नरेन्द्र त्रिपाठी
यूं तो जल हमारे आपके जीवन से जुड़ा बेहद महत्वपूर्ण मुद्दा है और इसके अभाव में फसलें सूखने पर किसानों के खुदकुशी करने से लेकर पीने का पानी दूरदराज के क्षेत्रों में कई किलोमीटर पैदल चलकर लाने की मजबूरी जैसी ख़बरें आये दिन सुर्खियों में रहती हैं, बावजूद इसके बड़ी-बड़ी बातों के अलावा जमीनी स्तर पर कुछ नहीं किया गया। इस वजह से देश के बड़े भूभाग के लोग आज जलसंकट से जूझ रहे हैं। हालत ये है कि दशकों के कुप्रबंधन और राजनैतिक इच्छा शक्ति के अभाव में जल संकट भयावह स्थिति तक पहुंच गया है। राज्यों के बीच नदियों के जल को लेकर झगडे़ लगातार बढ़ रहे हैं। यहां तक कि हर झगड़े में देश के सर्वोच्च न्यायालय को दखल देना पड़ रहा है। देश में चार केन्द्रीय संस्थाएं हैं, जो भूजल विनियमन में काम कर रही हैं, लेकिन सम्पूर्ण भारत के जल संसाधन का कोई केंद्रीयकृत आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। साल 2016 में संसद की जल संसाधन स्टैंडिंग कमेटी ने एक राष्ट्रीय भूजल संसाधन डाटा बेस बनाने की संस्तुति की। इसे हर दो साल में अपडेट करने की बातें हुईं, पर व्यवहार में कुछ ठोस काम नहीं हुआ।देश के किसी भी शहर में पाईप द्वारा चौबीस घंटे स्वच्छ पानी देने की व्यवस्था नहीं है। भूजल निकासी के लिए कोई पर्याप्त कानून के न होने की वजह से जल के अवैध निकासी को बल मिला। बढ़ते शहरीकरण ने शहरों में वर्षा जल के पर्याप्त संरक्षण में कमी की। शहरीकरण से पहले प्राकृतिक रूप से जमीन की मिट्टी में बरसात का पानी चला जाता था, लेकिन अब क्रंकीट के जंगलों के कारण ऐसा नहीं हो पा रहा है। नतीजा ये है कि शहरों में गर्मी लगातर बढ़ रही है। सीधे तौर पर कहा जाए तो वनों में कमी का मतलब वर्षा में कमी जो अंत में जल के बड़े संकट के रूप में सामने आता है। सतह के ऊपर के जल की स्थिति बहुत खराब है। वहीं, जमीन के अंदर के जल की स्थिति उससे भी ज्यादा खराब है। कीटनाशकों के अत्यधिक प्रयोग ने इसको बेहद प्रदूषित किया है।
इस पर भी शहरों में स्वच्छ जल की होड़ के नाम पर वाटर प्यूरीफायर का कारोबार मानकों को ताक में रखकर धड़ल्ले से चल रहा है। वाटर प्यूरीफायर पानी साफ करने के लिए कितना पानी बर्बाद कर रहे हैं, इसकी बानगी ‘मेसाचुसेट्स इंस्टीट्यूट ऑफ टेक्नोलॉजी’ और ‘कम्प्रेहिंसिव इनीशिएटिव ऑन टेक्नोलॉजी इवाल्यूशन’ के संयुक्त शोध में मिलती है। अहमदाबाद में हुए इस शोध के अनुसार छब्बीस लीटर पीने का पानी प्राप्त करने के लिए चैहत्तर लीटर नमकीन पानी को बहा दिया गया। हैरानी वाली बात है कि कोई भी आरओ उत्पादक इस बर्बाद हुए पानी को सहेजने का विकल्प उपभोक्ताओं को नहीं देता है। जबकि इस पानी का इस्तेमाल नहाने, पेड़ों को पानी देने और पीने के अलावा अन्य कार्यों में बेहद आसानी से किया जा सकता है। विकास का एक पक्ष ये भी है, जिसमें जल जैसे कीमती संसाधन को यूं ही बर्बाद किया जा रहा है, पर जिम्मेदार आंखे होते हुए भी पट्टी बांधकर गान्धारी की भूमिका अदा कर रहे हैं।
इस बात से हर कोई वाकिफ है और ये खुला सच है कि भारत में बीते कुछ दशकों में शहरीकरण तेजी से बढ़ रहा है। इसके लिए कोई शोध करने की आवश्यकता नहीं और शहरीकरण की पहली शर्त पक्के निर्माण हैं, जिसमें भारी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है पर हैरानी वाली बात है कि देश में इस निर्माण में होने वाले भूजल (पेयजल) के इस्तेमाल के तौर तरीकों को लेकर कुछ भी स्पष्ट नहीं है। इसका नतीजा है कि भूजल स्तर लगातार और नीचे जा रहा है। बड़ी संख्या में लोग अंधाधुंध बोरिंग करते हुए सबमर्सिबल पम्प लगाकर जल की अवैध निकासी कर रहे हैं। इनका कोई आंकड़ा सरकार के पास नहीं हैं। नतीजा आय की दृष्टि से दुर्बल लोग पानी के लिए सरकार द्वारा नल की सप्लाई वाले पानी पर निर्भर हैं, जिसके समय में लगातार कमी आती जा रही है और वे कम और खराब गुणवत्ता वाले पानी के प्रयोग के लिए अभिशप्त हैं।
