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    Home»ब्लॉग

    अम्बेडकर को गलत पेश किया गया

    By November 30, 2019 ब्लॉग No Comments7 Mins Read
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    श्याम कुमार

    डाॅ. भीमराव रामजी अम्बेडकर के बारे में स्वार्थी तत्वों ने, जिनमें उनका अनुयायी होने का दावा करने वाले लोग बड़ी संख्या में हैं, उनके वास्तविक व्यक्तित्व को छिपाकर उनकी गलत तसवीर सामने प्रस्तुत की। इस कार्य में नेतागिरी मुख्य कारण थी। लोगों ने अपना राजनीतिक या सामाजिक हित साधकर नेतागिरी चमकाने के लोभवश ऐसा किया। अम्बेडकर के नाम का सबसे अधिक दुरुपयोग मायावती ने किया और जमकर फायदा उठाया।

    उन्होंने ‘बहुजन समाज’ का नारा देकर पहले तो हिंदू समाज में वर्ग-संघर्ष पैदा करने की कोशिश की तथा इसी लाइन पर चलकर दलित-मुसलिम गठजोड़ बनाया। किन्तु बाद में जब देखा कि हिंदू समाज के सवर्ण कहे जाने वाले लोगों को साथ लिए बिना वह सत्ता पर काबिज होने में कामयाब नहीं हो सकेंगी तो उन्होंने ‘सर्वजन समाज’ का नारा बुलंद कर दिया तथा हिंदू समाज के जिन लोगों को पानी पी-पीकर कोसती थीं, उनसे गठजोड़ कर लिया। सवर्ण कहे जानेवाले लोगों में भी जो लोग राजनीतिक लाभ की आकांक्षा रखते थे, स्वार्थवश वे भी मायावती के साथ जुड़ गए। उन्होंने देखा कि उनके अपने वोटों के साथ मायावती के मतदाताओं के वोट मिल जाने पर उन्हें फायदा होगा और वे चुनाव जीत जाएंगे।

    किसी व्यक्ति का सही आकलन उसके जीवन के सम्पूर्ण विचारों एवं कार्याें के आधार पर होना चाहिए। यदि कोई व्यक्ति हमेशा बुरे काम करता रहा हो तथा कभी-कभार अच्छे काम कर दे तो उसे अच्छा नहीं माना जा सकता। उसके कृतित्व को प्रतिशत के आधार पर आंका जाना चाहिए। यदि अच्छे कार्याें का प्रतिशत बुरे कार्याें की तुलना में बहुत अच्छा है तो वह अच्छा माना जाना चाहिए। किन्तु यदि स्थिति विपरीत है तो बुरे व्यक्ति को अच्छा नहीं कहा जाना चाहिए।

    जवाहरलाल नेहरू ने हमेशा हिंदी व हिंदुओं का अहित किया तथा तरह-तरह के घृणित षड्यंत्र किए। किन्तु यदि उन्होंने कभी हिंदी या हिंदू धर्म की प्रशंसा कर दी तो उसे आधार मानकर नेहरू को हिंदीप्रेमी या हिंदुत्व-समर्थक नहीं माना जा सकता है। इसी प्रकार नेहरू वंश के बुरे कामों की बहुत लम्बी श्रृंखला है, किन्तु उसने कभी कोई अच्छे कार्य कर दिए हों तो उस वंश को प्रशंसनीय नहीं कहा जा सकता।

    औरंगजेब ने हिंदुओं का दमन करने में कोई कसर नहीं छोड़ी, किन्तु यदि उसने किन्हीं परिस्थितियों में कुछ मंदिरों को आर्थिक मदद दे दी तो उसे हिंदू-हितैषी नहीं माना जा सकता। यही बात टीपू सुलतान आदि तमाम ऐसे लोगों पर भी, जिनमें विशेष रूप से मुसलिम हमलावर शामिल हैं, लागू होती है। यह कहा गया कि टीपू सुलतान ने जीवनभर अंग्रेजों से संघर्ष किया। वह संघर्ष उसने अपनी सत्ता के लिए किया था तथा यदि उसने कुछ मंदिरों की मदद कर दी तो इससे उसका वह दाग नहीं धुल सकता, जो उसने हिंदुओं का दमन करने के लिए किया।

    बिलकुल यही बात डाॅ. अम्बेडकर पर लागू होती है। एक सज्जन ने अम्बेडकर को हिंदू धर्म का विरोधी बताते हुए कहा है कि उन्होंने कई बार यह मत व्यक्त किया था कि वह हिंदू धर्म में पैदा तो हुए, किन्तु इसमें मरेंगे नहीं तथा इसीलिए उन्होंने हिंदू धर्म त्यागकर बौद्ध धर्म अपना लिया। पहली बात तो यह कि डाॅ. अम्बेडकर ने कई बार उक्त मत नहीं व्यक्त किया था। दूसरी बात यह कि किसी विषय की गहराई में जाकर ही सही विवेचन किया जाना चाहिए। डाॅ. अम्बेडकर जिस दलित समाज के थे, उस समाज ने जो उत्पीड़न सहा, वह भयंकरतम था। ढोंगी तत्वों ने हिंदू समाज के विशाल वर्ग को अछूत कहकर उन्हें अमानवीय जीवन जीने को विवश किया। यहां मुझे उत्तर प्रदेश के पूर्व-राज्यपाल सूरजभान का एक कथन याद आता है। मेरी उनसे बहुत घनिश्ठता थी और विभिन्न विषयों पर खुलकर बातें हुआ करती थीं। एक बार उन्होंने विद्यार्थी जीवन में अपने प्रति हुए अतिघृणित एवं अमानीय व्यवहार की चर्चा की थी।

