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    हाथ नहीं छोड़ा, साँसें भी नहीं छोड़ीं: पीलीभीत में इंसानियत की वो मिसाल जो आँखें नम कर देती है

    ShagunBy ShagunNovember 29, 2025Updated:November 29, 2025 ज़रा हटके No Comments3 Mins Read
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    He didn't let go, he didn't even breathe: A tear-jerking example of humanity in Pilibhit
    हाथ नहीं छोड़ा, साँसें भी नहीं छोड़ीं: पीलीभीत में इंसानियत की वो मिसाल जो आँखें नम कर देती है
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    जब डूबते शुभम का हाथ थामा फैसल ने, और दिनेश ने थामी इंसानियत की डोर… पीलीभीत में बची एक जान, जगी सैकड़ों की उम्मीद

    पीलीभीत, 29 नवंबर। टनकपुर हाईवे पर गौहनिया चौराहे के पास उस शाम सन्नाटा नहीं, सिर्फ़ दिल की धड़कनें थीं। एक सफ़ेद कार अचानक सड़क से फिसली और गहरे तालाब में समा गई। पानी के बुलबुले उठे, फिर ख़ामोशी। कार के भीतर 26 साल का शुभम था. सीट बेल्ट में फंसा, शीशा बंद, और हर गुज़रता सेकंड उसकी ज़िंदगी निगलता जा रहा था।

    किनारे पर सैकड़ों लोग खड़े थे। कोई चिल्ला रहा था, कोई वीडियो बना रहा था, कोई हाथ जोड़कर दुआ माँग रहा था , लेकिन कोई पानी में नहीं उतरा।

    He didn't let go, he didn't even breathe: A tear-jerking example of humanity in Pilibhit
    डूबता रहा शुभम लेकिन फैसल ने नही छोड़ा हाथ

    तालाब के दूसरे छोर पर फैसल अहमद (32) अपनी पुरानी नाव में बैठा मछली डाल रहा था।
    उसने दूर से आवाज़ सुनी, कार को डूबते देखा, और बिना एक पल गँवाए नाव खेने लगा।
    लोग चिल्लाए, “फैसल, मत जा… पानी बहुत गहरा है!”
    पर फैसल ने सिर्फ़ इतना कहा, “किसी को तो तो जाना पड़ेगा ना…”नाव जब कार तक पहुँची, तब तक कार का सिर्फ़ छत का किनारा दिख रहा था।
    फैसल ने शीशा तोड़ा, शुभम का हाथ पकड़ा और खींचने लगा।

    शुभम की आँखों में डर था, पर फैसल की आँखों में सिर्फ़ एक ज़िद- “आज इसे छोड़ूँगा नहीं।”अचानक कार ने आख़िरी झटका दिया और पूरी तरह डूब गई।
    लहर उठी, नाव पलट गई। अब फैसल भी पानी में था लेकिन उसने शुभम का हाथ नहीं छोड़ा।
    दोनों डूब रहे थे, पर फैसल बार-बार ऊपर आता और शुभम को अपनी छाती से चिपकाकर साँस देने की कोशिश करता।

    He didn't let go, he didn't even breathe: A tear-jerking example of humanity in Pilibhit
    हाथ नहीं छोड़ा, साँसें भी नहीं छोड़ीं: पीलीभीत में इंसानियत की वो मिसाल जो आँखें नम कर देती है

    तभी हाईवे पर ट्रक ड्राइवर दिनेश कुमार (पीलीभीत) ने ब्रेक मारे।
    बिना शर्ट उतारे, बिना जूते खोले, वो दौड़ते हुए तालाब में कूद पड़े।
    दिनेश ने फैसल का कंधा पकड़ा और बोले, “अब मैं हूँ भाई, छोड़ना मत।”
    दोनों ने मिलकर शुभम को खींचा। तीसरी कोशिश में शुभम का सिर पानी के ऊपर आया।
    शुभम ने पहली साँस ली और रो पड़ा। फैसल भी रो पड़ा। दिनेश बस मुस्कुरा रहे थे- आँखें लाल, हाथ काँप रहे थे।

    https://x.com/i/status/1994598213572333913

    किनारे पर पहुँचते ही भीड़ तालियाँ बजाने लगी।
    किसी ने फैसल को गले लगाया, किसी ने दिनेश के पैर छुए।
    शुभम अभी भी सदमे में था। उसने फैसल का हाथ पकड़कर सिर्फ़ इतना कहा,
    “तुमने मुझे मरने नहीं दिया… तुम मेरे भाई हो।” फैसल ने शरमाते हुए कहा, “भाई तो सब होते हैं… बस मौक़ा चाहिए था साबित करने का।” शुभम के पिता शैलेश वर्मा वहाँ पहुँचे तो फैसल और दिनेश के पैरों पर गिर पड़े।
    उन्होंने कहा, “मेरे बेटे को दोबारा जन्म देने वालों को सरकार सम्मान दे या न दे, मैं तो ज़िंदगी भर इनका ऋणी रहूँगा।”

    अभिनव त्रिपाठी ने लिखा ऐसे लोग हैं जो इंसानित के नाम पर अपनी जान कुर्बान करने में लग जाते हैं, इनके हौसले को सलाम, वो कहते हैं न कि आप किसी के साथ अच्छा करेंगे तो आपके साथ भी अच्छा होगा।

    आज पीलीभीत की सड़कें इस कहानी को दोहरा रही हैं –
    न जात पूछी गई, न मज़हब देखा गया।
    बस एक हाथ ने दूसरे हाथ को थामा, और इंसानियत ने फिर साबित कर दिया कि वो अभी ज़िंदा है।

    फैसल आज भी उसी तालाब किनारे मछली मारने जाता है।
    बस अब उसकी नाव में एक अतिरिक्त रस्सी रहती है –
    कहता है, “कभी फिर किसी का हाथ थामना पड़े तो देर न हो जाए…”

    Shagun

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