लखनऊ की चर्चा हो और यहां गली-मुहल्लों, चौक-चौराहों पर जगमगाते ईसाई- आस्था- केन्द्र (गिरजाघरों)- चर्चों की चर्चा न हो, ऐसा भला कैसे सम्भव है। अपने देश की जो बुनियादी विरासत है, ताकत है, एकता में अनेकता… इसी सूत्र वाक्य की मजबूत कड़ी हैं यहां के गिरजाघर जिन्हें हम सम्मान से चर्च के नाम से भी पुकारते हैं। हिन्दू-मुस्लिम सिक्ख-ईसाई का नारा जग-विदित है, सब की जुबान पर रहता है जो हमारी साझा सांस्कृति को शक्ति प्रदान करता है। पूरे देश की तरह अपने लखनऊ ने भी हमेशा से इस मिली-जुली संस्कृति को न सिर्फ सराहा है बल्कि उसका पोषण भी किया है, जिसका सटीक उदाहरण हैं यहां के चर्चित चर्च …. सेन्ट थामस चर्च, ऐपीफेनी चर्च, सेन्ट जोजफ़ कैथीड्रल, डालीगंज मैथोडिस्ट चर्च, सेन्ट पीसर्ट चर्च इत्यादि-
लखनऊ के चर्च अपने आप में एक वृहद् इतिहास छिपाए हैं, यहां के गिरजाघरों की कहानी लोगों में कई बार उत्सुकता प्रदान करती रही है, मगर आज की युवा पीढ़ी आधुनिकता की दौड़ के चलते आस्था के इस पुनीत इतिहास के बारे में जानने को लेकर उदासीन दिखायी देती है। यहां के चर्चों की चर्चा के क्रम में यों तो कई चर्च समय की धुन्ध में विलीन हो चुके हैं। किन्तु आज भी कई ऐसे चर्च हैं जो लखनऊ की महानता और अपनी गौरव-गाथा कहते नजर आते हैं। लखनऊ के इतिहास में दिलचस्पी रखने वालों से जानने-समझने एवं अध्ययन से जो बातें सामने आयीं उसके आलोक में आइये चर्चा करते हैं यहां के कुछ महत्वपूर्ण गिरजाघरों की…
सेन्ट जोजफ़ कैथीड्रल
1857 के बाद जब गदर की समाप्ति हुई तो आयरलैंड निवासी फादर विलियस ग्लीसन को आगरा से लखनऊ भेजा गया। ग्लीसन ने लखनऊ में जब इस दिशा में कदम बढ़ाया तो सर्वप्रथम कैथोलिन मिशन की पुरानी जमीन को बेचकर कुछ पैसे एकत्रित किये, कुछ सरकार से सहायता ली तथा कुछ जनता से सहयोग लेकर हजरतगंज में 1860 में एक चर्च का निर्माण कराया, जिसे सन्त जोजफ़ के नाम पर समर्पित किया, जिसके कारण इसका नाम सेन्ट जोजफ़ चर्च पड़ा। बताते हैं इसे कई बार, कई कारणों से गिराया-बनाया गया। पहली बार 1863 में गिराया गया, वर्ष 1868 में पुन: नये चर्च का निर्माण हुआ। 12 जुलाई 1868 को मैक्स पाल तोशी द्वारा समर्पित किया गया। इसमें कई वर्षों तक प्रार्थना-सभाएं होती रहीं।
1916 में सेंन्ट जोजफ़ नाम से स्कूल की स्थापना की गयी। सौ वर्ष पूरे होने पर 1968 में इसे पुन: गिराया गया उसके स्थान पर वर्तमान जोजफ़ कैथेड्रिल चर्च का निर्माण किया गया जो मेफेयर सिनेमा केसामने हजरतगंज में आज भी स्थित है। चूंकि विशप का आवास व कार्यालय होने के कारण इसे कैथेड्रिल कहा जाता है। इसकी नींव 19 अप्रैल 1970 को लखनऊ के कैथोलिक विशप राइट रेव. डॉ. अलबर्ट दी कानरेड डी. वीटो द्वारा रखी गयी थी और निर्माण कार्य १९७७ में पूरा हुआ था। इसकी लम्बाई 40 मीटर तथा चौड़ाई 30 मीटर है। चर्च का प्रांगण काफी विशाल है जिसमें पहले से ही में कैथेड्रिल नाम से एक हाईस्कूल विद्यालय भी चल रहा है।
