गैरकानूनी ड्रग ट्रायल रोकने के लिए कब संजीदा होगी सरकार!

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दवाओं के गैर कानूनी तरीके से होने वाले परीक्षणों को लेकर हमारे देष की सबसे बड़ी अदालत सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर कड़ा रुख अख्तियार किया है। अदालत ने इस मामले में केन्द्र और राज्य सरकार दोनों को फटकार लगाते हुए कहा कि सरकार बहुराष्ट्रीय कंपनियों के गैर कानूनी तरीके से किए जा रहे परीक्षण के इस कारोबार को रोकने के लिए समुचित तंत्र स्थापित करने में पूरी तरह से नाकाम साबित हुई है। एक गैर सरकारी संगठन स्वास्थ अधिकार मंच की जनहित याचिका पर सुनवाई के दौरान न्यायमूर्ति आरएम लोढ़ा और न्यायमूर्ति अनिल आर दवे की खंडपीठ ने सरकार को उसके ढुलमुल रवैये के लिए आड़े हाथों लेते हुए कहा कि उसे विभिन्न सवालों के जवाब देने से बचना नहीं चाहिए।

अदालत का यह गुस्सा गैर वाजिब नहीं था। शीर्ष अदालत ने बीते साल अक्टूबर में केन्द्र और सभी राज्य सरकारों को इस समस्या पर काबू पाने के लिए व्यावहारिक उपाय करने का निर्देष दिया था। अदालत के निर्देश के बाद केन्द्र सरकार ने उस वक्त एक विषेषज्ञ समिति भी गठित कर दी थी। लेकिन अफसोस ! इस कमेटी ने अभी तक अपना काम पूरा नहीं किया है। जब अदालत ने इस संबंध में सरकार से जवाब तलब किया, तो उसने टका सा जवाब देते हुए कहा कि समिति से उसे अभी सुझाव नहीं मिले हैं और सुझाव मिलते ही इस बारे में अदालत को सूचित किया जाएगा। जाहिर है, अदालत की नाराजगी इसी बात को लेकर ज्यादा थी कि इतना समय हो जाने के बाद भी सरकार ने अपना काम पूरा नहीं किया है। गौरतलब है कि अदालत ने केन्द्र सरकार से दवा परीक्षणों के कारण होने वाली मौतों अगर कोई हो, और उसके दुष्प्रभावों व पीड़ित या उसके परिवार को दिए गए मुआवजे, अगर दिया गया हो, के बारे में विवरण मांगा था।

यह पहली बार नहीं है, जब दवाओं के गैर कानूनी परीक्षण और उसके तौर तरीकों को लेकर अदालत ने सवाल उठाए हों। बल्कि इससे पहले भी एक याचिका की सुनवाई के दौरान षीर्ष अदालत ने तीखी टिप्पणी की थी कि इंसानों के साथ जानवरों की तरह सलूक करना बेहद दुर्भाग्यपूर्ण है। बावजूद इसके सरकार ने अपना रवैया नहीं बदला। इतना सब कुछ हो जाने के बाद भी न तो दोषी दवा कंपनियों के खिलाफ कोई कार्रवाई हुई और न ही पीड़ित मरीजों के परिवार को वाजिब मुआवजा दिया गया।

उलटे केन्द्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन की ओर से मुआवजे के लिए जिन फार्मूलों पर आधारित नए दिशा-निर्देष तय किए जा रहे हैं, सरकार उसमें परीक्षण को अंजाम देने वाले पक्षों की ही सहुलियत का ख्याल रख रही है। मसलन यदि दवा परीक्षण की वजह से किसी षख्स को कोई शारीरिक नुक्सान पहुंचता है या उसकी मौत हो जाती है, तो मुआवजे का निर्धारण उसकी उम्र, आय और रोग की गंभीरता के आंकलन के आधार पर दिया जाएगा। सरकार के पास इस बात का शायद ही कोई जवाब हो कि पीड़ित यदि घरेलू महिला, विद्यार्थी, बच्चा या कोई बेरोजगार शख्स है, तो उसके लिए कितना मुआवजा तय किया जाएगा ? एक बात और, आय के मामले में जहां अधिकतम आमदनी की कोई सीमा नहीं रखी गई है, वहीं न्यूनतम मजदूरी की राशि को कम से कम आय का मानक बनाया गया है। जाहिर है, यदि यह नियम अमल में आ गए, तो विभिन्न कंपनियां अपनी दवाओं के परीक्षण के लिए ज्यादातर गरीब तबके के भोले भाले लोगों का ही चुनाव करेंगी। जिन्हें मामूली रकम देकर आसानी से चुप कराया जा सके। यही नहीं कभी मुआवजा देने की नौबत आती भी है, तो मरीज पर प्रभाव का आंकलन वे नैतिकता समितियां तय करेंगी, जिन्हें संबंधित अस्पताल नियुक्त करेंगे।

