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    अंग्रेजों ने जब उदमी राम और उनकी पत्नी को एक साथ पीपल के पेड़ में कीलों से जड़ दिया!

    By November 28, 2019Updated:November 28, 2019 Hot issue No Comments6 Mins Read
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    एक भूला बिसरा क्रांतिकारी शहीद उदमी राम:


     
    जी के चक्रवर्ती
     
    हमारे देश मे बहुत से ऐसे भी कांतिकारी हैं जिन्होंने  देश को आजाद करवाने के लिये अपने परिवार से लेकर अपने प्राणों तक कि आहुति दे डाली लेकिन देश आजाद होने के पश्चात् उन्हें हमने भूल दिया उन्ही क्रन्तिकारियों में से एक नाम जीन्होने सन् 1857 के प्रथम स्वतंत्रता संग्राम के आंदोलन के दौरान अंग्रेजों के प्रचंड अत्याचार झेले, भारत देश के हरियाणा राज्य के सोनीपत जिले के एक गाँव लिबासपुर के महान क्रांतिकारी “उदमी राम” का है। ये वही उदमी राम हैं, जो सन 1857 में अपने गाँव के नम्बरदार हुआ करते थे, देशभक्ति का जज्बा उनके रग-रग में समाया हुआ था। शहीद उदमी राम अपने गाँव लिबासपुर के नंबरदार के होने के साथ बहुत बड़े देश भक्त भी थे जिसके कारण उनकी देशपरस्ती के किस्से कहानियां बहुत दूर-दूर तक मशहूर हुआ करते थे।
     
    अंग्रेजों ने उदमी राम और उनके पत्नी के साथ एक पीपल के पेड़ में कीलों से जड़ दिया ऐसी अवस्था मे वे 35 दिनों तक रूह कंपा देने वाली भयंकर यातनाओं को सहते रहे उनके द्वार पानी मांगें जाने पर उन्हें पेशाब पिलाया गया। उदमी राम के सहयोगी मित्रों को बहालगढ़ चौक पर सरेआम सड़क पर लिटाकर पत्थर के कोल्हू के नीचे बुरी तरह से रौंद दिया गया, इतना ही नही उदमी राम के पिता के साथ उनके पूरे गाँव को भयंकर सजा दीगई उस सजा को याद करके आज भी पूरा गाँव सिहर उठता है। हमारे देश की बहुत बड़ी विडम्बना है कि ऐसे महान देशभक्त एवं  क्रांतिकारी वीर के विषय में आज देश के लोगों को शायद ही पता होगा और यह देश के लिये बहुत बड़े दुर्भाग्य की बात है कि उनके इस शहादत को स्मरण करने वाला आज कोई नही है।
     
    इससे भी बड़ी विडम्बना और क्या हो सकती है कि आज वर्तमान में इस महान क्रांतिवीर के वंशज के लोग अति दरिद्रता पूर्ण जीवन यापन करने के लिए बाध्य हैं यहां तक की उनके परिवार के लोग दाने-दाने के लिये मोहताज हैं, इस सब के बावजूद हमारे देश के साशन सत्ता में आज वर्तमान तक काबिज रहे किसी भी सरकार ने उनकी सुध लेने की जरूरत नही समझी। उनके वंशजों ने अपने ऊपर हुए अन्यायों के विरूद्ध लाहौर से लेकर दिल्ली तक लड़ाई लड़ी।
     
    उदमी राम का गाँव लिबासपुर, दिल्ली के निकट सोनीपत राष्ट्रीय राजमार्ग पर स्थित है। इस राष्ट्रीय राजमार्ग से अंग्रेजी शासन के दौरान बड़ी संख्या में अंग्रेज अधिकारीयों का दल गुजरा करता था। उदमी राम के नेतृत्व में उसी गावँ के गुलाब सिंह, जसराम, रामजस सहजराम, रतिया जैसे बाईस क्रांतिकारि युवाओं का एक दल ब्रिटिश सरकार के विरूद्ध आवाज बुलन्द किया था।
     
    इस दल के युवा क्रांतिकारीयों ने भूमिगत रह कर अपने पारंपरिक हथियारों से लैस जैसे लाठी, गंडासी, जेली कुल्हाड़ी, फर्से आदि से लैस हो कर यहां से गुजरते हुये अंग्रेज अफसरों पर धावा बोल दिया करते थे और उन्हें मौत के घाट उतारकर कर उनके लाशों को जंगल-झाड़ियों मे फेंक दिया करते थे। एक दिन उसी सड़क से अपने पत्नी के साथ गुजरते हुये एक अंग्रेज अफसर पर उदमी राम अपने दल के साथ घात लगाकर हमला बोल दिया और अफसर को मौत के घाट उतार दिया। भारतीय संस्कृति के परम्पराओं के अनुसार उदमी राम ने अंग्रेज महिला पर हाथ उठाना पाप समझ कर बहुत सोच-विचार करके उसे पडोस के एक गाँव लिबासपुर के भालगढ़ में एक ब्राह्मणी के घर बड़ी मर्यादा के साथ सुरक्षित पहुंचा कर उसकी पूरी देखरेख करने की जिम्मेदारी उस ब्राह्मणी के सुपुर्द कर दिया।
     
