गोमती नदी की दूषित गंदगी देखकर लगता है अब उसकी अपनी सहनशक्ति जवाब दे रही है। पर्यावरण दिवस पर बड़ी-बड़ी बातें और वादे अब उसकी समझ में नहीं आ रहे हैं जलस्तर और घटने उसमें प्रदूषण के बढ़ने से हालात अब कोढ़ में खाज की तरह बनते जा रहे हैं। प्रदूषण के कारण पानी में ऑक्सीजन की मात्रा कम होती जा रही है। और इससे जलीय जीवों के लिए जीवन का खतरा बढ़ गया है। प्रकृति की ओर से भला इसमें ज्यादा इससे ज्यादा सटीक एवं गंभीर रूप में चेतावनी और क्या हो सकती है। यह तो उस गोमती के दम तोड़ने जैसी स्थिति है जिसे हम जीवनदायिनी को अतिविशिष्ट विशेषण देते नहीं थकते।
गंभीर तथ्य यह है कि गोमती की दयनीय स्थिति दूरदराज के इलाकों में नहीं बल्कि लखनऊ के कई इलाकों में सामने आई है यूपी की राजधानी होने के नाते लखनऊ में कोई काम बिगड़ना इसलिए मायने रखता है, क्योंकि काम सही ढंग से चलाने के लिए आदेश देने के लिए मंत्री और अधिकारी इसी शहर में हैं। और यदि सही मायने में कहा जाये तो सबसे ज्यादा सुविधाएं भी यहीं हैं।
इसके अलावा हर जरूरत का सामान यूपी सरकार के कर्णधार यहाँ अधिक आसानी से उपलब्ध करा सकते हैं साथ ही सार्वजनिक व राष्ट्रीय महत्व के कामों की प्रकृति पर पूरी सतर्कता के साथ नजर भी रख सकते हैं। यह होना भी चाहिए लेकिन खेद की बात है कि गोमती के मामले में ऐसा नहीं हो रहा है। इस बारे में तथ्य यह भी है कि गोमती की सफाई के नाम पर अरबों रुपए का खर्च दिखाया जा चुका है।
लेकिन जो गोमती की बदहाली है वह खुद ही अपना दर्द बयान कर रही है ध्यान रखने की बात यह है कि देश में नदियों की सफाई के लिए खुद प्रधानमंत्री भी जोर देते रहते हैं इसलिए गंगा की सफाई के लिए तो अच्छे खासे बजट के साथ मंत्रालय भी हैं। इसमें नदियों की सफाई की जरूरत खुद स्पष्ट होती है लेकिन सरकारी कामों की तरह जिस तरह गंगा की सफाई हो रही है। उससे कहीं ज्यादा खानापूर्ति गोमती की सफाई के नाम पर की गई है। बात सिर्फ शोक मनाने आलोचना की नहीं है बल्कि गंभीरता के साथ सोचने की है आज गोमती का जलस्तर करीब 2 हफ्ते से तमाम कोशिशों के बाद भी नहीं बढ़ा है वह लगातार दूषित होती जा रही है और यदि यही हाल रहा तो भविष्य में उसके पानी का इस्तेमाल नुकसानदायक हो सकता है बल्कि घातक भी हो सकता है तब क्या डिब्बाबंद और बोतलबंद पानी उसकी उपयोगिता एवं प्रयोग की जगह ले पाएगा, यह तो बहुत असंभव ही लगता है।
आमतौर पर यह भी देखा गया है विभिन्न संसथाओ द्वारा गोमती सफाई अभियान चलाया जाता है लेकिन मात्र जलखुंभी को एक दो घाट के पास से हटा देने से कुछ समय के लिए नदी साफ़ तो हो जाएगी, लेकिन फिर दूसरे दिन स्थिति जस की जस बन जाएगी, ऐसा कब तक होता रहेगा, जरुरत यहाँ बड़े स्तर पर सोचने की है जब भगीरथ गंगा को जमीं पर ला सकते है तो हम इंसान क्या अपनी जीवनदायनी गोमती को आपस में मिलकर साफ़ नहीं कर सकते, कर सकते है बस जरुरत है दृढ इच्छाशक्ति की!







