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    कागज बचेगा तो पेड़ बचेगा

    By March 24, 2018 Hot issue No Comments6 Mins Read
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    पंकज चतुर्वेदी

    संसद सत्र के दौरान प्रशनकाल के लिए हर दिन लगभग एक ट्रक कागज, जिसमें विभिन्न प्रश्नों के जवाब व उससे संबंधित दस्तावेज होते हैं, संसद भवन जाता है और शाम होते-होते इसका अधिकांश हिस्सा रद्दी हो जाता है। ठीक यही हालात देशभर की विधानसभाओं के हैं। कभी इस पर कोई ठोस अध्ययन तो हुआ नहीं, लेकिन अनुमान है कि हर साल महज संसदीय कार्यों के लिए कुछ ही घंटे के वास्ते कोई 2100 ट्रक कागज बर्बाद होता है।  इसी तरह विभिन्न विभाग की मीटिंगेां के लिए तैयार की जाने वाली रिपोर्ट, अनुशंसाएं, सदस्यों के लिए कार्यवाही रिपोर्ट आदि पर कागज का व्यय हजरों टन है। इस पर लगा व्यय, श्रम, परिवहन आदि अलग है। एक तो कुछ ही घंटों में इससे उपजे कचरे का निस्तारण, दूसरा इसे तैयार करनेे में काटे गए पेड़ों का हिसाब लगाएं तों स्पश्ट होगा कि भारत की कार्यपालिका, विधायिका और न्यायपालिका की कार्य व्यवसथा में मामूली से सुधार कर दिया जाए तो हर साल हजारों पेड़ों को कटने से रोक जा सकता है, वहीं कई लाख टन कचरे में कमी की जा सकती है।

    उल्लेखनीय है कि दो साल हिमाचल प्रदेश विधानसभा ने कागज-रहित सदन के प्रयोग के तहत सभी तरह के प्रश्नों के जवाब टेब्लेट पर प्रदान करने का सफल प्रयोग किया है। इसमें कोई साढ़े छह हजार करोड़ का व्यय हुआ और सालाना पंद्रह करोड़ की बचत हुई।  पिछले साल केरल विधानसभा ने भी विधायकों के प्रश्न ऑनलाईन भेजने और उसका जवाब भी डिजिटल उपलब्ध करवाने का सफल प्रयोग किया है। दिल्ली विधानसभा में विधायकों द्वारा पूछे गए प्रश्नों के जवाब अब सरकारी महकमें ईमेल या पेन ड्राईव पर दे रहे हैं। केरल और मध्य प्रदेश विधानसभओं में भी विधायकों द्वार प्रश्न पूछने के लिए ऑनलाईन पद्धति का इस्तेमाल किया जा रही है। हरियाणा विधानसभा को भी ई- सिस्टम के लिए तैयार किया जा रही है। इतने प्रयोगों के बावजूद यदि छोटे-बड़े सरकारी महकमों में जा कर देखें तो कागजों की बेवजय आफिस कॉपी सहेजने या फोटो प्रतियां रखने की गैरजरूरी कवायदें चल रही हैं। ये कागज की बर्बादी के साथ-साथ ऐसे रिकार्ड को रखने के लिए स्थान की बर्बादी भी होता है।

    पिछले दिनों एक केंद्रीय कार्यालय में स्वयंसेवी संस्थाओं को वित्तीय सहायता देने के प्रस्तावों पर बैठक का अयोजन हुआ, जिसमें कुल 18 सरकारी व गैर सरकारी सदस्य व कुछ विभागीय कर्मचारी षामिल थे। इसके लिए आवेदन करने वाली संस्थाओं का विवरण और पिछली बैठक का कार्यवृत आदि सभी सदस्यों को दिए गए। हर एक सदस्य के पास कोई आठ सौ पन्ने थे। पांच बाईंडिंग में सामग्री दी गई थी। सतर्कता और रिकार्ड के लिए कुछ अतिरिक्त बाईंडिंग भी बनाई गईं। यानि कुछ घंटे की मीटिंग के लिए लगभग बीस हजार फोटोकॉपी वाले चिकने कागज होम हो गए। ना तो कोई सदस्य उन पुलिंदे को अपने घर ले गया और ना ही उसका इस्तेमाल उस बैठक के बाद कुछ रह गया। ऐसी सैंकड़ों बैठकें पूरे देश में हर दिन होती हैं। हजारों संस्थाअेंा की वार्शिक रपट छपती हैं, लाखों फोटोकापी कहीं प्रवेश तो कहीं नौकरी की अर्जी के नाम पर होती है। हास्यास्पद यह है कि जिन दस्तावेजों का रिकार्ड स्वयं सरकारी महकमों में होता है, उसे अपने रिकार्ड में चैक करने के बनिस्पत उनकी फोटोकॉपी मंगवा कर फिर उससे मूल के मिलान का कार्य किया जाता है। इस तरह होने वाले कागज का व्यय हर दिन में करोड़ों पन्ने।

