सराहा क्यों जाता है, परदे का ये खुरदुरा किरदार!

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फिल्मों की दुनिया का अपना अलग ही नजरिया है। यहाँ सिर्फ फिल्मों का हिट और फ्लॉप होना ही, उनके अच्छे और ख़राब होने का मूल्यांकन नहीं है! यहाँ ऐसा भी होता है कि फिल्म के हिट होने और अच्छी कमाई के बाद भी उसे लेकर नकारात्मक टिप्पणियां की जाती है! जब किसी फिल्म को दर्शकों सराहा, बॉक्स ऑफिस पर फिल्म ने अच्छा खासा कलेक्शन किया, फिर क्या कारण है कि फिल्म में खामियाँ ढूंढी जाती है! ऐसा ही कुछ शाहिद कपूर की फिल्म ‘कबीर सिंह’ को लेकर हुआ!

फिल्म ने अच्छा कारोबार किया! दर्शकों ने शाहिद की एक्टिंग को सराहा, किंतु फिल्म में नायक के पुरुषवादी सोच की आलोचना की गई! स्पष्ट तौर पर कहा जाए, तो फिल्म की महिला पात्र के प्रति नायक का सोच सकारात्मक और बराबरी का नहीं लगा! वैसे ‘कबीर सिंह’ पहली फिल्म नहीं है, जिसमें फिल्म के नायक का किरदार इतना खुरदुरा है! नकारात्मक नायक वाले ऐसे प्रयोग पहले भी चुके हैं! आश्चर्य की बात ये कि ‘कबीर सिंह’ की तरह सभी फ़िल्में सफल भी रही!

सालों की मेहनत के बाद बॉलीवुड के इस चॉकलेटी हीरो शाहिद कपूर को आखिर कमाऊ हीरो मान लिया गया! उनकी साऊथ की रीमेक फिल्म ‘कबीर सिंह’ ने अच्छा कारोबार किया। शाहिद की ये पहली सोलो फिल्म है, जिसमें उन्होंने अपनी रोमांटिक नायक वाली इमेज से अलग खुरदुरा सा सनकी किरदार निभाया है। ये ऐसा नायक है, जो पेशे से डॉक्टर है, पर हद दर्जे का नशेबाज, गुस्सैल और सनकी! इसे किसी व्यक्ति का अजब पागलपन भी कहा जा सकता है। ये फिल्म तेलुगू में बनी ‘अर्जुन रेड्डी’ का रीमेक है! ये एक ऐसे प्रेमी की कहानी है, जिसकी प्रेमिका का परिवार उनके रिश्ते के खिलाफ है। जब प्रेमिका की शादी किसी और से हो जाती है, तो वो जंगलीपन की सीमा लांघ जाता है! ये वो किरदार है, जो औरत को अपनी जागीर समझता है। उसे ये भी नहीं पता कि अगले पल वो नशे में क्या कर दे! फिल्म का ये किरदार सामाजिक नजरिए से नकारात्मक चरित्र वाला है! इसे समाज के लिए खतरे की तरह देखा जा सकता है! यही कारण है कि दर्शकों का इससे गलत संदेश लेने का खतरा महसूस किया जा रहा है! अमूमन ऐसी फिल्मों में महिला किरदार की कोई पहचान नहीं होती, ‘कबीर सिंह’ में भी नहीं है।

नायक के नकारात्मक कथानक पर बनी ये पहली फिल्म नहीं है! सनकी और परपीड़क नायकों पर केंद्रित फ़िल्में पहले भी बन चुकी है! आमिर खान, शाहरुख़ खान और नाना पाटेकर जैसे कलाकारों ने भी ऐसी फिल्मों में काम किया। 2008 में आई आमिर खान की फिल्म ‘गजनी’ तमिल फिल्म ‘मुरुगाडोस’ का रीमेक थी। हॉलीवुड में इसी कथानक पर क्रिस्टोफ़र नोलन ने ‘मेमेंटो’ बनाई थी। ये फिल्म पूर्व स्मृति लोप (एंटीरोग्रेड एम्नेसिया) से ग्रस्त एक बिजनसमैन की जिंदगी की कहानी थी। नायक को ये रोग अपनी प्रेमिका की एक मुठभेड़ में हुई हत्या के कारण हो जाता है। वह पोलोरॉयड कैमरे के फोटो और टैटूज के जरिए हत्या का बदला लेने की कोशिश करता है।

