द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाने वाली गलत संदेश” देने से बचने की चेतावनी दी चीन ने
नई दिल्ली। चीन ने तिब्बती आध्यात्मिक नेता दलाई लामा के साथ होने वाली किसी भी अंतरराष्ट्रीय मुलाकात पर एक बार फिर अपनी तीखी प्रतिक्रिया जाहिर की है। हाल ही में चेक गणराज्य के राष्ट्रपति पेट्र पावेल ने भारत के लद्दाख में दलाई लामा से मुलाकात की, जिसे लेकर चीन ने कड़ा ऐतराज जताया है। इस मुलाकात को लेकर बीजिंग ने चेक गणराज्य पर अपनी “एक-चीन नीति” का पालन करने का दबाव बनाया और द्विपक्षीय संबंधों को नुकसान पहुंचाने वाली “गलत संदेश” देने से बचने की चेतावनी दी।
मुलाकात पर चीन का तीखा विरोध दर्ज
27 जुलाई 2025 को लद्दाख के लेह में शीवात्सेल फोडरंग में चेक राष्ट्रपति पेट्र पावेल ने दलाई लामा से मुलाकात की। यह पहला मौका था जब किसी विदेशी राष्ट्राध्यक्ष ने भारत में दलाई लामा से मुलाकात के लिए विशेष रूप से यात्रा की। इस दौरान पावेल ने दलाई लामा को उनके 90वें जन्मदिन की बधाई दी और तिब्बती समुदाय के लिए धार्मिक स्वतंत्रता, भाषा और संस्कृति के संरक्षण की वकालत की। उन्होंने दलाई लामा के “मध्यम मार्ग” दृष्टिकोण का समर्थन करते हुए कहा, “दलाई लामा स्वतंत्र तिब्बत की मांग नहीं कर रहे। वे केवल अपने लोगों के लिए धर्म, अभिव्यक्ति और भाषा की स्वतंत्रता चाहते हैं, और हमें इसका समर्थन करना चाहिए।”

इस मुलाकात के जवाब में, चेक गणराज्य में चीनी दूतावास ने 27 जुलाई की देर रात एक नोटिस जारी कर इसे “चीन-चेक संबंधों के लिए हानिकारक” करार दिया। दूतावास ने दलाई लामा को “राजनीतिक निर्वासित” और “चीन-विरोधी अलगाववादी” बताते हुए किसी भी देश के अधिकारियों और “दलाई गुट” के बीच संपर्क का विरोध किया। नोटिस में कहा गया, “तिब्बत प्राचीन काल से चीन का अभिन्न अंग रहा है, और तिब्बती मामले पूरी तरह से चीन के आंतरिक मामले हैं, जिनमें कोई बाहरी हस्तक्षेप बर्दाश्त नहीं किया जाएगा।”
चीन ने चेक गणराज्य से “एक-चीन नीति” का पालन करने, इस घटना के “नकारात्मक प्रभाव” को तुरंत खत्म करने और “तिब्बती स्वतंत्रता के अलगाववादी ताकतों” को गलत संदेश देने से रोकने की मांग की। साथ ही, दूतावास ने केंद्रीय तिब्बती प्रशासन (CTA) को “अलगाववादी राजनीतिक संगठन” करार देते हुए इसके साथ किसी भी आधिकारिक संपर्क का विरोध किया।
निजी थी दलाई लामा से मुलाकात
चेक राष्ट्रपति कार्यालय ने स्पष्ट किया कि पावेल की दलाई लामा से मुलाकात “पूरी तरह से निजी” थी, जो जापान की उनकी आधिकारिक यात्रा के बाद हुई। कार्यालय ने बताया कि दलाई लामा के निमंत्रण पर पावेल ने यह यात्रा की, और इस दौरान उनके साथ कोई आधिकारिक प्रतिनिधिमंडल नहीं था। पावेल ने तिब्बती समुदाय के साथ अपनी मुलाकात में कहा, “हम चेक गणराज्य से आए हैं, जो यूरोप के केंद्र में एक सुदूर देश है, जिसकी संस्कृति और इतिहास अलग है। लेकिन हम सभी इंसान हैं, जो सम्मानजनक जीवन और अपने बच्चों के लिए बेहतर भविष्य चाहते हैं।”