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    यह तो सभी जानते हैं कि कागज पेड़ों की लुगदी (पल्प) से बनता है। पिछले चार दशकों में कागज का उपयोग 400 फीसदी बढ़ गया है। एक टन अच्छी गुणवत्ता वाले पेपर बनाने के लिए 12 से 17 पेड़ लगते हैं। सारी दुनिया में हर रोज  कागज बनाने के लिए 80 हजार से 150 हजार पेड काटे जाते हैं । साक्षरता दर में वृद्धि और औधोगिक विकास में वृद्धि के कारण साल-दर-साल कागज की माँग बढ रही है। भारत में कागज और गत्तों की मौजूदा खपत लगभग 100 लाख टन होने का अनुमान है। देश में लगभग सभी प्रकार के कागज मिलों की उत्पादन क्षमता बढ़ रही है और कारखानों को पुनिर्मित किया जा रहा है। यह अनुमान लगाया गया है कि 2025 तक देश में कागज की मांग करीब 2.5 करोड़ मेट्रिक टन होगी, जो वास्तव में भारतीय कागज उद्योग से मिलना आसान नहीं है। एक तो हमारे यहां वन और कृशि भूमि का रकवा घट रहा है, दूसरा हरियाली के लिए पारंपरिक पेड़ों को रोपने की प्रवृति भी कम हो रही है। पेड़ कम होने से सांस लेने के लिए अनिर्वाय आक्सीजन की कमी, ग्लोबल वार्मिंग, जलवायु परिवर्तन जैसी दिक्कतें बढ़ रही हैं। एक तरह पढ़े-लिखों की संख्या में इजाफे और कार्यालयीन कार्य बढ़ने से कागज की बढती मांग है तो दूसरी ओर कागज उपजाने के मूल तत्व पेड़ों का संकट।

    देश में सामाजिक-आर्थिक विकास की दृष्टि से कागज उद्योग देश का सबसे पुराना और बेहद महत्वपूर्ण उद्योग है। अनुमान है कि इस व्यवसाय में कोई 25000 करोड़ रूपये  की पूंजी लगी है। दुनिया के कागज उत्पाद में इसका हिस्सा लगभग 1.6 प्रतिशत है।  इस उद्योग में लगभग सवा लाख लोग सीधे और कोई साढ़े तीन लाख लोग अप्रत्यक्ष रूप से रोजगार पा रहे हैं। पिछले पाँच वर्षों से कागज की खपत लगभग 6 प्रतिशत वार्षिक दर से बढ़ रही है।  लेकिन ब़ढते पर्यावरणीय संकट के चलते इसके विकास में विराम की प्रबल संभावना है।

    अजब संकट है, एक तरह ज्ञान की वर्शा तो दूसरी तरह पेड़ की कटाई से प्रकृति के अस्तित्व को संकट। कहा जाता है कि एक परिवार सालभर में छह पेड़ों से बने कागज चट कर जाता है। हमारे देा की शिक्षा व्यवस्था में हर साल नौ लाख टन कागज लगता हे। अब इस व्यय पर तो नियंत्रण किया नहीं जा सकता। ऐसे में उन संस्थाओं को अपने कागज के व्यय पर नियंत्रण करना होगा जहां इनका इस्तेमाल महज औपचारिकता या कुछ घंटे के लिए हो रहा है।

    इसके अलावा सरकारी कार्यालयों में कागज के दोनों तरफ लिखने का अनिवार्यता, प्रत्येक कागज की आफिस कॉपी रखने, वहां से निकले कागज को पुनर्चक्रण के लिए भेजने की व्यवस्था जैसे कदम उठाए जाने चहिए। बार-बार पाठ्य पुस्तकें बदलने से रोकने और बच्चों को अपने पुराने साथियों की पुस्तकों से पढ़ने के लिए प्रेरित करना भी कागज की बर्बादी रोकने का एक सशक्त कदम हो सकता है। विभिन्न सदनों, अदालतों, कार्यालयों में पांच पेज से ज्यादा के ऐजेंडे, रिपोर्ट आदि को केवल डिजिटल कर दिया जाए तोकागज की खपत कम कर, पेड़ों का संरक्षण और शिक्षा के अत्यावश्यक कागज की आपूर्ति के बीच बेहतरीन सामंजस्य बनाया जा सकता है। इससे पेड़ के साथ-साथ कूड़ा व श्रम बच सकता है।

    .लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार है

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