इससे पहले 1993 में ही आई शाहरुख़ की फिल्म ‘बाजीगर’ का नायक भी हिंसक और बदले भावना से भरा हुआ था। वो अपने पिता की मौत का बदला उस व्यक्ति से लेना चाहता है, जिसने उसके पिता को धोखा देकर सारी जायदाद हड़प ली थी। इस कारण उसकी बहन मर गई थी! पिता भी चल बसे और माँ पागल हो गई थी। नायक शाहरुख़ खान इसका बदला उस धोखेबाज की दो बेटियों शिल्पा शेट्टी और काजोल से लेने की चाल चलता है। ख़ास बात ये कि इस नकारात्मक किरदार के लिए शाहरुख़ को सर्वश्रेष्ठ अभिनेता का ‘फिल्म फेयर’ अवॉर्ड मिला था। इसी साल (1993) आई यश चोपड़ा की फिल्म ‘डर’ में भी शाहरुख़ खान ने एक पागल प्रेमी की भूमिका निभाई थी।

फिल्म का ये किरदार ऐसा प्रेमी था, जो अपने एकतरफ़ा प्रेम से नायिका जूही चावला को जीतना चाहता है! लेकिन, जब जुही की शादी सनी देओल से हो जाती है, तो वो उसे रास्ते से हटाने के लिए पागलों जैसी हरकत करता है! शाहरुख़ ने सनकी प्रेमी के किरदार को अपनी बेहतरीन अदाकारी से जीवंत भी किया था। इसके बाद 1994 में आई शाहरुख़ और माधुरी दीक्षित की फिल्म ‘अंजाम’ का कथानक भी कुछ इसी तरह का था। फिल्म में शाहरुख खान ने बिगड़ैल रईस का किरदार निभाया था, जो अपने एकतरफा प्यार को पाने के लिए एयर होस्टेस माधुरी का पीछा करता रहता है! शाहरुख़ ने जिस तरह का नकारात्मक किरदार निभाया था, उसके लिए उन्हें उस साल का ‘फिल्म फेयर’ अवॉर्ड मिला था।

ये वो दौर था, जब लगातार ऐसी फ़िल्में आई जिनमें नायक का खल चरित्र सामने आया और उसे सनकीपन की हद पार करते दिखाया गया! 1996 में आई पार्थो घोष की फिल्म ‘अग्निसाक्षी’ जूलिया राबर्ट्स अभिनीत ‘स्लीपिंग विद द एनिमी’ पर आधारित थी। इसमें जैकी श्रॉफ, नाना पाटेकर और मनीषा कोइराला ने काम किया था। फिल्म के लिए नाना पाटेकर को 1997 का सर्वश्रेष्ठ सहायक अभिनेता का राष्ट्रीय फिल्म पुरस्कार मिला था। ये फिल्म ऐसे पति की कहानी थी, जो अपनी पत्नी के प्रति बहुत ज्यादा आसक्त रहता है। किसी का उसकी पत्नी की तरफ देखना भी उसे गवारा नहीं था। उसके एक पूर्ब प्रेमी जानकारी मिलने के बाद उसमें पत्नी के प्रति जो असुरक्षाबोध उभरता है, उसे फिल्म में नाना पाटेकर ने पूरी शिद्दत से निभाया था।

प्यार पाने की ज़िद और न मिलने की पागलपन की हद तक हिंसक होना बॉलीवुड के ऐसे कथानक हैं, जो ऐसे सनकी किरदारों को जायज़ ठहराते हैं। फिल्म के कथानक में घटनाओं को इस तरह पिरोया जाता है कि दर्शक की नज़र में वो मजबूरी में की गईं ग़लतियां भी नहीं लगती है। फिर वो ‘कबीर सिंह’ का बेकाबू ग़ुस्सा हो, बदजुबानी हो या फिर प्रेमिका के साथ की गई बदसलूकी! फिल्मों में दशकों से औरत को काबू में रखने वाले मर्दाना किरदारों को पसंद किया जाता रहा है। ऐसी फ़िल्में करोड़ों का कारोबार करती हैं और नए सोच से परे दकियानूसी विचारों को सही ठहराती है। फ़िल्म की काल्पनिक दुनिया में ऐसा व्यक्ति नायक हो सकता है, पर वास्तविक जीवन में ये कदापि संभव नहीं है। शाहिद की एक्टिंग के नजरिए से ‘कबीर सिंह’ मनोरंजक है! पर, इसका कथानक समाज को गलत दिशा में ले जाता है, जिसे शायद स्वीकार नहीं किया जा सकता! लेकिन, फिर भी इस खुरदुरे और नकारात्मक पात्र ने बॉक्स ऑफिस की झोली तो भर ही दी!

  • हेमंत पाल के ब्लॉग http://hemantpalkevichar.blogspot.com/ से साभार

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