यारह जिलों में पाया गया। भारी धातुओं व आर्सेनिक के आधिक्य वाले आठ जिले हैं। राज्य के प्रकाशम, अनंतपुर और नलगोंडा जिलों में भूगर्भ जल का प्रदूषण स्तर इस सीमा तक है कि वह मवेशियों के लिए भी अनुपयोगी करार दिया गया है। कर्नाटक की राजधानी बंगलुरु और झीलों की नगरी कहलाने वाले धारवाड़ सहित बारह जिलों के भूजल में नाइट्रेट का स्तर पैंतालीस मिलीग्राम से अधिक है। फ्लोराइड के आधिक्य वाले तीन जिले व भारी धातुओं के प्रभाव वाला एक जिला भद्रावती है। सर्वाधिक साक्षर व जागरूक कहलाने वाले केरल का भूजल भी जहर होने से बच नहीं पाया है।
    यहां के पालघाट, मल्लापुरम, कोट्टायम सहित पांच जिले नाइट्रेट की अधिक मात्रा के शिकार हैं। पालघाट व अल्लेजी जिलों के भूजल में फ्लोराइड की अधिकता होना सरकार द्वारा स्वीकारा जा रहा है। पश्चिम बंगाल में भी पाताल का पानी बेहद खतरनाक स्तर तक जहरीला हो चुका है। यहां के नौ जिलों में नाइट्रेट और तीन जिलों में फ्लोराइड की अधिकता है। बर्धवान, चौबीस परगना, हावड़ा, हुगली सहित आठ जिलों में जहरीला आर्सेनिक पानी में बुरी तरह घुल चुका है। राज्य के दस जिलों का भूजल भारी धातुओं के कारण बदरंग, बेस्वाद हो चुका है। ओडिशा के चौदह जिलों में नाइट्रेट के आधिक्य के कारण पेट के रोगियों की संख्या लाखों में पहुंच चुकी है। जबकि बोलांगीर, खुर्दा और कालाहांडी जिलों फ्लोराइड के आधिक्य के कारण गांव-गांव में पैर टेढ़े होने का रोग फैल चुका है।
    अहमदनगर से वर्धा तक लगभग आधे महाराष्ट्र के तेईस जिलों के जमीन के भीतर के पानी में नाइट्रेट की मात्रा पैंतालीस मिलीग्राम के स्तर से ज्यादा हो चुकी है। इनमें मराठवाड़ा क्षेत्र के लगभग सभी तालुके शमिल हैं। भंडारा, चंद्रपुर, औरंगाबाद और नांदेड़ जिले के गांवों में हैंडपंप का पानी पीने वालों में दांत के रोगी बढ़ रहे हैं, क्योंकि इस पानी में फ्लोराइड की मात्रा काफी ज्यादा है। तेजी से हुए औद्योगीकरण और शहरीकरण का खमियाजा गुजरात के भूजल को चुकाना पड़ रहा है। यहां के आठ जिलों में नाइट्रेट और फ्लोराइड का स्तर जल को जहर बना रहा है। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल के बड़े हिस्से के भूजल में यूनियन कारबाइड कारखाने के जहरीले रसायन घुल जाने का मुद्दा अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चित रहा है। इसके बावजूद लोग हैंडपंपों का पानी पीने को मजबूर हैं और बीमार हो रहे हैं।
    राज्य के ग्वालियर सहित तेरह जिलों के भूजल में नाइट्रेट का असर निर्धारित मात्रा से कई गुना ज्यादा मिला है। फ्लोराइड के आधिक्य की मार झेल रहे जिलों की संख्या हर साल बढ़ रही है। इस समय ऐसे जिलों की संख्या नौ है। नागदा, रतलाम, रायसेन, शहडोल आदि जिलों में विभिन्न कारखानों से निकले अपशिष्टों के रसायन जमीन में कई-कई किलोमीटर गहराई तक घर कर चुके हैं और इससे पानी अछूता नहीं है। उत्तर प्रदेश का भूजल परिदृश्य तो बेहद डरावना बन गया है। लखनऊ, इलाहाबाद, बनारस सहित इक्कीस जिलों में फ्लोराइड का आधिक्य दर्ज किया गया है। बलिया का पानी आर्सेनिक की अधिकता से जहर हो चुका है। गाजियाबाद, कानपुर आदि औद्योगिक जिलों में नाइट्रेट और भारी धातुओं की मात्रा निर्धारित मापदंड से काफी ज्यादा है।
    देश की राजधानी दिल्ली और उससे सटे हरियाणा और पंजाब में भूजल खेतों में अंधाधुंध रासायनिक खादों के इस्तेमाल और कारखानों के अपशिष्टों के जमीन में रिसने से दूषित हुआ है। दिल्ली में नजफगढ़ के आसपास के इलाके के भूजल को तो इंसानों के इस्तेमाल के लायक नहीं करार दिया गया है। खेती में रासायनिक खादों व दवाइयों के बढ़ते प्रचलन ने जमीन की नैसर्गिक क्षमता और उसकी परतों के नीचे मौजूद पानी को भारी नुकसान पहुंचाया है। राजस्थान के कोई बीस हजार गांवों में जल की आपूर्ति का एकमात्र जरिया भूजल ही है और उसमें नाइट्रेट व फ्लोराइड की मात्रा खतरनाक स्तर पर पाई गई है। यहां के सत्ताईस जिलों में खारापन, तीस में फ्लोराइड का आधिक्य और अट्ठाईस में लौह तत्त्व अधिक हैं। दिल्ली सहित कुछ राज्यों में भूजल के अंधाधुंध इस्तेमाल को रोकने के लिए कानून बन गए हैं। लेकिन ये कानून किताबों से बाहर नहीं आ पाए हैं। यह अंदेशा सभी को है कि आने वाले दशकों में पानी को लेकर सरकार और समाज को बेहद मशक्कत करनी होगी। ऐसे में प्रकृतिजन्य भूजल का जहर होना मानव जाति के अस्तित्व पर प्रश्नचिह्न लगा सकता है।
    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार है

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