मानवीय मूल्य की क्रांति के आदर्श बाबा साहब

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जी के चक्रवर्ती

आज हमारे देश में दलितों को जो भी अधिकार मिले हुए हैं उसकी पृष्ठभूमि इसी शासन की देन थी। यूरोप में हुए पुर्नजागरण और ज्ञानोदय आंदोलनों के बाद मानवीय मूल्यों का महिमा मंडन हुआ। यही मानवीय मूल्य यूरोप की क्रांति के आदर्श बने। इन आदर्शों की जरिए ही यूरोप में एक ऐसे समाज की रचना की गई जिसमें मानवीय मूल्यों को प्राथमिकता दी गई। ये अलग बात है कि औद्योगिकीकरण के चलते इन मूल्यों की जगह सबसे पहले पूंजी ने भी यूरोप में जगह ली। ..लेकिन इसके बावजूद यूरोप में ही सबसे पहले मानवीय अधिकारों को कानूनी मान्यता दी गई। इसका सीधा असर भारत पर पड़ना लाजमी था और पड़ा भी। इसका सीधा सा असर हम भारत के संविधान में देख सकते हैं।

भारतीय संविधान की प्रस्तावना से लेकर सभी अनुच्छेद इन्ही मानवीय अधिकारों की रक्षा करते नज़र आते हैं। भारत में दलितों की कानूनी लड़ाई लड़ने का जिम्मा सबसे सशक्त रूप में डॉ॰ अम्बेडकर ने उठाया। डॉ अम्बेडकर दलित समाज के प्रणेता हैं। बाबा साहब अंबेडकर ने सबसे पहले देश में दलितों के लिए सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक अधिकारों की पैरवी की। साफ दौर भारतीय समाज के तात्कालिक स्वरूप का विरोध और समाज के सबसे पिछडे़ और तिरस्कृत लोगों के अधिकारों की बात की। राजनीतिक और सामाजिक हर रूप में इसका विरोध स्वाभाविक था। यहां तक की महात्मा गांधी भी इन मांगों के विरोध में कूद पड़े।

बाबा साहब ने मांग की दलितों को अलग प्रतिनिधित्व मिलना चाहिए यह दलित राजनीति में आज तक की सबसे सशक्त और प्रबल मांग थी। देश की स्वतंत्रता का बीड़ा अपने कंधे पर मानने वाली कांग्रेस की सांसें भी इस मांग पर थम गई थीं। कारण साफ था समाज के ताने बाने में लोगों का सीधा स्वार्थ निहित था और कोई भी इस ताने- बाने में जरा सा भी बदलाव नहीं करना चाहता था। महात्मा ग़ांधी जी को इसके विरोध की लाठी बनाया गया और बैठा दिया गया आमरण अनशन पर।

आमरण अनशन वैसे ही देश के महात्मा के सबसे प्रबल हथियार था और वो इस हथियार को आये दिन अपनी बातों को मनाने के लिए प्रयोग करते रहते थे। बाबा साहब किसी भी कीमत पर इस मांग से पीछे नहीं हटना चाहते थे वो जानते थे कि इस मांग से पीछे हटने का सीधा सा मतलब था दलितों के लिए उठाई गई सबसे महत्वपूर्ण मांग के खिलाफ में हामी भरना। लेकिन उन पर चारों ओर से दबाव पड़ने लगा। और अंततः पूना पैक्ट के नाम से एक समझौते में दलितों के अधिकारों की मांग को धर्म की दुहाई देकर समाप्त कर दिया गया। इन सबके बावजूद डॉ॰अंबेडकर ने हार नहीं मानी और समाज के निचले तबकों के लोगों की लड़ाई जारी रखी। अंबेडकर की प्रयासों का ही ये परिणाम है कि दलितों के अधिकारों को भारतीय संविधान में जगह दी गई। यहां तक कि संविधान के मौलिक अधिकारों के जरिए भी दलितों के अधिकारों की रक्षा करने की कोशिश की गई।

आज भी दलितों की लड़ाई वादस्तूर जारी है अभी हाल ही में केरल के कन्नूर क्षेत्र में थालीपराम्बा में महात्मा गांधी की मूर्ति पर अज्ञात लोगों द्वारा क्षति पहुंचाने की द्रष्टि से मूर्ति के चश्मे को तोड़ दिया गया है। तमिलनाडु के चेन्नई के तिरुवोत्तियोर में अज्ञात लोगों ने डॉक्टर भीमराव अंबेडकर की मूर्ति पर पेंट पोत दिया है।  मूर्ति तोड़े जाने का पहला सिलसिला त्रिपुरा से सामने आया था। यहां लेनिन की मूर्ति को बुलडोजर से ढहा दिया गया था। इसके बाद तमिलनाडु में हथौड़े की मदद से पेरियार की मूर्ति क्षतिग्रस्त कर दी गई। उसके बाद दक्षिण कोलकाता में श्यामा प्रसाद मुखर्जी की मूर्ति पर काली स्याही फेंके जाने की घटना सामने आई थी। तमिलनाडु के वेल्लोर जिले में मंगलवार के 8 मार्च 2018 के दिन रात के वक्त त्रिपट्टुर कोर्पोरेशन के ऑफिस में रखी हुई पेरियार की मूर्ति को तोड़ने की कोशिश की गई थी। मेरठ में संविधान निर्माता भीम राव अंबेडकर की मूर्ति तोड़ने की घटना भी सामने आई थी। यहां मवाना क्षेत्र के एक गांव में अंबेडकर की मूर्ति तोड़कर हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। दलितों में भी इसको लेकर आक्रोश पैदा हो गया था। बताया गया कि करीब छह महीने पहले भी इसी मूर्ति को तोड़कर हिंसा फैलाने की कोशिश की गई थी। आखिर कार इन बेजान मूर्तियों को तोड़ कर अपना गुस्सा जाहिर करने का तरीका कहाँ तक सही है। यह केवल मूर्ति मात्र ही नहीं है वल्कि हमारे देश की राष्ट्रीय धरोहरों को क्षति पहुंचा कर या उन्हें तोड़ कर आखिर कार लोग क्या हासिल करना चाहते हैं?

.लेखक वरिष्ठ पत्रकार है