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    Home»साहित्य

    पुस्तक मेले में साहित्य का उत्सव: अनसुने सितारों का स्मरण और रामलीला की जीवंत परंपरा

    ShagunBy ShagunSeptember 12, 2025 साहित्य No Comments4 Mins Read
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    लखनऊ, 12 सितंबर 2025: बलरामपुर गार्डन, अशोक मार्ग पर चल रहे 22वें राष्ट्रीय पुस्तक मेले ने आज एक बार फिर साहित्य प्रेमियों को मंत्रमुग्ध कर दिया। साहित्य से लेकर इतिहास, भूगोल, विज्ञान और कला तक हर विषय की किताबें यहां की शान बनी हुई हैं। मेले में उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की उपस्थिति ने आयोजन को और भी गरिमामय बना दिया। विद्यार्थियों और पुस्तक प्रेमियों की भारी भीड़ ने प्रकाशन विभाग दिल्ली, उत्तर प्रदेश हिंदी संस्थान, उर्दू अकादमी, आदिदेव प्रेस और भारतीय कला प्रकाशन के स्टालों पर किताबें पलटते और खरीदते नजर आईं। मात्र दो दिन शेष रहते समापन की ओर बढ़ते इस मेले ने लोक संस्कृति और ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य पर आधारित पुस्तकों को विशेष महत्व दिया।

    ब्रजेश पाठक ने किया ‘अनसुने सितारे’ और ‘मैं स्वयंसेवक’ का विमोचन

    मेले का आज का प्रमुख आकर्षण रहा श्रीधर अग्निहोत्री की पुस्तक अनसुने सितारे और मनीष शुक्ल की मैं स्वयंसेवक का विमोचन। इस अवसर पर उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक, ललित कला अकादमी के उपाध्यक्ष गिरीशचंद्र मिश्र और अन्य अतिथियों ने संयुक्त रूप से इनका लोकार्पण किया। पाठक ने कहा, “किताबों में दर्ज ज्ञान ही अगली पीढ़ी को सशक्त बनाता है। यह ज्ञान सांस्कृतिक धरोहर का माध्यम है।”

    उन्होंने निराला, रामविलास शर्मा और पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी का उल्लेख करते हुए बताया कि आगरा और ग्वालियर गजेटियर में अटलजी के स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय योगदान का जिक्र है।

    मनीष शुक्ल की पुस्तक राजनीति की विभिन्न करवटों को उजागर करती है, जबकि श्रीधर अग्निहोत्री की अनसुने सितारे फिल्म जगत के भुला दिए गए चरित्र नायकों को जीवंत करती है। कार्यक्रम में पत्रकार हेमंत तिवारी, मेला संयोजक मनोज सिंह चंदेल और चंद्रभूषण ने भी अपने विचार साझा किए। तिवारी ने कहा, “ऐसी पुस्तकें हमें इतिहास की अनकही कहानियों से जोड़ती हैं।” इस विमोचन ने साहित्य और राजनीति के बीच एक सकारात्मक संवाद को बढ़ावा दिया।

    नाटककार सुशील कुमार सिंह ने खोला अपना रचना संसार

    मेले के प्रमुख आयोजनों में नाटककार, कवि और राष्ट्रीय नाट्य विद्यालय से प्रशिक्षित रंग निर्देशक सुशील कुमार सिंह के वैविध्यपूर्ण लेखन पर गहन चर्चा हुई। चर्चित नाटकों जैसे सिंहासन खाली है, नौलखिया दीवान, बेबी तुम नादान, अलख आजादी की और काकोरी एक्शन के लेखक सिंह ने अपने रचनाकर्म से श्रोताओं को परिचित कराया। उन्होंने नाटकों के चुनिंदा अंशों का जीवंत पाठ किया, जो दर्शकों को मंत्रमुग्ध कर गया।

    अभिनेता डॉ. अनिल रस्तोगी, कला वसुधा पत्रिका के संपादक अशोक बनर्जी, अनिल मिश्रा गुरुजी, ललित सिंह पोखरिया, रंग संगीतकार आलोक श्रीवास्तव और कला समीक्षक राजवीर रतन ने सिंह के नाटकों पर अपने अनुभव साझा किए। वाणी प्रकाशन के सहयोग से अरुण सिंह के संचालन में चले इस कार्यक्रम में सुशील कुमार सिंह की दूरदर्शन सेवा काल और भारतेन्दु नाट्य अकादमी के निदेशक के रूप में उनके योगदान व उपलब्धियों पर भी प्रकाश डाला गया। रस्तोगी ने कहा, “सुशीलजी का लेखन न केवल मनोरंजक है, बल्कि सामाजिक जागरूकता का माध्यम भी है।” यह सत्र साहित्य और रंगमंच के प्रेमियों के लिए प्रेरणादायक साबित हुआ।

    रामलीला परंपरा और पौराणिक धारावाहिकों की प्रासंगिकता पर विमर्श

    उत्कर्ष प्रतिष्ठान और हरेला बाखई के संयोजन में रामलीला बनाम पौराणिक धारावाहिक पर एक रोचक प्रस्तुति और चर्चा आयोजित हुई। वक्ताओं ने रामलीला की पारंपरिक महत्ता और आधुनिक पौराणिक धारावाहिकों की प्रासंगिकता पर विचार रखे। कला समीक्षक राजवीर रतन ने गोस्वामी तुलसीदास द्वारा स्थापित ऐशबाग रामलीला की बदलती परंपराओं का जिक्र किया। रजनीश राज ने अयोध्या की मंचीय रामलीला में फिल्मी कलाकारों की भागीदारी को नई परंपरा बताया।

    नवेद शिकोह ने रंगमंच और परंपरागत रामलीला के बीच संतुलन पर बात की, जबकि पत्रकार हेमंत तिवारी ने कहा, “बदलते समय का असर परंपराओं पर पड़ा है, लेकिन उनकी आत्मा अटल है।” संयोजक हरीश उपाध्याय के साथ मोहन सिंह बिष्ट, अर्जल चौधरी, गरिमा पंत, मोहनचंद लखचौरा और स्टडी हॉल कॉलेज की छात्रा प्रांशी ने भी अपने विचार व्यक्त किए।

    कार्यक्रम का समापन ज्योति किरन रतन के राम भजन पर नृत्य प्रस्तुति से हुआ, जिसने दर्शकों को तालियों की गड़गड़ाहट से नवाजा। यह चर्चा ने सांस्कृतिक विरासत को आधुनिक संदर्भ में जोड़ने की आवश्यकता पर बल दिया।

    अन्य आकर्षक आयोजन

    मेले की शुरुआत साहित्य साधक की गोष्ठी से हुई, जहां आईपीएस डॉ. हरीश कुमार की पुस्तकें कुंभ पुलिस और पोटलीवाला पर चर्चा हुई। लेखक के साथ डॉ. सूर्यकांत और पल्लवी ने विचार रखे। शाम को रेवांत की ओर से काव्य गोष्ठी का आयोजन हुआ, जिसमें कवियों ने अपनी रचनाओं से माहौल को काव्यमय बना दिया।

    यह पुस्तक मेला साहित्य, संस्कृति और समाज के बीच एक मजबूत सेतु का प्रतीक बन गया है। उपमुख्यमंत्री ब्रजेश पाठक की भागीदारी ने इसे और भी प्रेरणादायक बना दिया। रविवार को समापन से पहले, यह मेला पाठकों को ज्ञान के भंडार से समृद्ध कर रहा है। आइए, हम सब मिलकर साहित्य के इस उत्सव का आनंद लें और किताबों की दुनिया में खो जाएं!

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