सेन्ट थामस चर्च
सेन्ट थामस चर्च को लोग दिलकुशा चर्च के नाम से भी जानते हैं यह कैन्टोमेंट क्षेत्र में नेहरू रोड पर स्थित है। इसका निर्माण वर्ष 1908 बताया जाता है। ब्रिटेन की मैथोडिस्ट मिशनरी, सोसायटी द्वारा इसका निर्माण कराया गया था। इसका अहाता काफी बड़ा है।
एक अनुमान के मुताबिक करीब 250 लोग यहां प्रार्थना में आते हैं, सत्तर के दशक में आयी फिल्म जुनून के कई दृश्य यहां फिल्माये गये थे। सत्तर के दशक में यह गिरजाघर खंडहर-सा था, कहते हैं फिल्मकार श्याम बेनेगल ने अपने खर्च से इसकी मरम्मत करायी थी।
वेसलियन चर्च

विशेश्वर मार्ग पर इस्लामिया कॉलेज के पास स्थित वेसलियन चर्च लाल रंग से रंगा हुआ है, इसकी स्थापना 1932 में अंग्रेजी शासन काल में हुई थी। मूलत: यह एक वेसिलयन चर्च है, इसे ब्रिटिश चर्च के नाम से भी पुकारा जाता है। 1970 में जब अनेक चर्च सी.एन.आई. (चर्च ऑफ नार्थ इंडिया) में सम्मिलित हो गये थे तब यह चर्च भी एक घटक के रूप में सी.एन.आई. चर्च संगठन में समाहित हो गया और सी.एन.आई. की लखनऊ की डायसिस के अन्तर्गत कार्य करने लगा, जिसका विशप कार्यालय इलाहाबाद में स्थित है। इस चर्च में वहीं से पादरियों की नियुक्तियां होने लगीं। एक समय में पादरी सिसिल सिंह जो सी.एन.आई चर्च के डीन भी रहे, इस चर्च की दुवाओं में अग्रणी भूमिका निभाते रहे। उसके बाद पादरी दास इस गिरजाघर के पादरी बने, पर उन्होंने अपने को हमेशा आजाद माना क्योंकि चर्च की सम्पत्ति पर आज भी सी.एन.आई. का शीर्षक न होकर ब्रिटिश एशोसियेशन ट्रस्ट का ही नाम है।
सेवेन्थ डे एडवेन्टिस्ट
लखनऊ आकाशवाणी के सामने विधान सभा मार्ग पर सेवेन्थ डे एडवेंटिस्ट चर्च स्थित है। 1938 में पादरी कोन्ले के हाथों इसका लोकार्पण हुआ था। यह चर्च शनिवार को सबथ (बिश्रामवार) का दिन मानता है, इसी दिन मुख्य प्रार्थना सभा भी यहां आयोजित होती है। इसी कारण कई लोग इस चर्च को शनीचर मिशन चर्च कहकर भी सम्बोधित करते हैं। १९३८ में इसका निर्माण हुआ था, इसके काफी पहले 1915 में इसी नाम से सेवेन्थ डे सीनियर सेकेंडरी स्कूल स्थापित हो चुका था। यह चर्च 1988 में 50 वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष में स्वर्ण जयन्ती भी मना चुका है।
सेंट फिडलिस चर्च:
सेन्ट फिडलिस चर्च विकास नगर डंडइया बाजार के पास स्थित है। लखनऊ में अपना विशेष स्थान रखने वाला यह एक कैथोलिक चर्च है। इसकी स्थापना 1960 में हुई थी। ध्यान देने योग्य बात ये है कि इससे 100 वर्ष पूर्व कैथोलिकों द्वारा लखनऊ में सेंट जोजफ़ चर्च स्थापित किया जा चुका था। सेंट फिडलिस चर्च के साथ ही इसी नाम से स्कूल भी संचालित हो रहा है। लखनऊ में गोमती नदी पार स्थापित यह प्रथम कैथोलिक चर्च है।
