तरबूज खाइए फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है

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प्रकृति की ओर लौटो-

जगजीत सिंह अगर इश्क़ करने से पहले तरबूज खा लेते तो शायद उनकी ग़ज़ल का मतला कुछ यूं होता-

होशवालों को खबर क्या वाटरमेलन क्या चीज है,
तरबूज खाइए फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है।

वास्तव में तरबूज जैसा कोई फल नहीं। मेरे खयाल से तो नहीं। इसका रंग, इसका रूप… रस, गंध, स्वाद… सब कितना निराला। अहा! जो खाता है, वही जानता है।

गर्मी का मौसम आते ही जिस एक फल का सबसे ज्यादा इंतजार रहता है, वो तरबूज ही है। रस से भरा, मीठा- मीठा। आप भी तरबूज के शौकीन हैं तो आपको भी इंतजार होता होगा। मुझे भी। तो चलिए इंतजार खत्म, ठंडा-ठंडा, लाल गूदे वाला मीठा तरबूज हाजिर है।

तरबूज आपको सिर्फ स्वाद ही नहीं सेहत भी देता है। यह शरीर में पानी की कमी को पूरा करता है। तरबूज में लगभग 97% पानी होता है यह शरीर में ग्लूकोज की मात्रा को भी पूरा करता है। यह आपको ताजगी और ठंडक तो पहुंचाता ही है, रक्तचाप को भी संतुलित रखता है और कई बीमारियाँ दूर करता है।

तरबूज खाने से दिमाग शांत रहता है और गुस्सा कम आता है। दरअसल तरबूज की तासीर ही ठंडी होती है। इस फल में लाइकोपिन पाया जाता है जो त्वचा की चमक को बरकरार रखता है। हृदय संबंधी बीमारियों को रोकने के अलावा यह कोलस्ट्रॉल के लेवल को नियंत्रित करता है। विटामिन प्रचुर मात्रा होने के कारण ये शरीर के इम्यून सिस्टम को भी अच्छा रखता है। इसका जूस खून की कमी को दूर करने में सक्षम है।

चित्र में ये शामिल हो सकता है: Vinayak Rajhans, खड़े रहना, बाहर और प्रकृति

गूदे के अलावा तरबूज का बीज भी बहुत उपयोगी होता है। बीजों को पीसकर चेहरे पर लगाने से निखार आता है, साथ ही इसका लेप सिर दर्द में भी आराम पहुंचाता है।

बीज से तमाम यादें भी जुड़ी होती हैं। तरबूज के बीज बचपन के साथी होते हैं। बचपन में जब कभी हम तरबूज खाते तो उसके चिकने बीज को किसी साथी का नाम लेते हुए ऊपर की तरफ उछालकर कहते- फलां का ब्याह किधर होगा? बीज जिस दिशा में जाता, उधर ही ब्याह होना तय हो जाता।

इसके अलावा गर्मियों की तमाम दोपहर इन बीजों को जमा करने और उन्हें फोड़कर इनकी गिरी को खाने में खर्च हो जाती। ईंट के छोटे टुकड़े से तरबूज का बीज फोड़ते और गिरी निकालकर खा लेते। ये गिरी बड़ी स्वादिष्ट होती है। बाजार में इसे मेवे का दर्जा हासिल है। महंगी भी काफी बिकती है।

मैंने भी गंगा की असीम रेत में तरबूज बोए हैं। रखवाली के लिए कई-कई रातें गंगा की गोद में ही बिताई हैं। गंगा की अविरल धार को छूकर आती ठंडी पवन तन-मन को ऐसी शीतलता प्रदान करती है मानो जन्नत में बैठे हों। सुबह उठते ही ब्रश करने के बाद सबसे पहले तरबूज पर ही टूट पड़ते। अपने हाथ से ठंडे तरबूज तोड़ते, हाथ से ही फोड़ते और फिर उसका रक्तिम गूदा निकाल मजे से खाते। पूरा दिन तरोताजा रहते।

बहरहाल, तरबूज का मौसम शुरू हो चुका है। बाजार में दुकानें हरी-काली धारियों वाले तरबूज से सजने लगी हैं, हालांकि इस बार बहुत ही कम दुकानें हैं।

गीतकार कहते हैं कि गुड़ से मीठा इश्क़ है, पर मैं कहता हूं कि फिलहाल इश्क़ से मीठा तरबूज है। तो तरबूज खाइए फिर समझिए जिंदगी क्या चीज है!

  • विनायक राजहंस  

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