दीपावली के दियों के लिए नाच उठे कुम्हारों के चाक

0
624

दिपावली का पर्व कुछ दिन शेंष रह गया है ऐसें मे सभी लोग जहाँ अपने घरो को सफाई कर घर को सजाने मे लगे है वहीं पुरातन काल से चली आ रही परम्परा के तहत कुम्हार दियो को बनाने मे लग गये है और उनके चाक पुरी गति से चल रहे है। लेकिन कुम्हारो के इस पारम्परिक रूप से रोजी रोटी पर अब संकट के बादल मडराने लगे है क्योकि आधुनिक युग मे सुचना प्राद्योगिकी और इलेक्ट्रानिक उपकरणो ने दियो की जगह अपना स्थान बना लिया है। लोग कम लागत मे पुरी सुन्दरता के साथ दियो की जगह पर इलेक्ट्रानिक उपकरणो का प्रयोग करने लगे है। और मिटटी का दिया लुप्त होंने के कगार पर पहुंच गया है।
यू तो भारत वर्ष मे सैकड़ो की संख्या मे पर्व मनाये जाते है लेकिन दिपावली पर्व का अपना एक विशेष महत्व है। सुख, सौभाग्य, समृद्वि और अनुपम खुशियो का यह पर्व लोग बड़ी श्रद्वा और धन समृद्वि की कामना के साथ जरूर मनाते है और अपने स्रेंहीजनो को उपहार देकर गले मिलकर उनके सुखद और समृद्व जीवन की मंगलमयी कामना करते है। पुरातन काल से मिटटी के दियो का प्रयोग लोग करते चलें आ रहे है अपने घरो, चौबारो, अटालिकाओ पर दियो की पांति सजाकर प्रकाश पर्व दिपावली को बड़ी श्रद्वा पुर्वक मनाते चले आ रहे है। किसी कवि ने लिया है कि-‘‘ दिवाली प्यारी आती है, दिवाली न्यारी आती है, दियो की पांति जलाने को, हृदय से खुशी मनाने को, दिवाली प्यारी आती है।‘‘
उक्त पंक्ति से स्पष्ट है कि दिपावली जो प्रकाश पर्व है मनुष्य के जीवन मे दुख, निराशा, असफलता और दरिद्रता की घनीभुत कठोर कालिमा को मिटाकर मनुष्य के जीवन को सुख समृद्व देते हुये अपार खुशिया प्रदान कर दिपावली कें दिये उनके जीवन को अपने रश्मिमयी किरणो से जीवन को आलोकित कर देती है लेकिन युग बदला, लोग बदले और हमारे पारम्परिक रीति रिवाज भी आधुनिक युग के सुचना प्राद्योगिकी के कहर से बच नही पाये और कुम्हार जो आदि काल से मि? के दिये बनाकर लोगो के घर के लिए प्रकाश पर्व मे सहयोग कर रोजी रोटी का जुगार कर लेते थे आज इनके सामने भी संकट के काले बादल भी घिर गये है। लोग मिटटी के दिखे जलाने के बजाय आज तमाम प्रकार के इलेक्ट्रानिक उपकरण जो कम विद्युत खर्च एलईडी युक्त वस्तुओ का प्रयोग कर रहे और यहाँ तक की मोमबत्ती जैसे रोजगार पर भी संकट के बादल घिर गये है। आज कुम्हार काफी मशक्कत कर चाक पर मिटटी के दिये बनाते है जो आधुनिक युग मे इन सब उपकरणो से कुम्हार के जीवन यापन करने मे दिक्कते पैदा हो गयी है। पहले कुम्हार शिकहर बहिया बनाकर दिये और मिटटी के खिलौने जिसमे चाकी, घंटी, कोशे आदि रखकर गांव और शहरो मे पहुंचते थे और लोगो जहाँ दिये खरीदते थे वही बच्चो के लिए उनके मनपसन्द के मिटटी के खिलौने भी खरीदते थे लेकिन आज सब कुछ बदल गया और इस बदले परिवेश मे किसी को राहत मिली तो किसी की रोजी रोटी पर संकट पैदा हो गया।

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here