सर्वधर्म सम्भाव की नींव मजबूत करने में अपनी अहम् भूमिका निभाने वाले लखनऊ स्थित इन चर्चों के अतिरिक्त भी बहुत से ऐसे चर्च हैं जिनका जिक्र यहां स्थानाभाव के कारण सम्भव नहीं हो सका। इनमें मुख्य रूप से… ऑल सेन्ट्स न्यू गैरिसन चर्च, क्राइस्ट चर्च (हजरतगंज), गणेशगंज कैथोडिस्ट चर्च, डालीगंज कैथोडिस्ट चर्च, एपीफेनी चर्च, सेन्ट पीटर्स चर्च, दुआ का घर, इंडियन नेशनल चर्च, सेन्ट फ्रांसिस असीसी चर्च, एसेम्बली ऑफ बिलीवर्स चर्च, मसीही मंदिर, सेंट जॉन बियनी चर्च, होली फेमिली चर्च, गुड शेपर्ड चर्च (गोसाई गंज), सेन्ट फ्रांसिस जेवियर्स चर्च इत्यादि। लखनऊ के विभिन्न क्षेत्रों में स्थित ये चर्च अपनी उपस्थिति से ईसाई समुदाय के साथ-साथ अन्य जाति-सम्प्रदाय के लोगों में भी आस्था और विश्वास की ज्योति जला रहे हैं।
लखनऊ के वे चर्च जो विलुप्त हुए
सेंट मेरीज चर्च (रेजीडेंसी) लखनऊ के पहले चर्च का निर्माण 1810 में अंग्रेजों द्वारा कराया गया था। यह चर्च बेलीगारद (रेजीडेंसी) में स्थित था, इसे सेंट मेरी चर्च नाम दिया गया। 1847 की क्रान्ति के चलते यह भयंकर तरीके से क्षतिग्रस्त हुआ था, अपने आप में लखनऊ के इतिहास का महत्पूर्ण हिस्सा छिपाये सेंट मेरीज चर्च अब खंडहर में तब्दील है। ब्रिटिश लेखकों में मिस सिडनी हे तथा फिलिप डेविस ने रेजीडेंसी में सेंट मेरीज चर्च होने की पुष्टि की है।
सेंट मेरीज़ चैपल (पादरी टोला) गोलागंज
फादर अडियोडेट्स ने पादरी टोला, गोलागंज में एक सुन्दर चर्च का निर्माण 1824-25 में कराया था। उसे मरियम माता के नाम पर सेन्ट मैरीज चर्च नाम दिया था। १८५७ की क्रंाति में यहां भी तबाही हुई और सब मिट गया।
लखनऊ यूनाइडेट चर्च, कैम्पवेल रोड
1862 में वैसलियन मिशन लखनऊ की स्थापना हुई। कुछ वर्षों बाद 8 जनवरी 1868 को पादरी होम, हैरिस, डरहम मिलर तथा मैथर्स हैबलक स्ट्रीट पर एकत्रित हुए तथा योजना बनाकर 1870 में एक गिरजाघर बनाकर तैयार किया। वर्षों बाद 1877 में इसे बेचने की स्थिति बनी और तत्कालीन परिस्थितियों के चलते बाद में इसे ढहा दिया गया।
सेंट मंगूस चर्च, कैंट:
लखनऊ छावनी में सेंट मंगूस चर्च के निर्माण की शुरुआत १९०८ को हुई थी बाद में १९११ में बनकर तैयार यह चर्च आज अतीत की बात है। इस चर्च का निर्माण स्कॉटलैंड प्रेस बिटेरियन मिशन द्वारा लखनऊ में हुआ था। कालातीत में यह चर्च आर्मी के कब्जे में आया, हालांकि इमारत तो आज भी है मगर आर्मी अपनी सुविधानुसार इसका उपयोग करती है। जो एक प्रकार से विलुप्तप्राय ही है।
इसी तरह मडियांव छावनी गिरजाघर हो या सआदत गंज मेथेडिस्ट चर्च के नाम से मशहूर गिरजाघर आज समय की धुंध में खो चुके हैं जिसके अपने-अपने कारण हैं, इसके विस्तार की चर्चा एक शोध का विषय भी हो सकता है।
