जीके चक्रवर्ती
समीकरण बदलने में बसपा का जवाब नहीं
मायावती का आक्रामक रूख कार्यकर्ताओं में जान फूंकता है
मायावती ने एक बार फिर यूपी के चुनावी संग्राम में हाथी के सिंबल से 22, 26 एवं 29 नवम्बर को सम्पन्न हुए तीन चरणों में निकाय चुनावों में विपक्षियों को कड़ी टक्कर देते हुए खास कर उत्तर प्रदेश के दो जिलों में अपनी पकड़ मजबूत बनाने के साथ ही चुनाव 2017 में भाजपा को करारी शिकस्त दी, इसके साथ ही सुश्री ने भाजपा पर हमला बोलते हुए कहा की यदि हिम्मत है तो बैलेट पेपर से चुनाव कराये यदि बैलेट पेपर से चुनाव होंगे तो भाजपा सत्ता से बाहर हो जाएगी उनका आक्रामक रवैय्या भी बीएसपी संघटन में जान फूंक गया और इसी के साथ सपा ने भी EVM पर पर सवाल खड़े कर दिए, सपा ने भी वही बात दोहराई जो बसपा कह रही है। यह ऐसा पहली बार मौका है जब बसपा ने 17 साल बाद पार्टी के चुनाव चिन्ह पर नगर निकाय चुनाव लड़ा और अपेक्षा के अनुरूप परिणाम न सही लेकिन कुछ तो मिला।
इस बार पुनः बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपनी खोई जमीन और प्रतिष्ठा वापस पाने के लिए उनके हाथ लगे सुनहरे मौके का पूर्ण रूप से फायदा उठाने में सफल भले ही न हो सकीं हों लेकिन फिर भी 1995 के बाद से पहली बार बसपा पार्टी अपने ‘हाथी’ निशान पर निकाय चुनाव में दो जिले मेरठ और अलीगढ़ में अपना परचम लहराते हुए जीत हासिल की है और झाँसी में अपने प्रतिदंद्वी कंडीडेट को कड़ी टक्कर दी। इस ताजे चुनाव के मद्दे नजर बसपा सुप्रीमो मायावती पूरे उत्साह से उत्तर प्रदेश की राजधानी में डेरा डाले मौजूद रही।

यहाँ उन्होंने नियमित रूप से जोन और डिविजन स्तर के कार्यकर्ताओं के साथ बैठके करती रहीं साथ ही उन्होंने पार्टी के लोगों को निर्देश भी देती रहीं कि हमें किस तरह से इस चुनाव मैदान में उतरना है। वहीं पर अंदुरुनी व्यक्ति द्वारा ऐसा भी बताया गया कि बसपा का आधार शहरों के मुकाबले गांवों में अधिक है। इसलिए निकाय चुनावों के जरिये मायावती शहरी इलाकों में अपने जनाधार बढ़ाने का प्रयास अवश्य करेंगी और ऐसा करने में उन्होंने कोई कोर-कसर भी नहीं छोड़ी लेकिन कुछ एक राजनीतिक जानकारों का कहना था कि बसपा के लिए इस चुनाव को गंभीरता से लेना भी जीत का बड़ा कारण था।
पिछले लोकसभा चुनाव में तो पार्टी का खाता तक नहीं खुला पाया था, वहीं पर इस वर्ष के विधानसभा चुनाव में उनके पार्टी को 403 में से केवल 19 सीटें ही मिल पाई थी। ऐसे में एक बार फिर से मिली मेरठ और अलीगढ़ जिले में जीत की सफलता से पार्टी के कार्यकर्ताओं के मनोबल को बढ़ाने का काम तो किया ही है साथ ही साथ पार्टी के कई बड़े नेता पहले ही मायावती पर गंभीर आरोप लगाते हुए पार्टी छोड़ के जाने के बाद से हुए क्षती के भरपाई में अहम भूमिका अदा करेगी।
शायद इन सभी का अहसास मायावती के अलावा पार्टी कार्यकर्ताओं को भी है। यही वजह है कि बसपा सुप्रीमों ने मौजूदा चुनावों को बेहद गंभीरता से लेते हुए पार्टी कार्यकर्ताओं से लगातार संवाद करती रहीं उनकी इन क़वायदतों के बावजूद पार्टी अपने मक़सद में कहाँ तक कामयाब रही यह तो आने वाला वक्त ही बताएगा लेकिन एक बात तो तय है की यदि यही उत्साह और लगन, जुझारूपन खुद के साथ पार्टी कार्यकर्ताओं मे लगातार जारी रहा तो वह दिन दूर नहीं जब आगामी लोकसभा चुनाव में पार्टी बड़ी गेम चेंजर का रूप ले सकती है।