    उन्होंने कहा था कि जब वह राश्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सदस्य बने तो पहली बार उन्हें महसूस हुआ कि वह इंसान हैं, क्योंकि ‘संघ’ में जातिगत भेदभाव माना ही नहीं जाता। प्राचीनकाल में हिंदू धर्म में ऐसे घृणित भेदभाव का कहीं नाम निशान नहीं था। देश पर जब मुसलिम हमलावरों का आधिपत्य हुआ और उन्होंने हिंदुओं को जबरदस्ती मुसलमान बनाना षुरू किया तो उस समय जिन लोगों ने अपना धर्म नहीं बदला और हिंदू धर्म में डटे रहे, उन्हें बहुत तरह से उत्पीड़ित किया गया तथा वे ही लोग अंततः दलित वर्ग बने। वह समाज हमेशा ऐसा नहीं था, बल्कि उनमें अधिकांशतः शासक वर्ग के लोग थे। महाराजा बिजली पासी आदि ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं। हिंदुओं में विद्यमान स्वार्थी तत्वों ने भी अपने को सवर्ण कहकर उस उत्पीड़ित समाज की उपेक्षा की और उन्हें अछूत मानने लगे। जबकि वास्तविकता यह है कि असली हिंदू यह दलित समाज ही है, जिसने घोर यातनाएं सहकर भी हिंदू धर्म नहीं छोड़ा। यह भी सच्चाई है कि यह दलित वर्ग ही मुसलिम हमलावरों से मुकाबला करने में सदैव आगे रहा।

    ऐसी स्थिति में डाॅ. अम्बेडकर ने आक्रोश में हिंदू धर्म के विरुद्ध जो टिप्पणी की, उसे उनका मूल विचार नहीं माना जाना चाहिए। यदि माता-पिता गुस्से में अपने बच्चे को ‘मर जाय’ कह देते हैं तो यह उनकी मूल भावना नहीं होती है। डाॅ. अम्बेडकर ने बौद्ध धर्म अपनाया तो उस समय उन्होंने जो कुछ कहा, उस पर भी ध्यान दिया जाना चाहिए। उन्होंने यह कहकर बौद्ध धर्म अपनाया था कि ‘बौद्ध धर्म भारतीय संस्कृति से ओतप्रोत है तथा हिंदुत्व से भिन्न नहीं है।’ हिंदू धर्म वस्तुतः कोई मजहब नहीं है, बल्कि संस्कृति है, जिसमें पूर्णरूपेण खुलापन है। इसी से तमाम तरह के परस्पर विरोधी विचारों के सम्प्रदाय हिंदू धर्म के अंग के रूप में हैं। यहां तक कि ईश्वर को न मानने वाला नास्तिक वर्ग भी हिंदू माना जाता है। इसी कारणवश हिंदू धर्म में चारवाक को ‘महर्षि चारवाक’ कहा गया है। वैसे, मेरा विचार है कि डाॅ. अम्बेडकर को धर्म बदलने की बात न कहकर हिंदू धर्म में बने रहकर उसमें व्याप्त बुराइयों के उन्मूलन के लिए कड़ा संघर्ष करते रहना चाहिए था। इससे हिंदू धर्म का बहुत कल्याण होता।

    यह बात नहीं भूलनी चाहिए कि डाॅ. अम्बेडकर भारत-विभाजन के विरुद्ध थे। कांग्रेस द्वारा जब जिन्ना के इस सिद्धांत को स्वीकार कर देश का बंटवारा कर दिया गया कि हिंदू और मुसलमान दो अलग कौमें हैं, जो एक साथ नहीं रह सकतीं तो डाॅ. अम्बेडकर आबादी की पूरी तरह अदला-बदली कर दिए जाने के पक्ष में थे। उनका मत था कि इससे भविष्य में देश में शांति रहेगी। उनका कहा न मानने का नतीजा आज देश के सामने है तथा शहाबुद्दीन, मौलाना बुखारी, उवैसी, महबूबा मुफ्ती, जफरयाब जिलानी आदि जैसे लोग देश में भाईचारा एवं शांति के मार्ग में हर तरह से बाधक बन रहे हैं। यह भी नहीं भूलना चाहिए कि हैदराबाद के निजाम व ईसाई मिशनरियों द्वारा डाॅ. अम्बेडकर को मुसलमान या ईसाई बनने के लिए करोड़ों रुपये एवं अन्य प्रकार के बहुत लालच दिए गए, लेकिन उन्होंने सब प्रलोभन ठुकरा दिए थे।

    डाॅ. अम्बेडकर दलित-मुसलिम गठजोड़ के विरुद्ध थे। मुसलिम समुदाय के बारे में उन्होंने लिखा है-‘मुसलमान सुधार-विरोधी मानसिकता के लोग हैं। उनके स्वभाव में जनतंत्र या लोकतंत्र का तनिक प्रभाव नहीं है। उनके लिए उनका मजहब ही सर्वाेच्च है। किसी भी प्रकार के समाज-सुधार का मुसलमान कड़ा विरोध करते हैं। सारी दुनिया में उनकी छवि प्रगति-विरोधी प्रवृत्ति की है। उनकी दृष्टि में सभी कालों एवं सभी परिस्थितियों में सबके लिए योग्य धर्म केवल इसलाम है। सच्चे मुसलमानों के लिए भारत को अपनी मातृभूमि मानने एवं हिंदू को अपना भाई मानने का इसलाम में कोई मौका नहीं है। आक्रामक मनोवृत्ति उनके स्वभाव में होती है। हिंदुओं की दुर्बलता का लाभ उठाकर वे गुंडागर्दी करते हैं।’

    • लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।

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