आर एस एस की समाज दृष्टि

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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना राष्ट्र भाव करने के लिए हुई थी। संघ संस्थापक के डॉ केशव बलिराम हेडगेवार के निवास स्थान में समर्थ गुरु रामदास व शिवजी के चित्र वह जो छड़ी लेकर चलते थे, उसमें शेर बना था। उनका कहना था कि शेर जंगल का राजा होता है। उसे यह बात कहनी नहीं पड़ती। इन प्रतीकों से संघ के संस्थापक के विचार का अनुमान लगाया जा सकता है। वह भारत को पुनः विश्व गुरु के रूप में प्रतिष्ठित करना चाहते थे। उन्नीस सौ पच्चीस में संघ की स्थापना हुई। सात माह बाद पच्चीस लोग नामकरण के लिए बैठे।

इसमें लोकतांत्रिक प्रक्रिया अपनाई गई। बहुमत से तय हुआ कि इस संगठन का नाम राष्ट्रीय स्वयं संघ होगा। आर एस एस पर सुनील आम्बेकर की पुस्तक का पिछले दिनों नई दिल्ली में सर संघ चालक मोहन भागवत ने विमोचन किया था। सुनील आंबेकर ने इस संबन्ध में अपने विचार व्यक्त किये।

इसमें अनेक तथ्य उभर कर आये। संघ को जो जानते है वह उसके बारे में समझते है। यह सामान्य संघठन है, जो खुले मैदान में चलता है। विश्व का सबसे बड़ा ही नहीं सर्वाधिक खुला संगठन है। पहले दिन ही तय हुआ कि समाज की कमजोरियों को दूर करना है मजबूत संगठन बनाने का निर्णय हुआ। संघ को सामान्य वर्ग बहुत अच्छी तरह जानते समझते है जो विदेशी फ्रेमवर्क में सोचते है, उन्हीं को गलतफहमी है। वह दुष्प्रचार करते है। संघ की स्थापना से पहले डॉ हेडगेवार ने महात्मा गांधी से वार्ता की थी, कहा कि समाज को मजबूत बनाना चाहते है, राजनीतिक पार्टी नहीं बनाना चाहते। महात्मा गांधी दो बार संघ के शिविर में आये। संघ को गांधी जी से कभी परहेज नहीं रहा एकात्मक स्त्रोत में गांधी जी का स्मरण किया जाता है।

संघ का फोकस था कि विभाजन जैसा संकट कभी उतपन्न न हो। इसका जबाब उस समय सत्ता में बैठे लोगों को देना चाहिए था। विभाजन के पहले तत्कालीन सरसंघ चालक गुरु जी संघ परिवार केंद्रित कार्य् करता है। बड़ों की सेवा करना परिवार का काम है। विदेशों में यह कार्य भी सरकार करने लगी। संघ का प्रयास है कि ऐसी जिम्मेदारी का परिवार स्तर पर ही निर्वाह करे।

संस्कृति का भी एक सॉफ्टवेयर होता है, यह आदर्श समाज की स्थापना करता है। ऐसा आदर्श सॉफ्टवेयर भारतीय संस्कृति में ही संभव है। यह सही हो तो परिवार सही रहेगा, इससे समाज भी मजबूत होगा। संघ का यही प्रयास है। संघ का चाहता है कि स्नेह सद्भाव का रिश्ता होना चाहिए। कुटुंब प्रबोधन कार्यक्रम चलाया जा रहा है। इसका उद्देश्य समरसता कायम करना है। छोटे, एकाकी परिवार के बाद भी कोई अपने को अकेला न समझे। सब एक दूसरे का सहयोग करें, तो समाजिक जिम्मेदारी का भाव जागृत होता है। संघ संवाद के माध्यम से संघ सद्भाव का वातावरण बनाने में लगा है।

