एक आत्मनिर्भर भारत की परिकल्पना

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जी के चक्रवर्ती

हमारा देश भारत एक बार 21वीं सदी में एक वैश्विक शक्ति बन कर उभरना चाहता है तो इसके लिये भारत को प्रत्येक क्षेत्र में आत्म निर्भरता हासिल करने की परम आवश्यकता है क्योंकि एक आत्मनिर्भर देश सामान्यतः उसे ही माना जाता है जो सभी तरह की उत्पादों को स्वयं अपने ही देश मे उत्पादन करता है और दूसरे देश से आयातीत सामग्रीयों पर उसकी निर्भरता न के बराबर हो।

यदि हम वास्तविक रूप में आत्म निर्भरता हासिल करना चाहते हैं तो इसके सामान्य शाब्दिक अर्थ से कहीं और भी आगे जाने की जरूरत है। दरअसल, जब हम आत्मनिर्भरता की बात करे तो भारत की संस्कृति संस्कार की भावना सम्पूर्ण विश्व को एक परिवार सदृश्य देखता है और जब हम भारत के आत्मनिर्भरता की बात करते है तो उसमें उसके आत्म केंद्रित आत्मनिर्भरता न हो कर बल्कि सम्पूर्ण संसार के सुख सहयोग और शांति की चिंता समाहित होती है।

इस तरह हमारी भारतीय संस्कृति एवं संस्कार में जीव मात्र के कल्याण की मनसा होती है जो भारतीय समुदाय की संस्कृति पृथ्वी को अपनी माँ कहती है और उसे ऐसा मानती भी है तो ऐसे में वह जब आत्मनिर्भरता की बात कहता है तो उसमें एक सुख संम्पन्न विश्व की परिकल्पना रहने के साथ ही साथ विश्व की उन्नति भी समाहित होती है। आज विश्व के सामने भारत का सोचने का तौर- तरीका पूरे विश्व को एक आशा की किरण जैसा नज़र आता है। भारत के परिप्रेक्ष्य में आत्म निर्भरता केवल अर्थ केंद्रित न हो यह मानव केंद्रित होना चाहिए। अर्थात, इस देश पर रहने वाला प्रत्येक प्राणी सुखी एवं सम्पन्न हो यही हमारी अंतिम लक्ष्य भी है।

यदि हम अपने पूर्व इतिहास में झांके तो हमे यह पता चलता है कि हमारे देश की पूर्व अर्थव्यवस्था की एक गौरवशाली इतिहास रहा है, जो भारतीय संस्कृति हज़ारों वर्षों से सम्पन्न रही हो और जिसके कारण उस समय भारत को एक सोने की चिड़िया कहा जाता था और उस भारतीय संस्कृति में भौतिकवाद एवं अध्यात्मवाद दोनों के मध्य एक समन्वय स्थापित कर व्यापार में आचार-विचार का पालन किया जाता है। जिसमें भारतीय जीवन पद्धति में मानवीय पहलुओं को प्राथमिकता दी जाती है। अतः आज हमारे देश में देशी जीवन पद्धति को पुनर्स्थापित करने की जरूरत है। देश के आर्थिक विकास को हम केवल उसके सकल घरेलू उत्पाद एवं प्रति व्यक्ति आय से आंकलन करने के स्थान पर गांवों में रोज़गार के अवसरों एवं नागरिकों के मध्य संपन्नता की दर को भी शामिल कर देखना होगा।

जहां तक इस तरह की आर्थिक विकास के इस मॉडल में कुटीर उद्योग एवं सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्योगों को भी गाँवों के स्तर पर शुरू करने की ज़रूरत है। जिसके कारण गावों में निवास करने वाले ग्रामीण लोगों के स्तर पर रोज़गार के अवसर उपलब्ध हों जिससे गावों के लोगों को शहरों में पलायन की आवश्यकता ही न पड़े। हमारे देश में “गुजरात मिल्क फेडरेशन” की अमूल डेयरी की सफलता के किस्से कहानी को एक उदाहरण के रूप में हम लोगों के सामने रख सकते हैं। अमूल डेयरी उधोग आज 27 लाख से भी अधिक लोगों को रोज़गार दिये हुए हैं। हमारे देश में आज एक अमूल डेयरी जैसे संस्थान की नहीं बल्कि इस तरह के हज़ारों संस्थानों की आवश्यकता है।

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