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    Home»धर्म»Spirituality»Short Inspirational

    बाल कहानी: इको फ्रेंडली दिवाली

    By March 8, 2020 Short Inspirational No Comments4 Mins Read
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    जैसे-जैसे दिवाली नजदीक आ रही थी, झबरू पिल्ले के दिल की धड़कनें बढ़ती ही जा रही थीं। उसे रह-रह कर पिछली दिवाली याद आ रही थी। तब तो उसकी उम्र मात्र कुछ ही दिन की थी। पटाखों के तेज शोर से डरता वह एक दीवार से सटा हुआ अपने चार और भाई-बहनों के साथ मां से चिपका हुआ पड़ा था। पूरा शहर जहां तरह-तरह के पकवान खा और खिला रहा था, वहीं उसके परिवार को उस रात भूखे ही रहना पड़ा था। बच्चों के उदास और डरे हुए चेहरे देख कर उसकी मां हिम्मत कर के पास वाले कचरे के डिब्बे तक खाना ढूंढ़ते गई भी थी, मगर किसी शैतान बच्चे ने उस डिब्बे में एक जलती हुई फुलझड़ी फेंक दी थी जिससे उसकी मां का चेहरा जल गया और वह दर्द से कराहती हुई खाली हाथ लौट आई थी।

    उसे याद आ रहा था धुएं से अटा हुआ वह वातावरण जब उसका सांस लेना भी दूभर हो रहा था। वह एक-एक पल गिन-गिन कर बिता रहा था। ईश्वर से वह रात जल्दी बीतने की प्रार्थना कर रहा था, ताकि जल्दी से सुबह हो और वह ढेर सारी आक्सीजन लेकर अपने फेंफड़ों को राहत दे। मगर उसके सोचने भर से क्या होता है… एक नहीं, पूरे पांच दिन चला था ये दीपोत्सव..। उसके बाद हर तरफ कचरा ही कचरा, धुआं ही धुआं। पूरा शहर जिसे दिवाली से पहले लोगों से साफ करके चमका दिया था, अब एक कचरे का डिब्बा नजर आ रहा था।

    ‘अभी कल ही लोगों ने दशहरे का रावण फूंका है। बीस दिन बाद दिवाली आएगी और फिर से इतिहास दोहराएगी। अब तो उसके दो भाई और एक बहन भी नहीं रहे। एक बीमारी का और दो सड़क हादसे का शिकार हो गए। इस बार वह कितना अकेला है’, झबरू सोचने लगा। हालांकि अब वह बड़ा हो गया, मगर पटाखों के शोर से आज भी कांप उठता है।‘बकरे की मां कब तक खैर मनाएगी?’ आखिर दिवाली की शाम आ ही गई। झबरू ने दो वक्त का खाना जमा करके दोपहर को ही अपने आपको एक सूने मकान में छिपा लिया था। वह खुद छिपा बैठा था, मगर उसके कान पूरी तरह से सक्रिय थे। वह गली में होने वाली हर बातचीत पर ध्यान लगाए था। शाम के धुंधलके के साथ ही गली में दीपों की कतारें सजनी शुरू हो गयी। झबरू ने थोड़ा सा झांक कर देखा, बच्चे नए-नए कपड़ों में सजे-धजे घूम कर एक-दूसरे को बधाई दे रहे थे। ‘बस! अब शोर शुरू होने ही वाला है..और फिर वही धुआं ही धुआं।’ झबरू ने बुरा सा मुंह बनाया और लंबी सांस खींच कर अपने फेफड़ों में ताजा हवा भरी।

    झबरू की आंख कब लग गई उसे पता ही नहीं चला। सुबह उठा तो देखा कि गली में कहीं भी जले हुए पटाखों का कचरा नहीं है। हवा भी ताजा लग रही थी। ‘क्या हुआ! क्या किसी ने दिवाली नहीं मनाई? हे भगवान! कहीं कोई दुर्घटना तो नहीं हो गई?’, सोच कर ही झबरू कांप गया। हिम्मत करके धीरे से दुम दबाता हुआ बाहर निकला। गली के मोड़ पर चार लोगों को बातें करते देख कर उसने भी अपने कान उधर लगा दिए।

    ‘इस बार मास्टर जी ने इको फ्रेंडली दिवाली मनवा कर कितना अच्छा काम किया। न कोई शोर-शराबा, न धुआं और प्रदूषण…’ एक बोला। ‘हां, बिल्कुल सही! हर बार हम त्योहार के नाम पर जाने-अनजाने पर्यावरण को कितना नुकसान पहुंचा देते हैं जिसका नुकसान हमें ही उठाना पड़ता है।’ दूसरे ने कहा। ‘और देखो! इस बार दिवाली एकदम बजट में हो गई।’ तीसरे ने खुश होते हुए कहा तो झबरू को सारी बात समझ में आ गई कि ये सारा कमाल मोहल्ले में नए रहने आए मास्टर जी की सीख का है जिन्होंने सबको इको फ्रेंडली दिवाली मनाने के लिए प्रेरित किया। ‘काश! कि हरेक व्यक्ति की सोच मास्टर जी जैसी हो जाए तो ये पृथ्वी कितनी हरी-भरी और प्रदूषण रहित हो जाए’, सोचते हुए उसने आदर के साथ मास्टर जी के घर की तरफ देखा और मन ही मन उन्हें प्रणाम करके मुस्कुरा दिया।

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