केन्द्रीय उपोषण बागवानी संस्थान बागवानी के जैविक उत्पादन पर दे रहा जोर
गांधीवादी सिद्धांत जलवायु परिवर्तन की वर्तमान परिस्थितियों के कारण टिकाऊ बागवानी के लिए अति महत्वपूर्ण बन गए हैं। आईसीएआर-सीआईएसएच प्राकृतिक संसाधनों के विवेकपूर्ण उपयोग और पारिस्थितिक संतुलन को बनाए रखने के लिए किसान-अनुकूल बागवानी प्रौद्योगिकियों पर शोध कर रहा है और आशातीत परिणाम भी मिल रहे हैं। गांधी दर्शन पर आधारित कई विकसित प्रौद्योगिकी किसानों तक पहुंचा दी गई है। किसान ऐसी बागवानी में रूचि भी दिखा रहे हैं।
इस संबंध में केन्द्रीय उपोष्ण बागवानी संस्थान, रहमानखेड़ा, लखनऊ के निदेशक डाक्टर शैलेन्द्र राजन ने शनिवार को बताया कि संस्थान ने हजारों किसानों के साथ बागवानी फसलों के जैविक उत्पादन के गांधीवादी सिद्धांतों पर आधारित बागवानी को बढ़ावा दिया है। उत्तर प्रदेश एवं बिहार के केला उत्पादक क्षेत्रों में केले में उकठा रोग की महामारी के क्षेत्रों में संस्थान द्वारा कवकनाशी रसायनों के बिना समस्या का सफलतापूर्वक प्रबंधन किया गया है। इस महामारी की रोकथाम रसायनों के द्वारा से संभव नहीं हो पाया था । आईसीएआर-फ्यूजीकौंट नामक सूक्ष्मजीवों पर आधारित तकनीक से पौधों के प्रतिरक्षण के द्वारा केले के पौधों को महामारी से बचाया जा सकता है। किसानों द्वारा इस तकनीक को अच्छी तरह से स्वीकार किया गया है, क्योंकि वे कम प्रयत्न और बिना किसी रसायन के रोग से निजात पाने की सफलता प्राप्त कर ले रहे हैं।
उन्होंने बताया कि अधिसंख्य बागों में कीटनाशकों के अत्यधिक अविवेकशील प्रयोग आम के बागों की अधिकांश समस्याओं के लिए उत्तरदाई समझा जाता है। यह न केवल किसानों की कम आय के दृष्टिकोण से महत्वपूर्ण है, बल्कि उपभोक्ताओं और ग्रामीण समाज के लिए भी कम खतरनाक नहीं है। परिणाम स्वरूप बागों पारिस्थितिक तंत्र की स्थिति भयावह है। अधिसंख्य लाभकारी कीट लगभग नष्ट हो चुके हैं। कीटों की रोकथाम के लिए अंधाधुंध कीटनाशकों के कारण कैंसर रोगियों की संख्या अधिक हो रही है।
डाक्टर शैलेन्द्र राजन ने बताया कि रसायनों को प्रतिस्थापित करने के लिए खेतों एवं प्रकृति में उपलब्ध संसाधनों का उपयोग सफलतापूर्वक किया जा सकता है। जैविक अपशिष्ट के अनुचित प्रबंधन से लोगों को होने वाले नुकसान के साथ-साथ इसके प्रबंधन एवं पुनः उपयोग करने हेतु उपयोगी खाद उत्पाद के रूपांतरण के लिए संस्थान जागरूकता बढ़ाने के विशिष्ट प्रशिक्षण भी दे रहा है। छतों पर फलों एवं सब्जियों की खेती करके एवं रसोई अपशिष्ट को खाद बनाकर पर्यावरण संरक्षण और पोषण सुरक्षा प्रदान के बारे में भी विशेष प्रशिक्षण दिया जा रहा है। इससे वातावरण स्वच्छता को तो बढ़ावा मिलेगा ही साथ ही साथ मूल्यवान कार्बनिक अपशिष्ट का सदुपयोग भी होगा।
डाक्टर राजन ने बताया कि गांधी सर्वोदय में विश्वास करते थे और इसलिए सभी का कल्याण उनकी सोच का आधार था। इसलिए समुदाय की स्थिरता के प्रति दृष्टिकोण ‘मानव जीवन की बेहतरी’ और ‘सभी मानवीय जरूरतों की बुनियादी जरूरतों की पूर्ति सुनिश्चित करने’ पर जोर दिया गया है। संस्थान के वैज्ञानिकों ने अनुसूचित जाति उप-योजना के तहत गोद लिए गए काकोरी ब्लॉक के नयाखेड़ा और दासदोई गाँवों में वृक्षारोपण और पौधे वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें 300 से अधिक स्थानीय अनुसूचित जाति के किसानों ने भाग लिया। संस्थान के वैज्ञानिकों ने अनुसूचित जाति उप-योजना के तहत गोद लिए गए काकोरी ब्लॉक के नयाखेड़ा और दासदोई गाँवों में वृक्षारोपण और पौधे वितरण कार्यक्रम का आयोजन किया, जिसमें 300 से अधिक स्थानीय अनुसूचित जाति के किसानों ने भाग लिया।







