जानिए अयोध्या के हनुमानगढ़ी मंदिर के बारे में दिलचप्स बातें जिन्हें आपने कभी न सुना/पढ़ा होगा
हेमंत कुमार/जी क़े चक्रवर्ती
कहते हैं। यहां आसपास के गांव-देहात के लोग इसको बुढ़वा मंगल के नाम से भी पुकारते हैं। लखनऊ में हनुमान जी की बड़ी मान्यता है। कोई भी नई गाड़ी खरीदता है तो उसे सबसे पहले हनुमान मंदिर में लाकर पूजा करवाता है। शादी विवाह के लिए लड़का और लड़की को देखने और दिखाने के लिए बहुत से परिवार हनुमान मंदिर में आते हैं और बात तय हो जाती है तो लड़की के हाथ शगुन के कुछ रूपये आदि रख कर शादी की बात पक्की करते हैं जो इस बात का द्योतक होता है कि लड़के और उसके परिवार वालों को लड़की पसंद है। इस प्रकार विवाह कार्यक्रम की पहली रस्म पूरी होती है और हनुमान जी को प्रसाद चढ़ा कर उनका आशीर्वाद लिया जाता है।
लखनऊ के नवाबों की भी हनुमान पर बड़ी श्रद्धा रही है। उसकी शुरुआत नवाब शुजाउद्दौला की दूसरी पत्नी छतरकुंवरि से शुरू होती है जो नवाब कि हिंदू रानी थीं और बहराइच के रैकवार ठाकुरों की बेटी थीं। उनकी हनुमान जी पर बहुत आस्था थी। नवाब शुजाउद्दौला फैजाबाद में रहते थे। उसी समय उसी अयोध्या में बाबा अभयदास एक बड़े नीम के कटोरे में हनुमान जी की मूर्ति रख कर उनकी उपासना करते थे। उनके भक्तों की उनपर अपार श्रद्धा थी। भक्तगण उनके पास अपनी समस्या लेकर आते थे और अपना दुख- सुख बाबा जी से कहते थे। बाबा जी उनका हाल-चाल सुनाते और कष्ट दूर करने के उपाय के रूप में अपनी जलती हुई धूनी की राख की पुड़िया बनाकर देते थे उनके आशीर्वाद से लोग लोग ठीक हो जाते थे।
छतरकुंवरि भी बाबा जी की ख्याति से अवगत थी। एक बार नवाब शुजाउद्दौला काफी बीमार हो गए और दवाओं से भी कोई लाभ नहीं हो रहा था। रानी छतरकुंवरि के कहने पर नवाब साहब भी बाबा जी से मिलने आए और अपना हाल बताया। बाबा जी ने उनको भी भभूत की पुड़िया बना कर दे दी। इस भभूत के सेवन के बाद नवाब साहब की तबीयत में आश्चर्यजनक सुधार आया और वह शीघ्र ही स्वस्थ हो गये। अब तो वे भी बाबा जी के मुरीद हो गये। वह पुनः बाबा जी से मिलने आये और बाबा से आग्रह किया कि वे नवाब से अपने लिए कुछ मांग लें। इस पर बाबाजी ने कहा कि वे तो बैरागी संत हैं। उन्हें अपने लिए कुछ नहीं चाहिए। लेकिन आप कुछ देना ही चाहते हैं तो इन हनुमान जी को दें जो पेड़ के कटोरे में बैठे हैं, और उनकी कृपा से आप ठीक हुए हैं। आप ऐसा करिये कि हनुमान जी के लिए एक मंदिर बनवा दें। इस पर नवाब साहब ने हनुमान मंदिर के लिए जमीन दान दी और राजा टिकैत राय ने उस जमीन पर गढ के रूप में हनुमान जी का मंदिर बनवाया जिसको अयोध्या का हनुमानगढ़ी मंदिर कहा जाता है।
रानी छतरकुंवरि ने हनुमान जी से मन्नत मांगी कि उनको एक पुत्र संतान दें। उनकी मनोकामना पूरी हुई और उनको पुत्र रत्न की प्राप्ति हुई। उन्होंने अपने पुत्र का नाम मिर्जा मंगली रखा। यही मिर्जा मंगली आगे चल कर नवाब आसिफुद्दौला निजामुद्दीन रखा पंकजा मुंडे आगे चलकर नवाब शुजाउद्दौला के बाद नवाब सआदत अली खाँ के नाम से अवध की गद्दी पर बैठे।
नवाब आपनी माता छतर कुंवरि को लखनऊ ले आयें अब वे नबाव की माता के रूप में बेगम आलिया कहीं जाने लगी। पुत्र संतान पाने कि उनकी तमन्ना पूरी हो चुकी थी और अब तो उनका पुत्र साहिबे तख़्त था। इसलिए उन्होंने लखनऊ में एक हनुमान मंदिर बनवाया तथा एक मोहल्ला उनके नाम पर बसाया जो आलियागंज कहलाया जो अब अलीगंज कहा जाने लगा और उनका बनवाया मंदिर ही आज का अलीगंज का प्रसिद्ध हनुमान मंदिर है।
इस प्रकार यह स्पष्ट है कि अलीगंज मोहल्ले का हजरत अली से दूर-दूर तक का कोई संबंध नहीं है। यहां पर यह बात ध्यान देने योग्य है कि नवाबी शासनकाल में हनुमानगढ़ी और अलीगंज के हनुमान मंदिर की स्थापना का श्रेय हिंदू रानी छतरकुंवारि को है।लखनऊ में बड़े मंगल में भंडारा कराने की परंपरा का भी एक रोचक इतिहास है। नवाब वाजिद अली शाह के समय में भारमल जाट नामक एक इत्र का व्यापारी लखनऊ आया। उसने लखनऊ के लोगों के शौक के बारे में काफी सुन रखा था। वह कई दिनों तक शहर में घूमता रहा लेकिन उसका इत्र नहीं बिका। यहां तक कि जो नगद पैसा आपने खर्च के लिये लेकर आया था, वह भी समाप्त होने पर आ गया। उसने अलीगंज मंदिर के पुजारी से अपनी परेशानी बताई। पुजारी ने कहा भाई हनुमान जी से कहो। वही बेड़ा पार लगायेंगे। व्यपारी ने हनुमान जी से प्रार्थना कि और कहा यदि आज का माल बिक जाएगा तो वह मंदिर पर भंडारा करायेगा।
पुजारी ने व्यापारी को सलाह दी कि तुम नवाब वाजिद अली शाह के पास अपना इत्र लेकर जाओ। शायद वहां तुम्हारा माल बिक जाए। इस पर वह नवाब से मिला और कहा कि मैंने लखनऊ के बारे में बहुत सुना था लेकिन मैं दो महीने से लखनऊ में घूम रहा हूं किसी ने मेरा इत्र नहीं लिया। इस पर नवाब साहब ने का सारा इत्र खरीद लिया। कहते हैं कि नवाब साहब उस समय कैसरबाग की सफेद बारादरी बनवा रहे थे। उन्होंने उसके प्लास्टर के मसाले में सारा इत्र डलवा दिया। इस कारण कैसरबाग बारादरी का भवन तीन साल तक महकता रहा था। अब व्यापारी ने खुश होकर मंदिर पर भंडारा कराया। संयोग से उस दिन भी जेठ मंगलवार था। तब से जेठ मंगलवार को भंडारा करने की परम्परा चल पड़ी जो अब तक चली आ रही है।







