वीर विनोद छाबड़ा
सिनेमा इतिहास की सर्वश्रेष्ठ ट्रेजेडी क्वीन के लिए कई बार फ़ेहरिस्त बनी। टॉप पर हमेशा दिवंगत मीना कुमारी नाम ही दिखा। लेकिन मीना को महज़ बेहतरीन अदाकारा के लिए ही याद नहीं किया जाता। वो त्रासदी का पर्याय भी थीं। उनकी ज़िंदगी में इतनी ज़्यादा त्रासदियों हुईं कि एक दुखांत फिल्म बन सकती है, बशर्ते डायरेक्टर बढ़िया हो कोई गुरूदत्त जैसा या उनका कोई शागिर्द.
मीना की ट्रेजिक ज़िंदगी के पीछे उनका मर्दों के मामले में च्वॉइस कुछ अजीब सी रही।
उन्होंने पंद्रह साल बड़े कमाल अमरोही को चाहा, पहले से शादी-शुदा और कई बाल-बच्चों वाला। एक बंटा हुआ शख़्स, न उधर का हो पाया और इधर का। फिर भी वो कमाल के बच्चों को प्यार करती रही। कुछ वक़्त के बाद मीना को अहसास हुआ कि उन्होंने कमाल को कभी चाहा ही नहीं था। और न कमाल ने उनको।तो क्या मीना को एक क़ाबिल डायरेक्टर चाहिए था कमाल को फ्री की हीरोइन? उस वक़्त के हालात तो यही बताते थे। कुछ अरसे बाद मीना की समझ में आया कि उनका इस्तेमाल हो रहा है। तब उन्होंने तलाक़ देने में देरी नहीं की। कई जगह सुना-पढ़ा तो एक सच यह भी सामने आया कि कमाल को मीना की कमाई से मतलब था। तुम कमाओ और मैं तुम्हारी कमाई से फ़िल्म बनाऊं।
मीना की ज़िंदगी में दूसरा शख़्स आया – धर्मेंद्र. वो भी शादी-शुदा, मगर उम्र में कम। दोनों ने साथ-साथ सात फ़िल्में की – पूर्णिमा, काजल, चंदन का पालना, फूल और पत्थर, मैं भी लड़की हूं, मझली दीदी और बहारों की मंज़िल. मीना ने धर्मेन्द्र को फ़िल्मी दुनिया का सच बताया कि यहां उगते सूरज को सलाम किया जाता है, डूबते को नहीं। उसका शीन-काफ़ और तलफ़्फ़ुज़ दुरुस्त किया। लेकिन धर्मेंद्र ने ड्रीम गर्ल के लिए मीना जी को छोड़ दिया। उस दौर के लोग बताते हैं धर्मेंद्र की कार के पीछे पीछे भागती थीं मीना जी, लेकिन धर्मेंद्र रुकते नहीं थे।
मीना को ज़रूरत थी एक ऐसे शख्स की जो खुद को भूल कर चौबीस घंटे उनके साथ रहे। उनके आगोश में बंधा रहे. उसे एक बच्चा दे सके. ऐसा शख्स उन्हें गुलज़ार (मेरे अपने) में भी नहीं दिखा और न सावन कुमार टाक (सात फेरे और गोमती के किनारे) में भी नहीं। और फिर अपनी उमगें कुचल कर उनके पास बैठने की फुर्सत किसे?
