भ्रष्टाचार कम नहीं… बढ़ा है?

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जी के चक्रवर्ती

भ्रष्टाचार पर लगाम लगाने को लेकर हमारे यहां की सरकार भले कितने दावे करें, लेकिन वास्तव में कहा जायें तो भ्रष्टाचार कम नहीं हुआ है, बल्कि और बढ़ता जा रहा है। अभी स्विट्ज़रलैंड के दावोस में चल रहे विश्व आर्थिक मंच के सम्मेलन में “ट्रांसपेरेंसी इंटरनेशनल” ने दुनिया भर के देशों में फैले ने भ्रष्टाचार पर एक सौ अस्सी देशों की एक सूची प्रदर्शित किया है, जिसमें इस बार भारत पिछले वर्ष के 78 वें स्थान से दो अंको के साथ सरक कर अस्सीवें स्थान पर गया है। जाहिर सी बात है कि ऐसे में भ्रष्टाचार कम होने के स्थान पर बढ़ा ही है। वैसे भ्रष्टाचार के मामलों में हमारे देश की जो सम्पूर्ण दुनिया में छवि है, यह कोई नई बात नहीं है।

हमारे देश में प्रशासन से लेकर सार्वजनिक जीवन में भ्रष्टाचार इस कदर व्याप्त हो चुकी है कि उसकी जड़े ऊपर से लेकर निचले स्तर के लोगों तक को अपनी गिरफ्त में ले चुकी है। हमारे समाज के लोगों में भ्रष्टाचार किसी न किसी रूप में इस तरह अपनी पकड़ बनाये हुए है, कि जिसका खात्मा केवल एक कल्पना मात्र से अधिक कुछ और नहीं है। लेकिन सबसे आश्चर्य की बात तो यह है कि एक चुस्त-दुरुस्त नौकरशाह एवं शक्त निगरानी तंत्र होने के बावजूद आखिर भ्रष्टाचार पर लगाम क्यों नहीं लग पा रहा है? हालांकि इस तरह का प्रश्न कोई नया नहीं रह गया है। हकीकत तो यही है कि हम लोग एक भ्रष्ट तंत्र में जीने के अभ्यस्त हो चुके हैं और अब भ्रष्टाचार को एक मामूली सी बात कह कर टाल देते हैं।

हाँ यदि हम वैश्विक स्तर पर कहें तो हम बस यही कह सकतें हैं कि हमारे पड़ोसी देश पाकिस्तान एवं बांग्लादेश जैसे देशों के मुकाबले हमारी स्थिति कहीं ज्यादा अच्छी है। यदि पाकिस्तान की बात की जाए तो भ्रष्टाचार सूचकांक में वह एक सौ बीसवें स्थान पर और बांग्ला देश एक सौ छियालीसवें स्थान पर नजर आते है। एक बृहत ग्लोबल स्तर पर बात करें तो भारत के अन्य पड़ोसी देशों में जैसे चीन, मोरक्को, घाना में भ्रष्टाचार इन तीनों देशों में भारत के समकक्ष हैं, वहीं जब हम अंतरराष्ट्रीय स्तर की बात करें तो हमारे देश भारत को एक विकासशील राष्ट्रों का नेतृत्व करने वाला देश कहलाने के बावजूद यदि हमारी स्थिति भ्रष्टाचार के मामले पर घाना, मोरक्को जैसे देशों के साथ शामिल किये जाएंगे तो वास्तव में यह हमारे लिए बहुत ही शर्मनाक बात है।

दुनिया के अन्य छोटे देशों में अफ्रीकी जैसा एक देश जहां की जनता अशिक्षा, गरीबी एवं स्वास्थ्य जैसी इन्सानी बुनियादी सुविधाओं से बंचित होने के अतिरिक्त राजनीतिक दृष्टिकोण से भी अस्थिर देशों में से हैं, लेकिन वहीं पर हमारे देश भारत की स्थिति ऐसे देशों की अपेक्षा बिल्कुल भिन्न हैं क्योंकि हमारा देश दुनिया के सबसे बड़े देशों में गिने जाने के साथ ही साथ यहां की लोकतंत्र परिपक्व है और दुनिया की पांच बड़ी अर्थव्यवस्थाओं में से एक बनने की ओर सतत अग्रसर है। इतना सब कुछ होने के बावजूद यदि हमारे देश की सरकारें भ्रष्टाचार-मुक्त शासन-प्रशासन देने में असमर्थ हैं तो यह निश्चित रूप से एक चिंता का ही विषय है।

हमारे देश मे भ्रष्टाचार का प्रमुख कारण यह है कि हमारे यहां के निगरानी तंत्रों की मौजूदगी में ही इतने शातिराना अंदाज एवं साफ-सुथरे ढंग से चलता रहता है कि जिसे पकड़ना इतना आसान भी नहीं है।
सत्ता पर काबिज कोई भी सरकार अपने पसंदीदा एवं सत्ता पक्ष को फायदा पहुंचाने वाले उद्योगपतियों के लिए अनुकूल नीतियां बनाने से नहीं हिचकती हैं। वहीं पर निचले स्तर के लोगों को तमाम सरकारी सेवाओं के लिए आज भी घूस या ऊपरी खर्च देने को मजबूर होना पड़ता है। जन्म प्रमाण पत्र बनवाने से लेकर बिजली के बिलों को ठीक करवाने के लिए भी घूस लेने-देने की प्रथा बादस्तूर कायम है।
दुनिया के सिंगापुर, स्वीडन, फिनलैंड जैसे देश जो इस सूची में सबसे ऊपरी पायदान में हैं, जहां भ्रष्टाचार या तो नहीं है या न के बराबर है, जहां के नागरिकों को काम कराने के बदले सरकार-प्रशासन को किसी तरह का घूस या ऊपरी रकम अदा नहीं करनी पड़ती है। हमारे देश में चाहे कारपोरेट घरानों की बात करें, या नगर निगमों एवं पंचायती स्तर पर होने वाले भ्रष्टाचार को लेकर सब जगह एक-ही जैसी स्थिति देखने-सुनने को मिलती है।
हमारे यहां चुनाव आयोग ने भले ही आचार संहिता बना रखी हो एवं चुनावीं खर्चों की सीमा भी तय कर रखी हो, लेकिन चुनावों में उम्मीदवारों के सहायता करने के लिए अमीर, रसूखदार एवं उद्योग घराने के लोगों द्वारा किस कदर रुपया- पैसा बहाया जाता हैं, यह बात किसी से छिपा नहीं है। और यह हरकते तब हो रही है जबकि ज्यादातर सेवाएं आनलाइन की जा चुकी हैं या हो रही हैं। ऐसी अवस्था में हमारे देश में किस प्रकार भ्रष्टाचार मुक्त वातावरण बन पायेगा?

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