चेक गणराज्य और दलाई लामा के बीच गहरा ऐतिहासिक रिश्ता रहा है। चेक गणराज्य के पहले राष्ट्रपति वक्लाव हवेल दलाई लामा के करीबी मित्र थे और उन्होंने तिब्बती स्वतंत्रता आंदोलन का खुलकर समर्थन किया था। दलाई लामा ने 1990 से अब तक चेक गणराज्य की 11 बार यात्रा की है, और 2010 में उन्हें प्राग शहर की मानद नागरिकता दी गई थी। पावेल की यह मुलाकात उस ऐतिहासिक दोस्ती का प्रतीक है, जिसे लेकर चीन हमेशा संवेदनशील रहा है।
मीडिया पर बहस, बताया कूटनीतिक असभ्यता
चीन की इस प्रतिक्रिया ने अंतरराष्ट्रीय समुदाय और सोशल मीडिया पर बहस छेड़ दी है। एक्स पर कई यूजर्स ने चीन के रवैये की आलोचना की। एक यूजर (@dolma19) ने लिखा, “चीन ने चेक राष्ट्रपति की दलाई लामा से मुलाकात की आलोचना कर फिर से अपनी कूटनीतिक असभ्यता दिखाई है। यह शांति और सद्भावना के लिए की गई अपील को राजनीतिक रंग देने की उनकी जिद को दर्शाता है।” वहीं, एक अन्य यूजर (@YoungdoungT) ने पावेल की सराहना करते हुए लिखा, “चीन की धमकियों के बावजूद तिब्बत का समर्थन करने के लिए चेक राष्ट्रपति और जनता का धन्यवाद। यह सत्य और न्याय के लिए एक मजबूत संदेश है।”
साइबर हमले के लिए चीन को ठहराया जिम्मेदार
चीन और चेक गणराज्य के बीच हाल के वर्षों में संबंध तनावपूर्ण रहे हैं। मई 2025 में चेक सरकार ने अपने विदेश मंत्रालय पर साइबर हमले के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराया था। इसके अलावा, चेक राजनेताओं की ताइवान यात्राएं और पूर्व ताइवान राष्ट्रपति साई इंग-वेन की प्राग यात्रा ने भी बीजिंग को नाराज किया है। पावेल की दलाई लामा से मुलाकात ने इस तनाव को और बढ़ा दिया है। विश्लेषकों का मानना है कि यह घटना दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक संबंधों पर नकारात्मक असर डाल सकती है।
चेक राष्ट्रपति पेट्र पावेल की दलाई लामा और तिब्बती नेताओं से मुलाकात ने तिब्बती मुद्दे को फिर से वैश्विक मंच पर ला दिया है। जहां यह मुलाकात तिब्बती समुदाय के लिए एकजुटता और समर्थन का प्रतीक है, वहीं चीन की तीखी प्रतिक्रिया उसकी तिब्बत नीति की संवेदनशीलता को उजागर करती है। यह घटना न केवल चेक-चीन संबंधों के लिए, बल्कि वैश्विक कूटनीति में मानवाधिकार और स्वतंत्रता के सवालों को भी केंद्र में लाती है। क्या चीन का दबाव चेक गणराज्य जैसे देशों को अपनी नीतियों से पीछे हटने पर मजबूर करेगा, या यह तिब्बती मुद्दे पर और अधिक अंतरराष्ट्रीय समर्थन को प्रेरित करेगा? यह सवाल भविष्य में वैश्विक राजनीति की दिशा तय कर सकता है।







