नदी की सफाई पर सवालिया निशान ?

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सही मायने में कहा जाये तो सरकारी स्तर पर स्वच्छता अभियान की बात काफी रुचि के साथ होती है और इस बारे में उठाये गये कदमों का काफी प्रचार-प्रसार भी किया जाता है। अभियान को प्रभावी बनाने के लिये कभी-कभी तो साफ जगह पर भी कूड़ा फैलाकर साफ किया गया और इसकी खबरें भी मीडिया में सामने आईं। शायद ऐसा ये मानकर किया गया कि इससे भी जनता में जागरूकता आ सकेगी। समर्थ व्यक्तियों की यह सोच गलत भी नहीं कहा जा सकता। आखिर कहीं तो सकारात्मकता है। इसके अलावा गोमती सफाई, खासतौर पर लखनऊ में!

इसके लिये काफी काम होने के दावे विभिन्न स्तरों पर होते रहते हैं। कभी योजनाएं बनती हैं तो कभी बजट मंजूर होता है तो कभी वे चित्र भी मीडिया में छपते हैं जो गोमती सफाई के दौरान खिंचाए जाते हैं। ये सब अच्छी बातें हैं लेकिन जब यह पता चले कि गोमती की सफाई के दौरान पचास टन जलखुम्भी-कचरा निकला तो तमाम सवाल सामने आते हैं।पहला सवाल तो यही कि सरकारी स्तरों पर तथा स्वयंसेवी संस्थाओं द्वारा बताये जाने वाले प्रयासों का फल यही ढेर सारा जलकुम्भी और कचरा है।

फिर जब यह बात सबके सामने आई तो कहा गया कि भुगतान न होने की वजह से काम नहीं बढ़ सका। इसके जवाब में ये सवाल पूछा ही जा सकता है कि समय-समय पर जिन धनराशियों की घोषणा विभिन्न स्तरों पर की जाती है, वह पैसा आखिर जाता कहां है। यदि उसे इसी सफाई के काम में लगाया गया है तो जलकुम्भी-कचरे का पहाड़ क्या उसी का बना है।

दरअसल हमारी व्यवस्था की यह खासियत तो है कि इसमें योजनाएं बहुत तेजी के साथ बनती हैं लेकिन उतनी ही बड़ी खामी यह है कि एक बार घोषणा हो जाने के बाद उनके बारे में सभी विभाग पूरी तरह भूल जाते हैं और सारा मामला एक अनाथ की तरह उपेक्षित पड़ा रह जाता है। होना यह चाहिये कि इतने महत्वपूर्ण विषयों पर घोषणा के साथ ही काम शुरू ही नहीं हो बल्कि निरन्तर चलता भी रहना चाहिये।

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