आस्था के आयाम: (सच्ची घटना)
बात 3 अप्रैल 2021 की है। मैं अपने मित्र सुशील जी व लखनऊ पधारे नंदन के पूर्व सम्पादक अनिल जायसवाल जी से मिलने लखनऊ गया था। वापसी में देर हो गयी।
रात 10बजे आलमबाग बस अड्डे से प्रयागराज के लिये एक वातानुकूलित बस मिली। बैठ गया। शहर से बाहर निकलते ही टिकट बना रहे कन्डक्टर को एक बुजुर्ग से बहस करते सुना – “माफ कीजिये, दादाजी! मैं बिना पूरे पैसे का टिकट दिये आपको प्रयागराज तक नही ले जा सकता। रास्ते में बस कहीं चेक हो गयी तो मेरी नौकरी खतरे में पड़ जायेगी।”
बुजुर्ग की जाने क्या मजबूरी थी। हाथ में एक सौ रुपये का नोट लिये, हाथ जोड़े बार- बार कन्डक्टर से गिड़गिड़ा रहे थे। अब मुझे मामला समझ आया। कुछ लोग भुनभुना रहे थे-“अजीब आदमी है। पैसा नहीं था तो बस में चढ़ा ही क्यो?”
कोई कह रहा था -“ऐसे लोगों को तो बीच रास्ते अन्धेरे में ही उतार कर भगा देना चाहिये, तभी सबक मिलेगा। खाला जी का घर समझ रखा है।”
कुछ लोग बुजुर्ग की स्थिति पर अफसोस भी कर रहे थे-“अरे चलने दो, बेचारा कहाँ जायेगा इतनी रात में?”
लेकिन कन्डक्टर अलग परेशान था। मना कर दे रहा था।
मैने उस बुजुर्ग की मदद करने को सोचा। अपनी जेब टटोली, हिसाब लगाया- “हो जायेगा आराम से”। मैने थोड़ा टाईट हो रही जींस की पैंट में हाथ डाला और पैसे निकालने का प्रयास करने लगा।
तभी उस बुजुर्ग से दो सीट पीछे बैठे और गाना सुनने में मशगूल एक व्यक्ति ने कानों से अपना ईयर फोन हटाया और जोर से पूछा – ” क्या बात है कन्डक्टर बाबू? दादा क्यो हाथ जोड़ रहे है?”
कन्डक्टर ने बताया- ” ये प्रयागराज जायेंगे, लेकिन पास में केवल सौ रुपये है। टिकट में 288/- कम हैं। मैं क्या करुँ?”
उस युवक ने बिना एक पल गंवाये या कुछ और पूछे, फटाक से जेब में हाथ डाला, दो-दो सौ के दो नोट उसके हाथ में आये और उसने कन्डक्टर की ओर बढ़ा दिया- “लो हो जायेगा।”
कन्डक्टर ने आश्चर्य से देखा, खुशी से टिकट बनाकर बुजुर्ग को पकड़ा दिया । फिर वापसी के 112/- युवक को वापस करने लगा। युवक ने इशारे से कहा कि उसी बुजुर्ग को दे दो । कन्डक्टर ने उसके भी सौ के नोट समेत सारी रकम बुजुर्ग को पकड़ा दिया।
यह देख सारे लोग अचानक से शान्त हो चुके थे। सबकी बोलती बन्द थी। मेरा जेब से नोट लेकर बाहर निकलता हाथ जहाँ का तहाँ रुक गया था। मैने देर लगा दी थी। उधर वह दरियादिल युवक फिर से कानों में ईयर फोन लगाकर गाने सुनने में मस्त हो चुका था। जैसे कुछ हुआ ही न हो।
एक हाथ के परोपकार की खबर दूसरे को भी नहीं हुई थी। -अरविन्द कुमार साहू (मोबाइल-7007190413)







