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    Home»ब्लॉग

    नौकरी की भाषा अंग्रेजी क्यों, हिंदी का क्या गला ही घोट देंगे?

    By November 25, 2017 ब्लॉग No Comments5 Mins Read
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    ‘अपनी हिंदी भाषाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले नौजवान आखिर कहां जाएंगे जब इन्हें देश की सर्वोच्च सेवाओं में प्रवेश करने का मौका ही नहीं मिलेगा’


    जी.के चक्रवर्ती

    सम्पूर्ण दुनिया में शायद ही कोई ऐसा राष्ट्र होगा जहाँ नौकरी की भाषा ‘अंग्रेजी’ एक विदेशी भाषा हो और जिसे बोलने वाले लोग केवल पाँच प्रतिशत से भी कम ही हों। शिक्षा, प्रशासन एवं न्याय व्यवस्था से लेकर निजी क्षेत्रों में पहली प्राथमिकता में साधारणतः ऐसे लोग ही चुने जाते रहे हैं जो बेहतर अंग्रेजी जानते हैं। मानो आपकी समस्त प्रतिभाओं का एकमात्र मापदंड अंग्रेजी भाषा ही हो।

    इस षड्यंत्र के तहत संघ लोक सेवा आयोग द्वारा वर्ष 2011 में आयोजित सिविल सेवा परीक्षा मे कुछ एक बदलाव किए गए हैं। नये बदलाव में अंग्रेजी भाषा के प्रति झुकाव होने के साथ – साथ, इस परीक्षा की कसौटीयाँ भी ऐसी रखी गई है कि कैट, जी मैट और जीआरई जैसी परीक्षाओं के स्तरों के लगभग नजदिक हैं यह निश्चित रूप से बड़े- बड़े शहरों मे रह कर अंग्रेजी माध्यम के पब्लिक स्कूलों में पढ़ने वालों विद्याथियों के पक्ष में जाता है, जिसकी वजह से वर्ष 2011 के सी-सैट के परीक्षाओं के बाद हिंदी समेत अनेको भारतीय भाषाओं में पढ़े हुए गरीब, आदिवासी युवक इस दौड़ से बाहर हो गये।

    इससे पहले लगभग पचास प्रतिशत उम्मीदवार अपनी भाषाओं के बल-बूते प्रारंभिक परीक्षाओं को पास करके मुख्य परीक्षा तक पहुंचने मे सफल होते थे, अब ऐसे लोगों की संख्या लगभग नगण्य हैं साथ ही साथ अंतिम रूप से चुने जाने वाले विध्यार्थी इससे भी कम हैं। जहाँ बर्ष 2014 की परीक्षाओं में 1122 चुने गए उम्मीदवारों में सभी भाषाओं मे मिलाकर 53 विध्यार्थी हैं, जिसमें हिंदी माध्यम से चुने हुए केवल 26। विद्यार्थी हैं यह मामूली गिरावट नहीं है जिसके कारण लखनऊ, इलाहाबाद, पटना, जयपुर से लेकर भोपाल तक के लाखों छात्रों में भारी रोष देखा गया। इसका असर शेष भारतीय भाषाओं के विद्यार्थिओं पर भी हुआ, लेकिन उतना अधिक नहीं जितना की हिंदी भाषी राज्यों में हुआ।

    यहाँ यह विचारणीय प्रश्न यह है कि अचानक 2011 में कौन सी ऐसी मजबूरियों के चलते इस परीक्षा की पद्धति बदली गई। शिक्षाविद्, डॉ. दौलत सिंह कोठारी समिति की सिफारिशों के अनुसार वर्ष 1979 में पहली बार भारतीय प्रशासनिक सेवा, पुलिस सेवा, राजस्व, रेलवे समेत लगभग बीस विभागों की सम्मिलित परीक्षाओ में अंग्रेजी के साथ-साथ संविधान की आठवीं अनुसूची में उल्लिखित भारतीय भाषाओं में उत्तर देने की छूट प्रदान किया गया। डॉ. कोठारी ने भारतीय भाषाओं का पक्ष लेते हुए अपनी सिफारिशों में यह स्पष्ट रूप से कहा था कि जिसे भारतीय साहित्य और भाषा का ज्ञान नहीं उन्हें भारतीय नौकरशाही में आने का कोई हक नहीं है।

