ऐसों का ऐसा ही अंजाम होता है !

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मैं विकास दुबे हूं कानपुर वाला, गिरफ्तारी के बाद विकास दुबे के यह शब्द अपना परिचय देने के लिए इस्तेमाल किये गये, इन शब्दों के जरिए वह अपनी हनक बता रहा था,  उस दहशत का परिचय दे रहा था, जो पिछले एक हफ्ते में लोगों के मन में बैठा चुका था। दहशत ऐसी वैसी भी नहीं बहुत बड़ी, यूपी के अपराधिक इतिहास में शायद श्रीप्रकाश शुक्ला के बाद कोई दूसरा ऐसा अपराधी चर्चा में आया जिसने इतने कम समय में अपनी हनक इतनी बना ली हो।
विकास की गिरफ्तारी के बाद उसके हनक पर एक बड़ी चोट भी लगी। जब वह अपना परिचय पुलिस वालों को बता रहा था, तभी सिपाही ने एक कंटाप उसके सिर पर मारा। यह कंटाप या थप्पड़ पुलिस का था। मेरी नजर में पुलिस के यह कंटाप की तस्वीर आज की सबसे बड़ी तस्वीर है। जो अपराधियों के दहशत और हनक को चूर करती है। यह कंटाप यह दिखाता है, पुलिस है। देश में कानून का राज है। सिर्फ गोली से ही नहीं एक थप्पड़ से भी किसी का खौफ खत्म किया जा सकता है।
एक हफ्ते में उठा विकास का शोर कुछ वैसा ही है जो 90 के दशक के कुख्यात अपराधी श्रीप्रकाश शुक्ला का हुआ करता था। बहन को छेड़ने वाले का मर्डर करके श्रीप्रकाश बदमाश बना। फिर कई नेताओं और बदमाशों का काम लगा, उसने छोटी उम्र में बड़ी हैसियत बना ली। एक दौर में यूपी के अखबार उसी की खबरों से रंगे होते थे। लखनऊ के हर नुक्कड़, चाय की दुकान और पान की गुमटियों  पर उसी की बातें होती थीं। बेलगाम श्रीप्रकाश ने भी पुलिस वाले का खून बहाया था, कहा जाता है उसने तत्कालीन यूपी के मुख्यमंत्री की भी सुपारी ले ली थी। पुलिस वाले के निशाने पर आए श्रीप्रकाश का काम आखिर लग ही गया, सितंबर 1998 को एसटीएफ ने उसे ढेर कर दिया।  यहां श्रीप्रकाश शुक्ला का जिक्र सिर्फ इसलिए है कि उसकी दहशत और हनक विकास दुबे से मिलते जुलते हैं।
हालांकि श्री प्रकाश का खौफ विकास की तुलना में काफी लंबे समय तक रहा। इसके साथ ही मेरा मानना यह भी है की विकास और श्रीप्रकाश दोनों के दिमाग में बहुत फर्क है।  दिमाग का फर्क यह है कि श्रीप्रकाश पुलिस की गोली से ढेर हो गया वहीं विकास दुबे साथियों के एनकाउंटर के बाद भी जिंदा है। साथियों के मौत के बाद भी उसका अब तक जिंदा बचना यह बताता है कि वह हल्के दिमाग का नहीं है।
अब विकास पुलिस की गिरफ्त था । सवाल यह भी है कि यह गिरफ्तारी थी या विकास का सरेंडर। सवाल यह भी है कि उसकी गिरफ्तारी के साथ ही क्या कानपुर की खूनी वारदात का अंत हो गया? और कितनों के नाम के खुलासे होने थे, शायद अब नहीं…. लेकिन यह राज राज ही रह गया।
– विवेक गुप्ता से 

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