कायदे से जब भी नई दवाओं का इंसानों पर परीक्षण किया जाता है, तो इस परीक्षण के लिए स्वास्थ विभाग, राज्यों की नामित विषेषज्ञ कमेटी की संस्तुति और संबंधित अस्पतालों की आचार समितियों से मंजूरी जरूरी होती है। ऐसे रोगियों को लगातार विषेषज्ञ डॉक्टरों और कुषल नर्सों की निगरानी में रखना पड़ता है। यही नहीं, जिन मरीजों पर दवाओं का परीक्षण किया जाता है, उनसे भी सहमति पत्र पर हस्ताक्षर करवाना लाजमी है। चूंकि, ये परीक्षण 3 या 4 दौर में किए जाते हैं और इसमें दवाओं के बुरे असर की आशंका से भी इंकार नहीं किया जा सकता। लिहाजा, ऐसे में लोगों को इन परीक्षणों के लिए रजामंद करवा पाना बेहद मुष्किल काम होता है। लेकिन, फिर भी हमारे देश में यह परीक्षण आसानी से हो रहे हैं।

दवा निर्माता कंपनियां, बिचौलियों की मदद से सरकार की ठीक नाक के नीचे यह काम बखूबी कर रही हैं। बिचौलिए अस्पतालोंं और मेडिकल कॉलेजों में डॉक्टरों को मुंह मांगी रकम देकर इसके लिए तैय्यार कर लेते हैं। फिर उसके बाद चोरी छिपे संबंधित दवाओं का परीक्षण किया जाता है। मध्य प्रदेश में इंदौर और भोपाल के जिन अस्पतालों में इंसानों पर यह गैर कानूनी परीक्षण हो रहे थे, वहां भी बिल्कुल यही तरीका अपनाया गया। गैर सरकारी संगठन स्वास्थ अधिकार मंच का दावा है कि इंदौर में 3300 से अधिक व्यक्तियों पर इस तरह के गैर कानूनी परीक्षण किए गए। जिसमें 15 सरकारी डॉक्टर और 10 निजी अस्पतालों के तकरीबन 40 डॉक्टर शामिल थे। संगठन ने अपनी याचिका में यहां तक इल्जाम लगाया है कि 283 मानसिक रोगियों और एक दिन से 15 साल की आयु वर्ग के 1833 बच्चों पर ये गैर कानूनी दवा परीक्षण किए गए। जिसके लिए सरकारी डॉक्टरों को संबंधित कंपनी ने करीब 55 करोड़ रूपए दिए।

