- जी के चक्रवर्ती
हम सभी देश वासियों ने देखा और झेला इस लॉकडाउन को, इस महामारी से पूरी की पूरी इंसानी विरासत ही थर्रा उठी देखते- देखते उसने इंसानी समाज के समस्त परिपाटियों को ध्वस्त कर दिया ऐसे में कौन कहाँ जाए क्या करे, किसी के कुछ समझ में नही आया देखते देखते मिल कल-कारखाने रोजी -रोटी से जुड़ी समस्त चीजे धड़ा-धड़ा बन्द होती चली गयीं किसी ने अपने श्रमिकों को कुछ दिया और किसी ने वह भी नही दिया ऐसे में एक श्रमिक जो अपने प्रतिदिन की मेहनत करने के बाद जो धन उपार्जन करता है उससे व मुश्किल वह अपने परिवार जानो की पेट ही भर पता है ऐसी स्थिति में वह अपने आकस्मिक मुसीबत कोरोना ने इंसानो के लिये पैदा किया है।

वह आमदिनों अपने साथ-साथ परिवार के भरण- पोषण के लिये बामुश्किल धन कमा पाता है उन चंद रुपयों में से उसके भविष्य के लिये उसके पास कुछ नही बचता है जिससे वह प्रयः निसहाय हो जाता है कितना विचित्र है हमारे देश की परिपार्टी कि जो मजदूर अपने और अपने परिवार के साथ ही अपने ही देश की मिल कारखानों में प्रतिदिन उत्पादन करने के लिये दिलों जान से जुटा रह कर खून-पसीना एक कर देता है, वही श्रमिक अपने देश और देश वासियों के बीच उसके मिल- कारखाने अचानक बन्द होते ही सौतेला सा व्यवहार करने लगता है।
अचानक पैदा होने वाले संकट में वह एक दम निसहाय किंतविमुड़ हो जाता है। यह है तो उसी का देश जिसके प्रत्येक नागरिकों के लिये देश के मिल कारखानों में न जाने उसने अपने कितनी खुशियो और अपने परिवारों की परवाह न करते हुऐ भी न जाने कितनी कुर्बानी दी होंगी लेकिन मात्र एक विपदा ने उसे अपने देश और देशवासियों से पल भर में पराया कर दिया।
यहां यह प्रश्न उठाना लाजमी ही है कि आखिरकार श्रमिकों को उसके ही देश और देशवासियोँ के मध्य निसहाय क्यों हों जाना पड़ता है? क्या इसके लिये हमारा श्रम कानून जिम्मेदार नही है? केवल हमारे देश के श्रमिक ही नही वल्कि देश का प्रत्येक नागरिक देश का धरोहर संपत्ति होता है, क्योंकि किसी भी देश के नागरिक सम्पूर्ण देश के अर्थशास्त्र और श्रम शक्ति से जुड़ा हुआ एक पूंजी व संपत्ति है और उसी के श्रम से बनने वाले तरह-तरह के उत्पादों से केवल देश ही नही वल्कि सम्पूर्ण दुनियां जानी पहचानी जाती है और कुछ नायाब वस्तुयें तो उस देश की पहचान स्वरूप एक यादगार के रूप में स्थापित हो जाती है।
वैसे देखा जाए तो किसी भी देश का जागीर सही अर्थों में उसका नागरिक होता है। वह उसके देश के लिये एक धरोहर स्वरूप होता है वह उस देश की संम्पदा है ऐसे में यह यह प्रश्न उठता है कि जब हमारा श्रमिक हमारी पूंजी और शक्ति है तब उसके परिवार की जानमाल की सुरक्षा की गारंटी वह देश क्यों नही दे सकता है? जबकि मात्र श्रमिक ही नही देश का प्रत्येक नागरिक अपने देश के लिये उसका धन-संम्पदा होता है तब देश के प्रत्येक नागरिक को उसके देश द्वारा जीवन जीने की गारंटी सुनिश्चित अवश्य किया जाना चाहिये और यही मानवसंसाधन मंत्रालय का भी मूलमंत्र है। – जी के चक्रवर्ती







