मंगलवार को भारत के आह्वान के सिलसिले में एक अहम बात सामने यह आई कि बिना किसी मशहूर संगठन या दल के आह्वान के बावजूद इस बार पूरे देश में इसकी गूंज इस तरह पहुंची कि जैसे मानों इसके लिए कितने लंबे समय से तैयारी चल रही हो। यहां तक कि केंद्रीय गृह मंत्रालय ने इसके संबंध में राज्यों को बकायदा परामर्श भी जारी किया तथा राज्य सरकारों द्वारा भी इससे निपटने के लिए ठीक उसी स्तर पर इंतजाम किए गए जैसे किसी गंभीर स्थिति का सामना करने के लिए किए जाते हैं। इंतजाम किया जाना तो ठीक है क्योंकि स्थिति गंभीर होने के बाद यह कदम उठाने का इंतजार करना अक्सर बहुत महंगा पड़ जाता है लेकिन केवल एक ऐसे आह्वान के आधार पर जो पता नहीं कहां से आया और छा गया। यदि इतना आतंक छा जाए तो इसका मतलब कि उसमें कहीं न कहीं दम था।

तथ्य यह है कि दहशत का यह माहौल बनाने में सोशल मीडिया की सबसे अहम और महत्वपूर्ण भूमिका मानी जा रही है सोशल मीडिया की आवाज़ आज किसी देश में किसी से छुपी नहीं है। उत्साह और उत्तेजना में इस पर आने वाले संदेशों के आगे पीछे की कोई भी सोचता नहीं बल्कि उसी के मुताबिक काम करने में जुट जाता है दरअसल यह अफवाह फैलाने जैसा काम ही है जिसमें अब तक कोई भी तकनीक मददगार साबित नहीं हो पायी है वही देखने की बात यह भी है कि आखिर क्या वजह है कि आरक्षण के विरोध के मुद्दे पर सोशल मीडिया पर सन्देश इस तरह हाथों-हाथ लिया गया समर्थन या विरोध को लेकर चर्चा का दौर चलने का सीधा अर्थ है कि आम लोग उसके बारे में गंभीरता से सोचें और निष्कर्ष निकाल रहे हैं। इस सोच में सोच व निष्कर्ष की दिशा भ्रम पूर्ण हो सकती है पर इसका मतलब यह भी है कि संबंधित मुद्दे पर नागरिकों की अपेक्षाएं बढ़ रही हैं जिसमें सही और गलत का फर्क करना चाहते हैं हो सकता है कि ऐसा होने में कुछ समाज विरोधी तत्वों का भी हाथ हो सकता है इसमें उन्हें हाथ सेकने का मौका मिलता है।
ऐसे कई उदाहरण है। जिनमे उन कारणों को खोजने की जरूरत बढ़ जाती है जिसमें ऐसी स्थितियां परिस्थितियां क्यों पैदा होती हैं? यदि इन्हें पहचान लिया जाए तो कई समस्याओं का हल काफी पहले भी मिल सकता है।