आम भारतीय का बहुराष्ट्रीय दवा कंपनियों की दवाओं के लिए गिनीपिग यानी परीक्षण चूहा बनाने का यह सिलसिला कोई नया नहीं है। अमेरिका और यूरोप की बड़ी-बड़ी दवा कंपनियां अपने यहां के सख्त काननों के चलते बरसों से भारत में अपनी दवाओं का परीक्षण कर रही हैं। ड्रग ट्रायल जैसी आधुनिक विधा के लिए हमारे यहां सख्त कानून नहीं हैं। जाहिर है, ऐसे में यह दवा कंपनियां परीक्षण के लिए आसानी से डॉक्टरों को खरीद लेती हैं। एक बात और, विदेषी कंपनियों को दीगर देशों के मुकाबले भारत में दवा परीक्षण 60 फीसदी तक सस्ते पड़ते हैं। यही वजह है कि वे दूसरे और तीसरे चरण के परीक्षण भारत में ही करती हैं। फिर हमारे यहां जिस तरह की गरीबी और अषिक्षा है, उससे मरीजों को यह पता ही नहीं चलता कि डॉक्टर उन्हें जो दवा दे रहे हैं, वह सही है या गलत। उनका डॉक्टरों पर पूरा यकीन रहता है, लिहाजा परीक्षण के दौरान जिन कागजों पर उनसे दस्तखत करने को कहा जाता है, वे कर देते हैं। इंदौर के मेडिकल कॉलेज में भी यही सब कुछ हुआ। मरीजों को अंधेरे में रखकर डॉक्टर चोरी-छिपे दवाओं का परीक्षण करते रहे।

यह बात सच है कि ड्रग ट्रायल ऐलोपैथी की बुनियाद है। ड्रग ट्रायल हों मगर मरीजों की जान की शर्त पर नहीं। अस्पताल में अपनी छोटी-बड़ी बीमारियों के इलाज के लिए पहुंचने वाले मरीजों पर, देषी-विलायती दवा कंपनियों द्वारा विकसित की जा रही दवाईयों का उनकी जानकारी और इजाजत के बिना प्रयोग करना, एक जघन्य अपराध है। जिसकी जितनी भी सजा दी जाए, वह कम है। अब वक्त आ गया है कि ड्रग ट्रायल के नाम पर देश में बरसों से जो गोरखधंधा चल रहा है, उस पर सख्ती से लगाम लगे। सरकार चिकित्सीय परीक्षण का प्रभावी नियमन करे, ताकि किसी अनियमितता या अनुचित काम को तुरंत रोका जा सके। इन गड़बड़ियों पर रोक लगाने के लिए सरकार क्लीनिकल ट्रायल के उन क्षेत्रों को अपने विनियामक नियंत्रण के तहत लाए, जो अब तक विनियमित नहीं किए गए हैं। क्लीनिकल ट्रायल से जुड़े नियमों को मजबूत बनाने के लिए औषधि और प्रसाधन सामग्री नियम 1945 में संशोधन की भी दरकार है, ताकि परीक्षण के चलते मरीज को होने वाली स्वास्थ संबंधी समस्या या उसकी मौत के मामले में एक वाजिब मुआवजा मिल सके। यही नहीं, चिकित्सा जैसे मुकद्दस पेशे को अपने काले कारनामों से बदनाम करने वाले डॉक्टरों पर भी सख्त कार्रवाईयां हों।

जब तक अस्पतालों और परीक्षण में बिचौलिए का काम कर रहे लोगों के खिलाफ देश में कठोर कानून नहीं बन जाता, तब तक इस प्रवृति पर रोक लगाना आसान काम नहीं। यूरोपीय देषों में दवा परीक्षणों को लेकर सख्त कायदे कानून हैं। गुनहगार पाए जाने पर वहां दवा कंपनियों और डॉक्टरों को भारी जुर्माना और सजा का प्रावधान है। लिहाजा, वहां दवा कंपनियां अपनी मनमानियां नहीं कर पातीं। यही नहीं इस मामले में हेलसिंकी घोषणापत्र नाम से अंतरराष्ट्रीय मानक भी तय है। लेकिन हमारी सरकारें यह सब देखते हुए भी कोई सबक नहीं सीखतीं। सर्वोच्च न्यायालय के दवाब में बीते साल केन्द्रीय दवा मानक नियंत्रण संगठन ने जैसे तैसे चिकित्सीय परीक्षणों के संबंध में एक दिशा-निर्देश तैयार किया, लेकिन इसमें भी मुआवजे का तर्कसंगत निर्धारण नहीं किया गया। बहरहाल, अदालत के हालिया दिशा-निर्दे शों पर सरकार क्या कदम उठाती है, यह तो आने वाला वक्त ही बतलाएगा। अभी तलक के अनुभव से तोे सरकार से ज्यादा उम्मीदें नहीं बंधतीं।

  • जाहिद खान

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