राह
जो मुझे प्रेम करेंगे
मेरे दर वे आएंगे
मुझे चौराहे पर क्यों बुलाएंगे
जाऊंगी पीऊ के नगर
तो क्यों न जाऊँगी उनके घर
गली गली शहर शहर
जाऊँगी
मिलने जाऊँगी भटक – भटक कर
प्रेम में जो पड़ूूँगी
क्यों भला किसी से डरूँगी
रोकेंगे राह मेरी शाह
तो क्या बदल दूँगी चाह
उसी राह चलूँगी
ज़माने के कहने से तो नहीं बदलूँगी
चलती चली जाऊँगी
जो घर से निकलूँगी
किसी के रोके नहीं रुकूँगी!
– हरे प्रकाश उपाध्याय