लखनऊ और ईसाई धर्म:
लखनऊ में ईसाई धर्म की स्थापना को लेकर वैसे तो जानकारों का अपना-अपना मत है, बावजूद इसके शैवेलियर आस्टिल मैलकम लोबों के कथनानुसार… मसीह धर्म इटली से चलकर तिब्बत और नेपाल के रास्ते लखनऊ में आया। श्री लोबो ने अपनी पुस्तक ग्रोथ एवं डेवलपेंट ऑफ दि कैथलिक डायसिस ऑफ लखनऊ में इस आशय का उल्लेख किया है कि १७०३ में सेक्रेट कांग्रीगेशन ऑफ प्रोपोगेशन कमीशन इटली ने कापूचिन ऑफ अनकाना को ईसाई धर्म के प्रचार हेतु तिब्बत भेजा जिसमें फादर फ्र ांसिस ओराजियो का नाम विशेष उल्लेखनीय है। इन्हीं के नाम से लखनऊ में हजरतगंज-स्थित सेंट फ्रांसिस स्कूल जाना जाता है। कहते हैं फादर फ्रांसिस अपने साथियों के साथ इटली से तिब्बत पहुंचे वहां की गतिविधियों के बाद उन्हें 1745 में तिब्बत छोडऩा पड़ा। इसके बाद इन्होंने नेपाल का रुख़ किया। नेपाल के काठमांडू शहर में ईसाई मिशनरियों ने मुख्यालय स्थापित किया और अपने प्रचार-प्रसार में जुटे। नेपाल में इन लोगों के विरोधी स्वर उभरने लगे जिसके चलते 1769 में नेपाल छोडऩा पड़ा।
नेपाल के बाद इन कैथेलिक मिशनरियों ने भारत में बिहार के बेतिया शहर में प्रवेश किया फिर पटना होते हुए इलाहाबाद और इलाहाबद से फैजाबाद आ गये। इसके बाद लखनऊ में इनका आगमन हुआ। इसी दौरान एक दिलचस्प घटना घटी…. कहते हैं कई जगह से भ्रमण करते हुए फादर जोजफ़ ऑफ बरनीनी एक कपूचिन पादरी फैजाबाद से लखनऊ पहुंचे। उस समय अवध के नवाब शुजाउद्दौला थे जिनकी खास बेगम उम्मद-उल-जौहर (जो बहू-बेगम के नाम से भी विख्यात थीं) कालबंकर फोड़े से पीडि़त थीं तमाम प्रयास के बाद भी उनकी हालत में सुधार नहीं हो रहा था, बहुश्रुत घटना पर विश्वास करें तो…. फादर जोजफ़ का नाम किसी ने नवाब को सुझाया तो नवाब शुजाउद्दौला ने बेगम के इलाज की अनुमति दे दी।
फादर की कोशिशों से उनके इलाज से बेगम ठीक हो गयीं थीं। खुश होकर नवाब ने फादर जोजफ़ को इनाम देने की पेशकश भी तो फादर जोजफ़ ने धन-दौलत के बजाए बीस बीघा जमीन ले ली। फादर जोजफ़ अपने साथियों के साथ यहीं पर बसेरा करने लगे। यहीं पर धीरे-धीरे एक क्रिश्चियन कॉलोनी का निर्माण किया जिसे लोग पादरी टोला के नाम से भी जानते हैं। कहा जाता है गोला गंज के आसपास ही पादरी टोला हुआ करता था, जहां का क्रिश्चियन कॉलेज आज भी बहूत मशहूर है। विभिन्न स्रोतों से जानकारी करने पर एक बात और सामने आयी क्रिश्चियन मिशन कार्य के लिये विशप अन्टोनिन ये जनी ऑफ लूगो ने वर्ष 1815 से 1824 के बीच दो बार जमीनें खरीदी जिस पर उन्होंने 1825 में एक विधिवत मिशन स्टेशन की स्थापना की। ईसाइयों द्वारा लखनऊ में बनाया गया यह पहला स्टेशन था।
-कमल किशोर भावुक








