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    Home»ब्लॉग»Hot issue

    चांदी की थाली भी खाली होगी, अगर किसान न होंगे…

    By June 15, 2017Updated:June 16, 2017 Hot issue No Comments4 Mins Read
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    hanging farmer
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    ⁠अजीत ठाकुर 
    कुछ साल पहले टीवी पर एक विज्ञापन आता था, जिसमें एक किसान गर्व से कहता है कि ‘चांदी की थाली भी खाली होती अगर मैं किसान न होता’. यह ऐसा सच है जिस पर शक की कोई गुंजाइश ही नहीं है. लेकिन हालिया वक्त में यह गर्व खतरे में हैं. कर्ज का अजगर धीरे-धीरे किसानों की जिंदगियां निगल रहा है. ⁠⁠⁠खुद सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में बताया है कि देश में हर साल 12 हजार किसान आत्महत्या कर रहे हैं..12000 यानि ठीक-ठाक आबादी वाले 6 गाँवों के बराबर.. मतलब हर साल 12 हजार परिवार ऐसे होते हैं जो अपना मुखिया खो देते हैं.
        देश में होने वाली कुल आत्महत्याओं में 10 फीसदी से थोड़ा ही कम हिस्सा किसानों का है. 2015 में सबसे ज्यादा 4,291 किसानों ने महाराष्ट्र में आत्महत्या की. यह वही प्रदेश है जो सबसे ज्यादा राजस्व देता है, सबसे ज्यादा विकसित होने का दावा करता है. 1,569 आत्महत्याओं के साथ कर्नाटक दूसरे नंबर पर है. इसके बाद तेलंगाना (1400) है जिसके मुख्यमंत्री बिहार तक के अख़बारों में अपने विज्ञापन देकर बताते हैं कि उन्होंने किसानों के लिए कौन सी योजनाएं चला रखी हैं. इसके बाद किसान पुत्र मुख्यमंत्री का मध्य प्रदेश (1,290) और चाउर वाले बाबा का छत्तीसगढ़ (954) है. दोनों अगर पहले की तरह एक प्रदेश होते तो किसानों की ख़ुदकुशी के मामले में नंबर 2 पर होते.
        इन स्याह आंकड़ों पर कैसे यकीन किया जाए. जो किसान अपनी फसल के लिए कुदरत की मार भी झेल जाता है वह कैसे कमजोर हो गया. इसकी वजह बस इतनी है कि भारी भरकम कर्ज और उसे न चुका पाने का अंदेशा उसे कमजोर कर देता है. इससे निजात पाने के लिए ही वह अपनी जटिल हो चुकी जिंदगी खत्म कर लेता है.
    ⁠   ऐसे बुरे दौर में सवाल सरकारों से होने चाहिए कि हालात ऐसे क्यों बने कि किसान खुद को ख़त्म करने लगे. उन्हें राहत के नाम पर कर्ज नाम की एक और मुसीबत क्यों थमा दी गई. एक बार कर्ज चढ़ा फिर उतारना मुश्किल है क्योंकि कभी-कभी तो फसलें अपनी लागत भी नहीं निकाल पातीं. सरकार अब खेती को लाभ का धंधा बनाने पर तुली है. क्या खेती धंधा है, कभी नहीं.. ये तो एक जीवनशैली है.. फिर खेती को धंधा साबित करने की कोशिशें क्यों हो रही हैं.
        एक सवाल समाज से भी हो, दूध की कीमत 2 रुपये बढ़ने पर लोग प्रधानमंत्री तक को कोस लेते हैं.. लेकिन डीएपी की बोरी देखते ही देखते 500 से 1250 रूपये कर दी गई, उन्हें खबर भी हुई. पेट्रोल महंगा होने पर हल्ला मचाने वालों को पता है या नहीं कि धनवानों की कार के नाम पर डीजल से सब्सिडी हटा ली गई. इससे कुएं से खेती करने वालों की सिंचाई लागत दो गुनी तक बढ़ गई लेकिन किसी का गुस्सा क्यों नहीं उबला..
    ⁠⁠⁠⁠    सवाल किसान संगठनों से भी होने चाहिए. आखिर किसानों के नाम पर चल रहे ये संगठन कर्मचारी यूनियनों की तरह प्रभावी क्यों नहीं बन पाए.. इन संगठनों में किसानों के लिए कुछ है भी या ये महज सियासत में भविष्य तलाश रहे कुछ महत्वकांक्षी लोगों का जमावड़ा भर है. ऐसे लोग जो किसानों को अपना कार्यकर्ता बनाने की जुगत में लगे हैं और सांसद-विधायक के साथ मंच पर बैठ जाने को जीवन की उपलब्धि मान लेते हैं.
    ⁠⁠⁠⁠⁠बीते दो दिन में मध्य प्रदेश में 6 किसानों ने आत्महत्या कर ली.
       हालात बहुत ख़राब हैं. इसलिए जरूरत है कि किसानों की देखरेख किसी गर्भवती महिला की तरह की जाये.. वह अपना दर्द तो खुद झेल लेगा लेकिन समाज और सियासत भी जाहिर करे कि उसे किसानों की फ़िक्र है.. ⁠⁠⁠ये कोशिशें महज दिखावा न हों. वर्ना महाराष्ट्र के एक बड़े नेता की कहानी खूब मशहूर है. जिसने किसानों से कपास के दाम बढ़वाने का वादा कर मसीहा की छवि भी बना ली और दूसरे दरवाजे से विदेशी कंपनियों के लिए कपड़ा मिलों में सस्ता कपास बेचने का रास्ता भी तैयार कर दिया था. आखिर ठगे से किसान मिन्नतें कर अपनी फसल को पुरानी कीमत पर बेच पाए.
    अगर किसान इसी तरह ख़त्म होते रहे तो इसका सबसे बड़ा असर हमारी थाली पर होगा.. यहाँ फिर सारी चिंताएं इसी बात पर आकर टिक जाती हैं चांदी की थाली भी खाली रहेगी अगर किसान नहीं होंगे.
    ⁠⁠⁠⁠
    (तस्वीर में फंदे से लटके शख्स का आज के अखवारों में परिचय  ‘भैरोपुर के एक किसान माखनलाल दिगोदिया’ है. मेरे लिए माखन चाचा. पिछली भेंट में इनसे बात तो नहीं हुई लेकिन मुस्कुराहट की साझेदारी हुई थी, तब अहसास नहीं था इस मुस्कुराहट के पीछे कितना बोझ है. आज वही बोझ अखवारों में मनहूस खबर बनकर छपा है। वजह वही है – कभी ख़त्म न होने वाला कर्ज)

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