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    Home»इंडिया

    चंद्रखुरी से चित्रकूट तक: अखंड भारत के ‘राजकीय गठबंधन’ की अनकही गाथा

    ShagunBy ShagunJanuary 4, 2026 इंडिया No Comments5 Mins Read
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    From Chandkhuri to Chitrakoot: The untold story of that 'political alliance' of undivided India.
    चंद्रखुरी से चित्रकूट तक: अखंड भारत के उस 'राजकीय गठबंधन' की अनकही गाथा
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    विशेष ग्रांड रिपोर्ट : विजय दीक्षित 

    चंद्रखुरी (रायपुर),छत्तीसगढ़। आज जब मैं चंद्रखुरी की उस पावन माटी पर खड़ा हूँ, जहाँ हवाओं में ‘भांचा राम’ के प्रति ममत्व घुला है, तो मुझे रामायण के वे पन्ने जीवंत होते दिखाई दे रहे हैं जो केवल भक्ति तक सीमित नहीं हैं, बल्कि एक महान साम्राज्य के विस्तार और संधि की कहानी कहते हैं। रायपुर के पास स्थित यह क्षेत्र केवल माता कौशल्या की जन्मभूमि नहीं है, बल्कि यह वह केंद्र है जिसने त्रेतायुग में ‘उत्तर’ और ‘दक्षिण’ को एक सूत्र में पिरोया था।

    1. दो कौशलों का महाविलय और राजा भानुमंत का त्याग

    इतिहास और ग्रंथों के अनुसार, उस काल में भारत दो विशाल ‘कौशल’ राज्यों में विभक्त था। उत्तर में अयोध्या (उत्तर कौशल) और दक्षिण में विन्ध्याचल के पार फैला ‘दक्षिण कौशल’। वाल्मीकि रामायण के बालकांड में स्पष्ट उल्लेख है कि माता कौशल्या ‘कौशल’ की राजकुमारी थीं। चंद्रखुरी के अधिपति राजा भानुमंत की कोई पुरुष संतान नहीं थी।

    जब कौशल्या का विवाह अयोध्या नरेश दशरथ से हुआ, तो भानुमंत ने केवल पुत्री का कन्यादान नहीं किया, बल्कि अपने संपूर्ण ‘दक्षिण कौशल’ साम्राज्य का विलय अयोध्या के विशाल साम्राज्य में कर दिया। यह प्राचीन भारत का सबसे बड़ा राजनीतिक और सांस्कृतिक विलय था।

    From Chandkhuri to Chitrakoot: The untold story of that 'political alliance' of undivided India.
    चंद्रखुरी से चित्रकूट तक: अखंड भारत के उस ‘राजकीय गठबंधन’ की अनकही गाथा

    2. राम-सीता गठबंधन,10,000 गाँवों का ‘दिव्य उपहार’

    जब हम दान और सीमाओं का विश्लेषण करते हैं, तो एक अद्भुत तथ्य सामने आता है। जब अयोध्या में प्रभु श्री राम और माता सीता का गठबंधन संपन्न हो रहा था, तब चंद्रपुरी (चंद्रखुरी) के राजा भानुमंत ने अपने वंश के गौरव को बढ़ाने के लिए एक ऐतिहासिक घोषणा की। उन्होंने राम और सीता को 10,000 गाँव उपहार स्वरूप भेंट किए।

    ये दस हजार गाँव वर्तमान पुराने उत्तर प्रदेश और पुराने मध्य प्रदेश की सीमाओं पर स्थित चित्रकूट और बांदा के वन क्षेत्रों तक फैले थे। इसी नाते तुलसीदास ने ‘रामचरितमानस’ में जब राम के वनवास का वर्णन किया, तो चित्रकूट के प्रति राम के विशेष अनुराग को दर्शाया। राम वास्तव में अपने वनवास के दौरान उन्हीं क्षेत्रों में रहे, जो तकनीकी रूप से उनके ननिहाल और पिता को उपहार में मिली भूमि का हिस्सा थे।

