सुमन सिंह
कला इतिहास में रेम्ब्रांट (1606-1669) एक महत्वपूर्ण नाम हैं, सत्रहवीं सदी के इस कलाकार की कृतियां आज भी कला जगत की अमूल्य धरोहर समझी जाती है। खासकर अपने चित्रों में छाया और प्रकाश के अद्भूत प्रयोग के लिए उन्हें जाना जाता है। अपने गुरु पीटर लास्टमन से उन्होंने नाटकीय कला का प्रभाव व ग्रामीण दृश्य चित्रण की शिक्षा ली। उनका पूरा नाम यूं तो रेम्ब्रांट हर्मेंसजून वैन रिजन था किंतु भारतीय संदर्भ में हम उन्हें रेम्ब्रांट के नाम से जानते हैं। डच गणराज्य में पैदा हुए इस कलाकार ने यूं तो कभी भारत की यात्रा नहीं की. किन्तु वर्ष 1656 से 1661 के बीच के बने उनके कुछ चित्र हालिया वर्षों में सामने आए हैं। जिसे तत्कालीन भारतीय उपमहाद्वीप में प्रचलित मुगल शैली के चित्रों की नकल कर बनाया गया था। इस श्रृंखला के उपलब्ध चित्रों की संख्या 23 हैं।

समझा जाता है कि डच ईस्ट इंडिया कंपनी के द्वारा सत्रहवीं सदी में एम्स्टर्डम लाए गए मुगल शैली के चित्रों से प्रभाव ग्रहण कर इस कलाकार ने इन रेखांकनों की रचना की। वैसे स्वयं मेरे लिए भी यह जानकारी नई ही थी, दरअसल एक कार्यक्रम के सिलसिले में ग्वालियर में किरण सरना जी से मुलाकात हो पायी। डॉ.किरन सरना जी वनस्थली विद्यापीठ में कला अध्यापक हैं, उनके सान्निध्य में यूं तो कई महत्वपूर्ण जानकारियों से अवगत हो पाया, खासकर राजस्थान के भित्तिचित्रण परंपरा और तकनीक से संबंधित। विदित हो कि किरण जी ने भित्तिचित्रण विषय पर ‘भारतीय भित्तिचित्रण परंपरा का संवाहक केंद्र: वनस्थली’ नामक पुस्तक की रचना भी की है।
बहरहाल बात करें रेम्ब्रांट के भारत प्रेम की तो जानकारी मिलती है कि इस कलाकार के पास भारतीय वस्तुओं का एक अच्छा खासा संग्रह भी था जिसमें भारतीय स्त्री-पुरुष की वेषभूषा वाले वस्त्र भी हैं। अब यह तो शोध का विषय है कि इस महान डच कलाकार को भारतीय लघुचित्रण परंपरा की अनुकृति करना क्यों भाया। किन्तु यह हमारे लिए सोचने की बात है कि युरोपीय प्रभाव में आकर हमने जिस पारंपरिक चित्रण शैली को ठुकरा दिया, उसे रेम्ब्रांट ने क्यों अपनाया। क्योंकि यह भी उल्लेख मिलता है कि रेम्ब्रांट द्वारा बनाये गए बाद के चित्रों के संयोजन में यह प्रभाव स्पष्ट दृष्टिगत है।







