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    Shagun News India
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    शिक्षा और शिक्षा नीति

    By October 24, 2019 Current Issues No Comments4 Mins Read
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    जी के चक्रवर्ती

    जब से हमारे भारतीय भू- भाग में मानव सभ्यता का उदय हुआ उस वक्त से देश अपने आध्यात्म एवं शिक्षा के लिये हमेशा से जाना जाता रहा है। इसे हमारे शिक्षा के उद्देश्यों का ही चमत्कार कहेंगे कि भारतीय संस्कृति सम्पूर्ण विश्व का पथ-प्रदर्शक रहा। वर्तमान युग में भी भारत के महान दार्शनिक एवं शिक्षा शास्त्रियों द्वारा इस बात के लिए प्रयासरत है कि शिक्षा के क्षेत्र में भारत को प्रत्येक युगों की भांति आदर्श एवं सम्मान कि द्रष्टि से देखा जाये। जब हम भारत की प्रचीन शिक्षा पद्धति की बात करते हैं तो प्राचीन भारतीय परम्परा में प्रत्येक बालक के मन-मस्तिष्क में पवित्रता तथा धार्मिक जीवन की भावनाओं को विकसित करना शिक्षा का प्रथम उद्देश्य हुआ करता था।

    बालक की शिक्षा प्रारम्भ होने से पूर्व उसके मन मस्तिष्क को उपनयन संस्कार द्वारा शिक्षा प्राप्ती के लिए तैयार करना जिसमेँ अनके प्रकार के व्रत धारण करना, प्रात: तथा सायंकाल पठन- पाठन के लिये गुरुकुल में रहते हुए धार्मिक त्योहारों एवं संस्कारो को अपने मन मस्तिष्क में विकसित कर नियम-संयम से लगातार अभ्यास कराया जाता था जिससे बालक बड़ा होकर हमारे समाज का एक पवित्र, सुसंस्कृत एवं लाभप्रद नागरिक बन सके।

    फोटो: साभार: गूगल

    हमारा देश एक धर्म निरपेक्ष गणराज्य है। हमारे देश के जनतंत्र को सफल बनाने के लिए समाज के प्रत्येक बालक को सच्चा, ईमानदार, कर्मठ एवं कर्तव्यनिष्ठ नागिरक बनाने की परम आवश्यकता है। जिसमे शिक्षा का एक महत्वपूर्ण भूमिका है। शिक्षा का मुख्य उद्देश्य बालक को जनतांत्रिक नागरिकता की शिक्षा देना है। इसके लिए प्रत्येक बालक में स्वतंत्र तथा स्पष्ट रूप से चिन्तन करने एवं निर्णय लेने के योग्यता का विकसित होना बहुत जरूरी है, जिससे कि वे एक जिम्मेदार नागरिक के रूप में देश की राजनीतिक, सामाजिक, आर्थिक एवं सांस्कृतिक सभी प्रकार की समस्याओं पर स्वतंत्रतापूर्वक चिन्तन एवं मनन करके सही निर्णय द्वारा स्पष्ट विचार व्यक्त कर सकें। इन सभी शक्तियों का विकास बौद्धिक विकास के द्वारा ही संभव है। किसी व्यक्ति का बौद्धिक विकास हो जाने के पश्चात वह इस योग्य बन जाता है कि सत्य और असत्य तथा वास्तविकता और अवास्तविकता में अन्तर समझते हुए अंधविश्वासों तथा निरर्थक परम्पराओं का उचित विश्लेषण करके अपने जीवन में आने वाली विभिन्न समस्याओं के विषय में वैज्ञानिक दृष्टिकोण अपना कर निर्णय लेने में सक्षम हो सके।

    जब से हमारे देश मे शिक्षा का अधिकार अधिनियम लागू हुआ उस वक्त से देश के 6 से लेकर 14 वर्ष तक के बच्चों के लिए उनका मौलिक अधिकार बन गया है। इन सब के बावजूद वर्तमान समय मे शिक्षा के क्षेत्र में चुनौतियों का अंबार है इस क्षेत्र में ऐसे उपायों की तलाश किये जाने की जरूरत है कि जिससे इस क्षेत्र में एक क्रांतिकारी परिवर्तन लाया जा सकें। मानव संसाधन विकास मंत्रालय का मूल उद्देश्य देश के लोगों के शिक्षा से जुड़ी हुई है जो देश के सामाजिक-आर्थिक तंत्र के संतुलन में एक महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाने का काम करती है। इसमें कोई दो राय नहीं कि भारत के लगभग सभी राज्यों में सर्वाधिक सरकारी कर्मचारियों की संख्या इसी शिक्षा विभाग में देखने को मिलेगी। जिनमे से शिक्षा के मोर्चे पर प्रथम पंक्ति में तैनात रहने वाले अध्यापकों के अतिरिक्त हज़ारों अधिकारी एवं प्रशासक भी हैं जो हमारे शैक्षिक ताने-बाने का एक महत्त्वपूर्ण हिस्सा हैं।

    इस सब के बावजूद भारत वर्तमान समय मे आज़ादी के 72 वर्षों के गुजर जाने के बावजूद शिक्षा के क्षेत्र में वांछित परिणाम हासिल नहीं कर पाया है और आज भी भारत का शिक्षा जगत अनेकानेक संस्थागत समस्याओं से तो प्रभावित है ही इसके अलावा शिक्षा की गुणवत्ता एवं उसका स्तर बहुत निचले दर्जे का बना हुआ है इसको प्रभावित करने वाले और भी कई कारक हैं। देश के शिक्षासंबंधी सभी अध्ययन एवं सर्वेक्षण इस ओर इंगित करते हैं कि शिक्षा के साथ विद्यार्थियों के जानकारी एवं योग्यता का स्तर अपेक्षाकृत बहुत नीचे है। इसके लिये हम सीधे शिक्षकों को दोषी नही ठहरा सकते है

    वास्तव में इस सच्चाई से आँखें फेर ली जाती हैं कि विद्यालयों/महाविद्यालयों का बुनियादी ढाँचा एवं शिक्षकों के प्रशिक्षण की व्यवस्था बहुत शोचनीय अवस्था में होने से देश में एक लाख से भी अधिक विद्यालय ऐसे हैं, जहाँ पर केवल एक ही शिक्षक से काम चलाया जा रहा है। इसके अलावा, स्कूली शिक्षा में सुधार के लिये शिक्षण विधियों, प्रशिक्षण और परीक्षण की विधियों में भी सुधार लाने की परम् आवश्यक्ता है। शिक्षकों के अच्छे प्रशिक्षण के लिये प्रशिक्षण का दायित्व कर्त्तव्यनिष्ठ, योग्य एवं क्षमतावान प्रशिक्षकों को सौंपा जाना चाहिये। शिक्षकों के प्रशिक्षण को प्रभावी बनाने, शिक्षण में नवाचारी पद्धतियों को विकसित करने सहित परीक्षण/मूल्यांकन की व्यापक प्रविधियाँ तय कर उन्हें व्यावहारिक स्वरूप में लागू करने की दिशा में कारगर कदम उठाया जान चाहिये।

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