जल संसाधन मंत्रालय की रिपोर्ट के अनुसार, भारत में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता 2001 में प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता के आंकड़ों के सन्दर्भ में 2025 तक इसमें छतीस प्रतिशत की कमी आयेगी। वहीं, 2050 तक जब भारत की जनसंख्या 1.7 बिलियन होगी साठ प्रतिशत प्रति व्यक्ति कम जल की उपलब्धता होगी। चेतावनी की घंटी बज चुकी है। खास बात है कि हाल ही में एक पूर्व चेतावनी उपग्रह प्रणाली के अध्ययन पर आधारित जो रिपोर्ट मिली है, वह काफी डराने वाली है क्योंकि यह रिपोर्ट भारत में एक बड़े जल संकट की ओर इशारा कर रही है। भारत, मोरक्को, इराक और स्पेन में सिकुड़ते जलाशयों की वजह से इन चार देशों में नलों से पानी गायब हो सकता है। दुनिया के 500,000 बांधों के लिए पूर्व चेतावनी उपग्रह प्रणाली बनाने वाले डेवलपर्स के अनुसार भारत, मोरक्को, इराक और स्पेन में जल संकट ’डे जीरो’ तक पहुंच जाएगा। यानी नलों से पानी एकदम गायब हो सकता है।
अध्ययन में कहा गया है कि भारत में नर्मदा नदी से जुड़े दो जलाशयों में जल आवंटन को लेकर प्रत्यक्ष तौर पर तनाव है। पिछले साल कम बारिश होने की वजह से मध्य प्रदेश के बांध इंदिरा सागर के ऊपरी हिस्से में पानी इस मौसम के तीसरे सबसे निचले स्तर पर पहुंच गया। जब इस कमी को पूरा करने के लिए निचले क्षेत्र में स्थित सरदार सरोवर जलाशय से पानी लिया गया तो काफी हो-हल्ला मच गया क्योंकि सरदार सरोवर जलाशय में 30 करोड़ लोगों के लिए पेयजल है। पिछले महीने गुजरात सरकार ने सिंचाई रोकते हुए किसानों से फसल नहीं लगाने की अपील की थी।
देखा जाए तो जल संकट का एकमात्र कारण यह नहीं है कि बारिश की मात्रा कम होती जा रही है। इजराइल जैसे देशों में जहां वर्षा का औसत 25 से.मी. से भी कम है, वहां भी जीवन चल रहा है। वहां जल की एक बूंद व्यर्थ नहीं जाती। वहां जल प्रबंधन तकनीक अति विकसित होकर जल की कमी का आभास नहीं होने देती। भारत में 15 प्रतिशत जल का उपयोग होता है, शेष जल बहकर समुद्र में चला जाता है। शहरों एवं उद्योगों से निकलने वाले अपशिष्ट पदार्थ नदियों के जल को प्रदूषित करके पीने योग्य नहीं रहने देते।
ये स्पष्ट है कि आज विश्व में तेल के लिए युद्ध हो रहा है। भविष्य में जल के लिए युद्ध की लगातार सम्भावनाएं जतायी जाती रही हैं। इसलिए अभी से सचेत होना होगा। सोना, चांदी और पेट्रोलियम के बिना जीवन चल सकता है, लेकिन बिना पानी के सब कुछ सूना और उजाड़ होगा। इसलिए हर व्यक्ति को अपनी इस जिम्मेदारी के प्रति सचेत रहना है कि वे ऐसी जीवन शैली तथा प्राथमिकताएं नहीं अपनाएं जिसमें जीवन अमृतरूपी जल का अपव्यय होता हो। भारतीय संस्कृति में जल का वरुण देव के रूप में पूजा-अर्चना की जाती रही है, इसलिए जल की प्रत्येक बूंद का संरक्षण एवं सदुपयोग करने का कर्तव्य निभाना जरूरी है। सीधे तौर पर कहा जाए तो अब यह हमें तय करना है हम प्रकृति के साथ सबका विकास चाहते हैं या फिर ऐसा विकास जो आखिरकार हमें विनाश की ओर ले जाता हो।
(लेखक स्वतंत्र पत्रकार हैं)








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