पूरे विश्व मे भारत का हिन्दू धर्म ही एक मात्र ऐसा धर्म है जहाँ विभिन्न पशु, पक्षियों, जीवों से लेकर ज़िंदा मनुष्यों तक कि समय समय पूजा अर्चना की जाती है।
जैसा कि हम में से अधिकतर लोगों को जनमेजय का नाग यज्ञ के विषय मे पढ़ा सुना होगा यह नाग यज्ञ इतना शक्तिशाली था कि उसके प्रभाव से सभी सांप अपने आप खिंचे चले आते थे। तक्षक नाग इस यज्ञ के भय से पाताल लोक में जाकर छिप गए। राजा जनमेजय ने भी तक्षक नाग की मृत्यु के लिए यह यज्ञ शुरू किया था, लेकिन काफी देर बाद तक तक्षक नाग के न आने पर राजा ने ऋषियों और मुनियों को यज्ञ को मंत्रों द्वारा और अधिक शक्तिशाली करने को कहा, जिससे उस शक्ति के प्रभाव से तक्षक नाग यज्ञ में आकर स्वयं गिर जाएं।
मंत्रों के प्रभाव से तक्षक नाग यज्ञ की ओर खिंचे चले आ रहे थे। उन्होंने सभी देवताओं से उनकी जान बचाने का आग्रह किया। तब देवताओं के प्रयास से ऋषि जरत्कारु और नाग देवी मनसा के पुत्र आस्तिक मुनि नागों को हवन कुंड में सांपों को जलने से बचाने के लिए आगे आए। ब्रह्माजी के वरदान के कारण आस्तिक मुनि ने जनमेजय के यज्ञ का समाप्त करवाकर नागों के प्राण आहूत होने से बचा लिया।
हमारे धर्म गर्न्थो के अनुसार जिस दिन ब्रह्माजी द्वारा आस्तिक मुनि से नाग कुल को बचाने का वचन लेने के बाद उस दिन आस्तिक मुनि ने राजा जनमेजय द्वारा नागों के समूल विनाश के लिये किये जा सर्प यज्ञ को समाप्त करवाकर नागों के प्राण को आहूत होने से बचाया संयोग वश उस दिन सावन की पंचमी तिथि थी। इसलिए सांपों की पसंदीदा तिथि पंचमी का दिन है। इसलिए पंचमी और सावन की पंचमी तिथि के दिन हमारे देश मे नागपंचमी का त्यौहार बड़े धूमधाम से मनाने की परंपरा महाभारत काल अर्थात द्वापर युग से चली आ रही है।
नागपंचमी के इस त्यौहार को श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को प्रतिवर्ष इस त्यौहार को मनाया जाता है। इस दिन विशेषतः नागों की पूजा अर्चना की जाती है।
इस बार आज के दिन 13 अगस्त 2021 शुक्रवार को शुक्ल पक्ष की पंचमी को नागपंचमी का त्यौहार मनाया जा रहा है। इस दिन अष्ट नागों की पूजा अर्चना करने का विधान है। नागों की पूजा के पूर्व मां मनसा देवी की पूजा करना आवश्यक है।
साधारणतः नाग को देखते ही लोगों के होश फाख्ता हो जाते हैं वहीं दूसरी तरफ हरे देश के लोग द्वारा सर्पों की पूजा अर्चना भी क्या जाता हैं। दरअसल मुख्य रूप से इसका कारण हमारे भविष्य पुराण और दूसरे अन्य पुराणों में नागों को देव स्वरूप माना गया है। इसलिये नाग हमेशा भगवान शिव के गले के हार के रूप में उनके गले मे लिपटे दिखाई देते हैं तो कहीं भगवान विष्णु की शैय्या रूप में नजर आते हैं तो वहीं पर सुर-असुर द्वारा किये गये सागर मंथन के समय इसी नाग ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। पुराणों में तो कई दिव्य नाग एवं नागलोक तक का उल्लेख मिलता है। इन्हीं कथाओं और मान्यताओं के अनुसार हिंदू धर्म में नागों का स्थान देवताओं के समान होने से पूजनीय है।
- प्रस्तुति : जी के चक्रवर्ती