    3. ,विभिन्न रामायण में चंद्रखुरी और कौशल्या का संदर्भ

    वाल्मीकि रामायण:में यहाँ कौशल्या को ‘महिषी’ (प्रधान रानी) और ‘कौशल्या’ (कौशल की पुत्री) कहकर संबोधित किया गया है। वाल्मीकि जी ने दक्षिण कौशल की समृद्धता का संकेत दिया है, जो वर्तमान छत्तीसगढ़ की संपन्नता से मेल खाता है।

    *रामचरितमानस*में तुलसीदास जी ने कौशल्या के ममत्व और उनके ‘मायके’ के संस्कारों को राम के चरित्र में पिरोया है। “कौसल्या हितकारी…” के माध्यम से उन्होंने उस भूमि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की है जिसने राम जैसा पुत्र दिया।

    कंबन रामायण (तमिल) दक्षिण भारत की इस महान रामायण में माता कौशल्या को विशेष गौरव प्राप्त है। कंबन ने उन्हें ‘दक्षिण की आत्मा’ के रूप में चित्रित किया है और संकेत दिया है कि राम के भीतर का धैर्य और गंभीरता उन्हें उनकी माता के ‘दक्षिण कौशल’ के संस्कारों से मिली थी।

    4. रावण का अपहरण तंत्र और नदी मार्ग का संघर्ष

    जनश्रुतियों और क्षेत्रीय रामायणों (जैसे अद्भुत रामायण और स्थानीय दंतकथाओं) के अनुसार, रावण को पता था कि दशरथ-कौशल्या का मिलन उसकी लंका के विनाश का कारण बनेगा। जब दशरथ की बारात महानदी मार्ग से चंद्रखुरी की ओर जा रही थी, तब रावण ने कौशल्या का अपहरण कर लिया और दशरथ जी की नाव को नदी में डुबोने का प्रयास किया। यह घटना दर्शाती है कि रावण के लिए चंद्रखुरी का सामरिक महत्व कितना अधिक था।

    5. जन्मस्थली का तर्क : मायके की परंपरा

    प्राचीन भारतीय परंपरा के अनुसार, विवाहित स्त्री अपनी प्रथम संतान को जन्म देने के लिए अपने पिता के घर (मायके) आती थी। इसी ठोस सामाजिक तर्क के आधार पर चंद्रखुरी के विद्वान इसे राम की वास्तविक जन्मस्थली मानते हैं। छत्तीसगढ़ की संस्कृति में राम को ‘भगवान’ से अधिक ‘भांजा’ (भांचा) मानना और आज भी भांजों के चरण स्पर्श करना, इस ऐतिहासिक दावे की पुष्टि करता है कि राम ने अपना प्रथम क्रंदन इसी माटी पर किया था।

    6. सुषेण वैद्य : लंका से चंद्रखुरी का स्थायी प्रवास

    इस महान कथा की अंतिम कड़ी लक्ष्मण के प्राण दाता वैद्यराज सुषेण हैं। स्थानीय मान्यताओं और रामायण के उत्तर-प्रसंगों के अनुसार, सुषेण वैद्य युद्ध के पश्चात लंका नहीं लौटे। उन्हें इसी चंद्रखुरी क्षेत्र में ससम्मान बसाया गया, क्योंकि यह क्षेत्र उस समय दुर्लभ जड़ी-बूटियों और शांति का केंद्र था। आज भी यहाँ के औषधीय ज्ञान में सुषेण वैद्य की परंपरा की झलक मिलती है।

    चंद्रखुरी केवल एक मंदिर नहीं, बल्कि एक ‘जीवंत इतिहास’ है। राजा भानुमंत का त्याग, रावण का भय, राम का जन्म और चित्रकूट तक फैले 10,000 गाँवों की यह विरासत हमें बताती है कि राम का अस्तित्व भारत के कण-कण और जन-जन में समाहित है। आज यहाँ खड़े होकर एक पत्रकार के रूप में मैं कह सकता हूँ कि अयोध्या यदि राम की कर्मभूमि है, तो चंद्रखुरी वह हृदय है जहाँ से रामत्व की शुरुआत हुई।

    Shagun

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