व्यंग: अंशुमाली रस्तोगी
लाइफ में सबकुछ मिलना इतना सरल न होता। संघर्ष तो करना ही पड़ता है। जीने से लेकर मृत्यु तक संघर्ष ही संघर्ष है। फिर भी, कुछ संघर्ष ऐसे होते हैं जो ‘लाइन मारने’ पर निर्भर करते हैं। जी हां, लाइन मारना भी संघर्ष की ही निशानी है।
अमूमन लोग लाइन मारने को गलत-सलत अर्थों में ले लेते हैं। कहीं की बात कहीं ले जाकर लाइन का महत्व खत्म कर देते हैं। मैंने ऐसे भद्रजनों को बहुत करीब से देखा-जाना है, जिन्होंने नौकरी से लेकर शादी तक ‘लाइन मार संघर्ष’ किया है। जब तलक नौकरी में रहे बॉस को लाइन मारते रहे, जब शादी के बंधन में बंध गए बीवी को लाइन मारने का फर्ज निभाया। वो तो गनीमत रही कि बीवी ने उनकी लाइन मारने की आदत को कभी अदरवाइज नहीं लिया। सब स-हर्ष स्वीकार किया।
इन दिनों जिस तेजी से ‘बाजार’ हम पर लाइन मार रहा है, हम चारों खाने चित्त हैं। कोई पर्व, कोई त्यौहार, कोई उत्सव हो बाजार ग्राहकों पर लाइन मारना नहीं छोड़ता। लुत्फ यह है कि हम बाजार के लाइन मारने का रत्तीभर बुरा नहीं मानते। न उसे बीच चौराहे गलियाते हैं। न थाने में रपट दर्ज करवाते हैं। न सरकार न किसी पायदार मंत्री-संत्री से शिकायत ही करते हैं। बल्कि बाजार को पूरा चांस देते हैं कि वो आए और हम पर दिल खोलकर लाइन मारे।
किस्म-किस्म के ऑफर्स और डिस्काउंट लाइन मारने के बहाने ही तो हैं।
न केवल बाजार, देश-दुनिया में कहीं भी निकल जाइए- हर कहीं, हर कोई किसी न किसी दृष्टिकोण से लाइन मारता हुआ दिख ही जाएगा। ये बात अलग है कि हम किस लाइन मारने को किस प्रकार से लेते हैं।
साहित्य में क्या कम लाइन मारूं हैं! एक से बढ़कर एक लाइनबाज मिल जाएंगे यहां। लेख से लेकर किताब छपवाने तक लेखक-साहित्यकार जाने कितनी तरह की लाइनें मार देता है। आलम यह है, साहित्य की हर विधा में लाइन मारी जा रही है। कहीं ज्यादा तो कहीं कम।
कठिन और व्यस्त जीवन में अगर दो-चार दफा लाइन मारने का सुख मिल रहा है- मैं तो कहता हूं- ले लीजिए। चांस हाथ से निकल जाने के बाद कहीं ‘पछताना’ न पड़े। – चिकोटी से साभार








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