आज कोरोना को लेकर सम्पूर्ण देश जो भयावह स्थिति बनी हुई है, वह किसी से छुपी नही है। आज से एक वर्ष पूर्व कोरोना ने जिस तरह से तांडव किया था, उससे हम क्या सम्पूर्ण दुनिया जी सिहर उठी थी, लेकिन विशेषतः हमारे देश मे कुछ समय तक तो कोरोना का प्रकोप कम रहने के कारण हम सभी लोग बेफिक्र से हो गये, इसके बाद कोरोना संक्रमण का टीका आने के बाद तो जैसे हम सब कुछ भुलाने को तैयार बैठे थे लेकिन अचानक से कोरोना की दूसरी लहर ने हम सभी को फिर से एक बार झकझोर दिया।
अब जब से इसका टीका उपलब्ध हुआ तो पहले टीका लगवाने में आना-कानी और टीका लग जाने के बाद में मनमानी करने लगे। यह बात इस समय का कटु सत्य है और यह भी सत्य है कि हमें किसी को परखने के स्थान पर एक-दूसरे का हाथ थाम कर साथ चलने से स्थिती को जल्दी से संभलेगी, लेकिन बहुत अफसोस कि बात है कि हम ऐसा नही कर रहे हैं। बल्कि हम बहुत व्याकुल और परेशान होने के बीच पूरी व्यवस्था को परखने और कोसने में लगे हुए हैं जिसके हम भी एक हिस्सा हैं।
आज से एक वर्ष पहले जब कोरोना के पहले दौर ने हमें निगलना शुरू किया था, उस समय हमारे भीतर का आध्यात्म, स्वछता और सहिष्णुता जाग गया था लेकिन जैसे ही इसका प्रकोप कम पड़ा तो हम फिर से निश्चिंत हो गये और एक बार पुनः एक-दूसरे को पीछे छोडक़र आगे बढऩे की आपा-धापी में संलग्न हो गये।
लेकिन आज जब फिर से एक बार हालात बेकाबू हो गये हैं तो हमारे निशाने पर सरकार और सरकारी तंत्र आ गये है और यह स्वाभाविक भी है। दवा, ऑक्सीजन, बिस्तर स्वास्थ कर्मियों की कमी एक बड़े संकट के रूप में हमारे सामने आ खड़े हुये हैं, इसके अभाव में लोग लाइलाज मरने को मजबूर है तो सरकार पर क्रोध आना कहीं से गलत नहीं कहा जा सकता है। लेकिन क्या आलोचना मात्र से स्थिति ठीक हो सकेगी? इसके उत्तर हमे नहीं कहना पड़ेगा लेकिन यह भी उचित है कि समय-समय पर तर्क और तथ्यों के साथ तंत्र की कमजोरीयों को उजागर करते रहना देश के नागरिक होने के कारण हमारी जिम्मेदारी भी है। बिगड़ी और बेकाबू तंत्र की कमजोरी सामने आते ही सरकार चौकस हो जाती है। शायद ऐसा करने से समाज में एक तरफ सकरात्मकता का भाव उत्पन्न होता है तो दूसरी तरफ हम समाज के एक जिम्मेदार नागरिक कहलाने योग्य होंगे।
– प्रस्तुति: जी के चक्रवर्ती