भारत परम्परा से हिन्दू राष्ट्र है। यह शास्वत सत्य है। अनेक आनुषंगिक संगठनों में महिलाएं कार्य कर रही है। संघ की शाखा खुले मैदान में लगती है। यदि समाज मे वातावरण होगा, समाज मांग करेगा तो महिला शाखाएं भी लगेगी। संघ समाज से जुड़ा संगठन है। समाज से अलग नहीं है। समाज के साथ ही चलना है। संघ यही कर रहा है। इतिहास वह नहीं है जो अंग्रेजो ने लिखा। बहुत से गौरवशाली काल इतिहास में शामिल ही नहीं किये गए। इससे गलतफहमी हुई। हिन्दू शब्द को साम्प्रदायिक मान लिया गया। यहाँ कभी सभ्यताओं का संघर्ष नहीं रहा। उत्पीड़ित लोगो को शरण देना भारतीय संस्कृति है। हिंदुत्व शब्द जोड़ने वाला है। जिसमें उपासना पद्धति पर भेदभाव नहीं किया गया।

विश्व में ऐसा अन्य कोई देश नहीं है। हिन्दू राष्ट्र में सभी के पूर्वजों को एक मानने का भाव रहा है। यह तो जोड़ने वाला विचार है।

संघ स्वतंत्रता संग्राम में शामिल हुआ था। उस समय सभी संगठन कांग्रेस के माध्यम कार्य कर रहे थे। संघ के स्वयं सेवक यह कर रहे थे। संघ के संस्थापक स्वयं स्वतंत्रता संग्राम सेनानी थे। आज नागरिकता कानून से भारतीयों के साथ कोई भेद संभव ही नहीं है। जनजातीय क्षेत्रो पर भी ध्यान रखा गया है। भारत मे जनजातीय लोगों के साथ अन्याय नहीं किया गया। भारत केवल भूगोल नहीं, यह सांस्कृतिक भूमि है। सीमा की भी रक्षा करनी है। संस्कृति की रक्षा के लिए भी समाज में लोगों को आगे आना पड़ता है। संघ के प्रचारक यही काम कर रहे है।

भारतीय संस्कृति की ध्वज पताका विश्व में प्रतिष्ठित थी। मानव सभ्यता का विकास सबसे पहले यहीं हुआ। यहाँ के वन जंगल तक वैज्ञानिक अनुसंधान के केंद्र थे। चक्रवर्ती सम्राटों की यहाँ सुदीर्घ श्रृंखला थी। भारत ने अपनी संस्कृति का विस्तार तलवार की नोक पर कभी नहीं किया। सदैव मानव कल्याण का विचार दिया। वसुधा को कुटुंब माना। उदार चरित्र की अवधारणा दी। डॉ हेडगेवार चिंतन करते थे कि इतना महान देश विदेशी दासता में कैसे जकड़ गया। इसके पीछे उन्हें दो कारण नजर आए। एक यह कि भारत के लोग अपनी सर्वश्रेठ विरासत पर स्वाभिमान करना भूल चुके थे। इसका प्रभाव उनके आचरण पर पड़ा। दूसरा कारण यह था कि हमारे भीतर भेदभाव आ गया। इससे हमारी संगठित शक्ति कमजोर हुई। इसके विदेशी शक्तियों ने लाभ उठाया।

डॉ हेडगेवार भारत को पुनः परम वैभव के पद पर आसीन देखना चाहते थे। वह हिन्दू समाज को भेदभाव से ऊपर लाकर संगठित करना चाहते थे। स्वतंत्रता संग्राम अपनी जगह था। वह देश को अंग्रेजों के चंगुल से मुक्त करना चाहते थे। इसीलिये कांग्रेस द्वारा चलाये जाने वाले आंदोलनों में सक्रिय भाग लेते थे। कांग्रेस के नागपुर सम्मेलन की पूरी व्यवस्था उन्होंने की थी। लेकिन कांग्रेस द्वारा शुरू किए गए खिलाफत आंदोलन से वह असहमत थे। इसका नाम भी भ्रामक था। ऐसा अहसास कराया गया कि यह अंग्रेजो के खिलाफ है। लेकिन यह तुर्की के खलीफा को अपदस्त करने के विरोध में था।