     
    जैसे ही इस घटना का समाचार फैलते फैलते आसपास के दूसरे गाँवों तक पहुंचा तो लोग कौतुहूलवश उस अंग्रेज महिला को देखने के लिये भालगढ़ स्थिति ब्राह्मणी के घर पहुंचने लगे और आपस मे तरह-तरह की चर्चाये करते रहे जिससे यह खबर के जोर पकड़ने से पड़ोस के एक गांव राठधाना के निवासी अंग्रेजों के एक मुखबिर द्वारा इस खबर को सुन कर इसकी समस्त जानकारी इकठ्ठा करने के उद्देश्य से भालगढ़ उस ब्राह्मणी के घर जा पहुंचा। वहाँ वह उस अंग्रेज महिला से मिलने के बाद उसने उस अंग्रेज महिला को डराया कि बहुत जल्द क्रांतिकारी उसे भी मौत के घाट उतार देंगे। यह सुन कर वह अंग्रेज महिला डर से कांप उठी।
     
    अंग्रेज महिला ने उससे कहा कि यदि वह उसकी मदद करे और उसे किसी तरह पानीपत के अंग्रेजी कैम्प तक पहुंचा दे तो उसे वह मुंह मांगा ईनाम दिलवाएगी। उसने झट अंग्रेज महिला की मदद करना स्वीकार कर लिया और उसने महिला को रातोंरात पानीपत के अंग्रेजी कैम्प तक पहुंचा दिया। कैम्प में पहुंचकर अंग्रेज महिला ने सीता राम की दी हुई सभी गोपनीय जानकारियां अंग्रेजी कैम्प में दर्ज करवाईं और यह भी कहा कि विद्रोह में सबसे ज्यादा बढ़-चढ़ के हिस्सा लेने वाले लोग लिबासपुर गाँव के हैं और उनका नेता उदमीराम है।
     
    इसके पश्चात अंग्रेजों का कहर लिबासपुर एवं उदमीराम पर टूटना लाजमी था। अंग्रेजी सरकार ने सन् 1857 की क्रांति पर काबू पाने के बाद उस गांव के क्रांतिकारियों एवं विद्रोही लोगों को रूह कंपा देने वाली भयंकर प्रताणना देना प्रारम्भ किया।
     
     अंग्रेजी सरकार ने एक दिन सूरज निकलने से पहले ही लिबासपुर गाँव को चारो ओर से घेर लिया। ऐसी अवस्था मे उदमी राम व उसके दल के लोग भूमिगत हो गये। लेकिम अंग्रेजो का कहर ग्रामीणों पर टूट पड़ा। इस गाँव के सभी लोगों, महिलाओं यहां तक कि बच्चों और बूढ़ों को जमीन पर उलटा लेटाकर उन पर कोड़ों वर्षाए गये लेकिन किसी ने भी उन क्रांतिकारियों के खिलाफ अपना मुंह तक नहीं खोला। उदमी राम के पिता की भी बेरहमी से पिटाई की गई।
     
    अंततः उदमी राम एवं उसके साथियों को आत्म-समर्पण करने के लिये मजबूर हो गये अंग्रेजों ने उन युवा क्रांतिकारियों को दिल दहलाने वाली यातनाएं देने के बाद क्रान्तिवीर उदमी राम को उनकी पत्नी श्रीमती रत्नी देवी सहित गिरफ्तार करके राई के कैनाल रेस्ट हाऊस में ले गये जहाँ पर एक पीपल के पेड़ से सटा कर खडे करवा कर लोहे की कीलों से उनको एवं उनके पत्नी के साथ जड़ दिया। उनके दल के क्रांतिकारियों को जी.टी. रोड़ पर लिटाकर बुरी तरह से कोड़े वर्षा कर सड़क कूटने वाले कोल्हू के पत्थरों के नीचे राई के पड़ाव के पास भालगढ़ चौक पर सरेआम बुरी तरह से रौंद कर मार डाला गया। इनमें से एक कोल्हू का पत्थर आज भी सोनीपत के ताऊ देवीलाल पार्क में स्मृति के तौर पर रखा हुआ है।
     

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