मीना बचपन से ही फैमिली के लिए रोटी-रोज़ी जुटाने का साधन रहीं। खेलने-कूदने की उम्र एक स्टूडियो से दूसरे स्टूडियो के चक्कर काटते गुज़री। वो कब जवान हो गयीं, पता ही नहीं चला। दूसरों के लिए जीती रही. दूसरे उन्हें इस्तेमाल करते रहे और वो इस्तेमाल होती रही। अवसाद में घिरी रही. डॉक्टर ने अच्छी नींद के लिये एक घूंट ब्रांडी का नुस्खा लिखा। लेकिन मीना ने जल्दी ही एक घूँट ब्रांडी को आधा गिलास कर दिया. फिर ब्रांडी की जगह शराब ने ले ली। जब समझाया गया तो वो डिटोल की शीशी में भरने लगी। खुद को शराब के हवाले कर दिया। बल्कि ये कहना भी मुनासिब होगा कि शराब ही मीना के लिए मरहम का काम करती थी और साथ ही में भोजन का भी।
संयोग से फिल्मों में भी उन्हें सियापे और त्रासदी से भरपूर किरदार मिले। वो इसी को मुक़द्दर समझ कर जीने लगीं। ‘साहब बीबी और ग़ुलाम’ की ‘छोटी बहु’ सरीखी ज़िंदगी अपना ली। इतने परफेक्शन के साथ जीया इसे कि यह किरदार ही कालजई हो गया। हर छोटी-बड़ी नायिका के लिए रोल मॉडल बन गयी। मीना की ज़िंदगी एक किताब हो गयी। मशहूर पत्रकार विनोद मेहता (अब मरहूम) ने तो लिख भी दी – Meena Kumari – A Classic Biography. एक किताब मधुप शर्मा ने भी लिखी – आख़िरी अढ़ाई दिन। इन किताबों को पढ़िए तो पता चलेगा कि मीना पर कितने ज़ुल्म हुए और कितने ज़ुल्म उन्होंने सहे। वास्तविकता तो यह है कि मीना जी की ज़िंदगी खंगाल कर कलमबद्ध करना शुरू करें तो क़लम रुकेगी ही नहीं।
ट्रेजडी की लीक से हट कर ट्रेजडी किंग दिलीप कुमार के साथ ‘आज़ाद’ और ‘कोहिनूर’ की। हलकी-फुल्की कॉमेडी भूमिका। क्या गज़ब चुलबुलापन था मीना में? कहीं देखने को मिलें तो ज़रूर देखें। आपको यक़ीन होगा ये ट्रेजेडी क्वीन मीना है। ये फ़िल्में करके दिलीप तो अवसाद से निकल गए, लेकिन मीना नहीं बाहर हो पायीं। बल्कि गहरे और गहरे डूबती गयीं। वज़ह वही जिसे अपना समझा वो बेवफ़ा निकला। सब कुछ लूट कर ले गया, पैसा और अमन। बदनसीबी ने उन्हें शायरा भी बना दिया।
मीना की बेहतरीन अदाकारी की बुनियाद में उनकी आवाज़ का भी बड़ा योगदान रहा। ध्यान से सुनें तो आपको अहसास होगा कि अल्फ़ाज़ उनके गले से नहीं दिल से निकल रहे हैं। भोगा हुआ यथार्थ।
दर्द में गले तक डूबे शब्द. ये सब मिल कर ऐसा जादुई इफ़ेक्ट बनता था कि सुनने वाला मंत्रमुग्ध होकर किसी दूसरी दुनिया में पहुंच जाता था। सुनील दत्त और नर्गिस ने मीना जी को नई ज़िंदगी देने की पहल की। छह साल से डिब्बे में बंद कमाल अमरोही की ‘पाकीज़ा’ फिर शुरू हुई. तब तक शराब ने मीना के जिस्म को अनावश्यक मोटा भी कर दिया था. जब ‘पाकीज़ा’ रिलीज़ हुई तो मीना की तबियत काफ़ी नासाज़ थी। फिल्म को अच्छी ओपनिंग नहीं मिली। लेकिन महीने बाद मीना को लीवर सिरॉसिस निगल गया। ट्रेजडी क्वीन को श्रद्धांजलि देने के लिए बॉक्स ऑफिस पर लंबी कतारें सज गयी। पूर्व पति कमाल अमरोही मालामाल हो गए. मगर मीना का दिया खाते रहे कमाल के पास तीन हज़ार रूपए नहीं थे कि हॉस्पिटल बिल चुका कर मीना की लाश उठाने के लिए।
यह मीना जी के पैर ही थे जिनके लिए राजकुमार ने ‘पाकीज़ा’ में कहा – इन्हें ज़मीन पर न रखियेगा, मैले हो जाएंगे. इससे पहले वो ‘काजल’ में साहिर की मार्फ़त फ़रमा चुके थे – छू लेने दो नाज़ुक होंठों को… मीना की अदाकारी का लेवल इतना ऊंचा था कि उन्हें फिल्मफेयर में बारह बार बेस्ट एक्ट्रेस के लिए नॉमिनेट किया गया और चार बार विजेता हुईं – परिणीता, बैजू बावरा, साहब बीवी और गुलाम और काजल. मीना जी ने कुल पिचानवे फ़िल्में कीं. कुछ यादगार फ़िल्में ये भी हैं – दुश्मन, बहु-बेगम, नूरजहां, चित्रलेखा, पिंजरे के पंछी, भीगी रात, बेनज़ीर, ग़ज़ल, दिल एक मंदिर, आरती, शरारत, यहूदी, शारदा, बादबान, चांदनी चौक, दो बीघा ज़मीन, चिराग़ कहां रोशनी कहां, प्यार का सागर, दिल अपना और प्रीत पराई, एक ही रास्ता आदि।
01 अगस्त 1932 को जन्मीं मीना 31 मार्च 1972 को मौत के आगोश में चलीं गयीं, महज़ 39 साल की उम्र में।ये उम्र नहीं होती है ऊपर जाने की और वो भी एक बेहतरीन अदाकारा के लिए तो हरगिज़ नही।







