हेमंत कुमार/ जी क़े चक्रवर्ती
भगवती चंद्रिका देवी का मंदिर लखनऊ के बख्शी का तालाब क्षेत्र के कठवार ग्राम में स्थित है। यह मंदिर अति प्राचीन है। लखनऊ के बहुत संबंधी रामायण कालीन है। उनमे से चंद्रिका देवी के मंदिर का भी नाम आता है। ऐसा कहा जाता है कि भगवान राम ने जब अश्वमेध यज्ञ किया था तब प्रथा के अनुसार उन्होंने इस यज्ञ का घोड़ा छोड़ा था। वह घोड़ा विचरण करते हुए कठवारा ग्राम आया था। उस घोड़े के साथ भगवान राम की सेना का एक दाल राम के भाई भरत के पुत्र श्वेतकेतु के संरक्षण में चल रहा था।
राजकुमार श्वेतकेतु की माता मांडवी दस महाविद्याओं में से एक मातंगी देवी की उपासिका थीं। उन्होंने चलते समय अपने पुत्र की बाहों में मतंगी देवी का यंत्र बांध दिया था और कहा था कि यदि कोई संकट या भय उपस्थित हो तो इस रक्षा कवच की पूजा कर माता का स्मरण करना। माता तुम्हारी रक्षा करेंगी। कठवारा पहुंचने तक रात हो चली थी अतः सबने वही रात्रि किया। रात में राजकुमार को बहुत भय लगा। तब उन्होंने माता का स्मरण किया। माता ने प्रत्यक्ष होकर उनको अपना दर्शन आशीर्वाद दिया।
कहते हैं कि माता के प्रत्यक्ष होने पर वहां चंद्रिका छा गई थी और दिन की तरह प्रकाश हो गया था। इस कारण इस स्थान को चंद्रिका या या यहां की स्थानीय बोली में ‘चंदिकन’ कहते हैं और मंदिर को चंद्रिकादेवी का मंदिर कहते हैं।
सत युग में यहां पर राजा सुधन्वा ने यहां पर अश्वमेध यज्ञ किया था। उस समय उन्होंने एक सरोवर बनवाया था, जो आज भी है और राजा के नाम से सुधन्वा ताल कहलाता है।
इस सरोवर को महिसागर तीर्थ भी कहते हैं। कभी यह सरोवर बहुत गहरा था। कहा जाता है कि गोमती का पानी इसमें आता था और अंदर ही अंदर नीमसार सीतापुर स्थित चक्रतीर्थ को चला जाता था। चक्रतीर्थ से एक पतली धार गोमती तक गई है। उसके द्वारा यह जल पुनः गोमती में मिल जाता है। महाभारत काल मे पांडव भीम के पौत्र बर्बरीक ने यहां रहकर तपस्या की थी।

भगवान श्री कृष्ण के साथ पांडव यहां आये थे। उस समय किसी बात पर भीम व बर्बरीक में युद्ध हो गया था। जब बर्बरीक भीम को उठाकर महिसागर में फेंकने वाले थे तब कृष्ण ने उनको रोक था कि भीम तुम्हारे पितामह है और इस अतल जल में तुमने इनको फेंका तो इनकी मृयू हो जायेगी। तीर्थ राज प्रयाग से भी अधिक महिमा इस महिसागर तीर्थ की है।
वर्ष भर की सभी अमावस्या को तथा दोनो नवरात्रों को यहां मेला लगता है। जिनमे भक्तों की भारी भीड़ जुटती है। शादी के बाद नये जोड़े तथा बच्चों का मुंडन संस्कार करने लोग यहां पर आते रहते है। भक्तो की मान्यता और आस्था को देखते हुये चंद्रिका देवी मंदिर को लखनऊ की वैष्णों देवी कहा जाये तो कोई अतिशयोक्ति न होगी।
-हेमंत कुमार जी वरिष्ठ इतिहासकार और /जी.के.चक्रवर्ती वरिष्ठ पत्रकार है