डॉ हेडवेवर ने कांग्रेस के बड़े नेताओं से अपना विरोध दर्ज कराया। उनका कहना था कि तुर्की के शासक का मसला उनका है। भारत स्वयं ही गुलाम है। उसे किसी बाहरी मुल्क के मामले में पड़ने की जरूरत ही नहीं है। गुलामों की बात को विश्व सम्मान नहीं देता। कांग्रेस केवल तुष्टिकरण के लिए खिलाफत आंदोलन चला रही है। डॉ हेडगेवार की बात कांग्रेस के शीर्ष नेताओं ने नहीं मानी। इसलिए समाज को एक जुट करने, राष्ट्रीय भावना की प्रेरणा देने के उद्देश्य से उन्होंने राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ की स्थापना की थी। संघ के स्वयं सेवक राष्ट्रीय आंदोलन में भी सहयोग करते थे।

आजादी के बाद भी राष्ट्रीय व प्राकृतिक आपदा के समय स्वयंसेवक अपनी प्रेरणा से सेवा कार्य में जुटते रहे है। चीन व पाकिस्तान के आक्रमण के समय स्वयंसेवक अपने स्तर से सहयोग करते थे। इसीलिए गणतंत्र दिवस परेड में स्वयंसेवकों को पथसंचलन हेतु राजपथ पर आमंत्रित किया गया था। लाल बहादुर शास्त्री ने द्वितीय सर संघचालक से पूंछा था कि आप स्वयं सेवकों को राष्ट्र सेवा की प्रेरणा कैसे देते थे। गुरु गोलवलकर ने कहा था हम लोग शाखा में खेलते है। यहीं संगठन की प्रेरणा मिलती है, संस्कार और राष्ट्रभाव जाग्रत होता है। इसके लिए शाखाओं की पद्धति शुरू की गई। संघ में व्यक्तिवाद को महत्व नहीं दिया गया। डॉ हेडगेवार को सुझाव दिया गया था कि आप संघ के गुरु का पद ग्रहण करें। डॉ हेडगेवार ने इससे इनकार कर दिया।

उनका कहना था कि व्यक्ति या उसका उत्तराधिकारी पथ से विचलित हो सकता है। इसके अलावा हिंदुओं में अनेक गुरु है। व्यक्तिगत रूप से अनेक लोगों की आस्था अपने गुरु के प्रति होती है। संघ अलग से कोई सम्प्रदाय या पंथ शुरू नहीं कर रहा है। वह पूरे हिन्दू समाज को संगठित करना चाहता है। हिन्दू समाज मे अनेक पंथ समुदाय है। इनके गुरु भी अलग होटे है। लेकिन भगवा ध्वज के प्रति सबकी समान रूप से आस्था है। भगवा ध्वज शौर्य, त्याग, तपस्या का प्रतीक है। प्राचीन काल मे यह भारत के विश्वगुरु होने का प्रतीक था।

इसीलिए संघ में भगवा ध्वज को गुरु का स्थान दिया गया। इससे सदविचारों की प्रेरणा मिलती है। उगते हुए सूर्य का रंग भगवा होता है। सूर्यादय अंधकार को दूर करता है। अरुणोदय उत्साह का सन्देश देता है। अग्नि शिखाएं भी भगवा रंग की होती है। यह यज्ञ का प्रतीक है। इसमें शुद्धता त्याग, समर्पण, बलिदान, शक्ति और भक्ति का भाव होता है। सूर्य और अग्नि की भांति भगवा रंग अज्ञानता का अंधकार को दूर करता है। ऊर्जा का संचार करती है। राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ के संस्थापक केशव राव बलिराम हेडगेवार सक्रिय स्वंतत्रता संग्राम सेनानी थे। इसके लिए उन्होंने निजी सुख सुविधाओं का त्याग कर दिया था। आंदोलनों में भाग लेते समय उन्हें भारत माता की त्रासदी विचलित करती थी। वह सोचते थे कि भारत कभी विश्व गुरु था।

  • डॉ दिलीप अग्निहोत्री

2 COMMENTS

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