मिशन “कल के लिए जल” के राष्ट्रीय संयोजक ने कहा, यदि अभी नहीं सुधरे तो लोग पानी के लिए हर जगह लड़ते नजर आएंगे: चंद्रभूषण पांडेय
यह जानते हुए भी कि नशा शरीर के लिए हानिकारक है, अधिकांश लोग उसे तब तक नहीं छोड़ते, जब तक कि उसके कारण मौत सामने न दिख रही हो। यही स्थिति पानी की भयावहता पर है। हर दिन बढ़ रहे शहरीकरण, आंख बंद कर बिना सोचे-समझे आगे बढ़ने की ललक के कारण लोग प्रकृति से खिलवाड़ कर रहे हैं। यदि यही स्थिति रही तो आने वाले दिनों में पानी के लिए लोग आपस में लड़ते नजर आएंगे। ये बातें मिशन “कल के लिए जल” के राष्ट्रीय संयोजक चंद्रभूषण पांडेय ने कही।
उन्होंने कहा कि हमारी स्व के लिए सरकार पर बढ़ती आत्मनिर्भरता भी घातक है। लोगों ने यह मान लिया है कि यह सरकार के कार्य हैं, जबकि इसके लिए जब तक हम खुद जागरूक नहीं होंगे, तब तक पानी को बचाया नहीं जा सकता। जब पानी नहीं बचेगा तो जीवन नहीं बच सकता। उन्होंने “हिन्दुस्थान समाचार” से कहा कि पहले तालाब खुदवाना, कुंआ बनाना पुण्य का काम माना जाता था। आज लोग तालाब को पाटकर घर बनाने लगे हैं।
छत के पानी को पुन: भीतर पहुंचाने का खुद करें प्रबंध
चंद्रभूषण पांडेय ने कहा कि शहरीकरण का होना खराब नहीं है लेकिन एक सही कार्य को दफन कर दूसरा कार्य करना गलत है। हमें शहरीकरण में इस बात का तो ध्यान देना ही चाहिए कि कम से कम हम अपने छत पर गिरने वाले बारिश के पानी को समुचित ढंग से पुन: पृथ्वी के भीतर पहुंचाने का प्रबंध करें। उन्होंने दुख जताया कि इस शहरीकरण में यदि थोड़ी सी भारी बारिश हो जाती है तो जल जमाव हो जाता है। लोग सरकार को काेसने लगते हैं।
हम निरोग रहें, इसकी व्यवस्था तो हमें खुद करना चाहिए
उन्होंने सवाल किया कि अपने घर के जल के संचयन की हम व्यवस्था नहीं कर सकते और दूसरों पर दोष मढ़ देते हैं। हम निरोग रहें, इसके लिए जागरूक नहीं सकते और कह देते हैं कि सरकारी अव्यवस्था के कारण मौत हाे गयी। आखिर हमें भी तो अपने कर्तव्यों के निर्वहन पर ध्यान देना होगा। यदि इस पर खुद ध्यान देते हुए दूसरों को इसके प्रति जागरूक नहीं करेंगे तो यह कार्य सिर्फ सरकार के बस की बात नहीं है।
उन्होंने कहा कि मिशन, “कल के लिए जल”अभियान का फोकस रहा है कि कुल वर्षा की मात्रा बढ़ाने के लिए हरित आवरण और जलावरण बढ़ाया जाए। साथ में ही वर्षा के जल को यथा स्थान रोकने की कोशिश की जाए और वहीं उपलब्ध जल संसाधन का मितव्ययी उपयोग किया जाए, जिसमें टपक और फव्वारा सिंचाई प्रणालियों का उपयोग शामिल हो।
बरगद, गूलर जैसे पौधों के रोपण को देना होगा बढ़ावा
उन्होंने कहा कि हरित आवरण बढ़ाने के लिए विशाल कनोपी वाले दीर्घायु स्थानीय जलवायु के लिए अनुकूल पौध प्रजातियों का रोपण किया जाए। इसमें अष्ट वृक्षारोपण अभियान में शामिल पीपल पाकड़ बरगद गूलर आम नीम इमली महुआ पर विशेष बल दिया जाए। सतही जल स्रोतों यथा नदियां,झीलें,तालाब, नालों व जलमग्न भूमि के अंतर्गत आच्छादित क्षेत्रफल को आरक्षित जल क्षेत्र घोषित करते हुए जलावरण क्षेत्र को संरक्षित करते हुए विस्तार किया जाना चाहिए।
वर्षा ऋतु में नहीं सहेजते पानी, ग्रीष्म काल में आती याद
उन्होंने कहा कि बारिश में पानी की बूंदे जब अमृत के रूप में धरती पर टपक रही होती हैं, तब हम प्राय: सो रहे होते हैं और जब ग्रीष्म काल आता है तब मुझे बारिश के पानी की याद आती हैं। पानी की बूंदों को जहां टपक रही है। वहीं रोकने की जरूरत है, जिससे जल संसाधन का न्यायपूर्ण वितरण एवं भंडारण का रास्ता साफ होगा।