    उन्होंने अपनी सिफारिशों में यह भी लिखा था कि अपनी भाषाओं में उच्च शिक्षा प्राप्त करने वाले नौजवान आखिर कहां जाएंगे जब इन्हें देश की सर्वोच्च सेवाओं में प्रवेश करने का मौका ही नहीं मिलेगा। संसद की सहमति से पूरे देश ने इसका स्वागत किया और वर्ष 1979 में आयोजित परीक्षा में बैठने वालों की संख्या सारे कीर्तिमानों को तोड़ते हुए अप्रत्याशित रूप से बढ़ी। जहां 1960 और 1970 में इस परीक्षा में बैठने वाले छात्रों की संख्या छह हजार और दस हजार थी वहीं वर्ष 1979 में यह बढ़कर एक लाख से भी च्यादा हो गई। पहली बार गरीब, पहली पीढ़ी के शिक्षित, आदिवासी, दलित इन सर्वोच्च सेवाओं में चुने गए और वर्ष 1979 से 2010 तक के रिकार्ड इस बात के गवाह हैं कि हर वर्ष 15 से 20 प्रतिशत उम्मीदवार अपनी भाषाओं के बूते चुने गए।

    देश की जो सर्वोच्च नौकरशाही चंद शहरी अंग्रेजी बोलने वाले अमीरों तक सीमित थी उसमें पहली बार देश के गरीबों की भागीदारी देखी गई और यह संभव हुआ अपनी भाषाओं में उत्तार देने की छूट से। डॉ. कोठारी रिपोर्ट के लागू होने के बाद इस पद्धति का आकलन करने के लिए 1990 में प्रोफेसर सतीश चंद्र और वर्ष 2000 में प्रो. अलघ की अध्यक्षता में समिति बनी, लेकिन सभी ने एक स्वर से अपनी भाषाओं में उत्तार देने का समर्थन किया। 2011 में सिविल सेवा की प्रारंभिक परीक्षा में बदलाव प्रोफेसर एसके खन्ना की सिफारिशों के अनुसार किया गया।

    आखिर अंग्रेजी भारतीय भाषाओं पर पैर रखते हुए पहले चरण में कैसे प्रवेश पा गई, इसका उत्तार तो तत्कालीन सरकार ही दे सकती है, लेकिन इसके दुष्परिणाम बहुत घातक हो रहे हैं। वर्ष 2013 के शुरू में संघ लोक सेवा आयोग ने मुख्य परीक्षा में भी ऐसे परिवर्तन किए थे जो कोठारी समिति की सिफारिशों के एकदम उलट थे, लेकिन संसद से सड़क तक उसके खिलाफ पूरे देश में आवाजें उठीं और सरकार को मुख्य परीक्षा में प्रस्तावित भाषा संबंधी बदलाव वापस लेना पड़ा। लेकिन प्रारंभिक परीक्षा सी-सैट में यह भेदभाव अभी भी बरकरार है और उसी के खिलाफ छात्र आंदोलन कर रहे हैं।

    सी-सैट के खिलाफ एक जनहित मामला भी दिल्ली हाईकोर्ट में विचाराधीन है। हाईकोर्ट के आदेश पर कार्मिक मंत्रालय ने मार्च 2014 में एक तीन सदस्यीय समिति का गठन किया है, लेकिन उसमें भारतीय भाषाओं का कोई प्रतिनिधि नहीं है। अच्छी बात यह है कि नई सरकार इस मुद्दे के प्रति संवेदनशील जान पड़ती है और इसीलिए सरकार ने संघ लोक सेवा आयोग को सी-सैट परीक्षा में पुनर्विचार करने का आग्रह किया है और आयोग से कहा है कि यदि परीक्षा की तिथि आगे भी बढ़ानी पड़े तो उसके लिए भी कदम उठाए जाएं।

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