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    Home»राजस्थान

    गहलोत-पायलट में मोहब्बत की मिठास कब तक

    ShagunBy ShagunJune 12, 2025 राजस्थान No Comments7 Mins Read
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    दुश्मनी की हद तक गुटों में बंटे अपने समर्थकों को कैसे करेंगे एकजुट

    ओम माथुर

    राजस्थान की राजनीति में बुधवार का दिन हर किसी को अचरज में डालने वाला था। कांग्रेस के दो दिग्गज नेताओं अशोक गहलोत और सचिन पायलट की भाषा और बातचीत के अंदाज में जो बदलाव आया,वह न सिर्फ कांग्रेस के कार्यकर्ताओं,बल्कि भाजपा नेताओं-कार्यकर्ताओं और आम लोगों को भी हैरान कर गया। जिन सचिन पायलट को कभी गहलोत ने नाकारा, निकम्मा और गद्दार कहा था,उनसे गहलोत को अचानक मौहब्बत हो गई।

    छह साल से पायलट से छत्तीस का आंकड़ा रखने वाले गहलोत ने कल कहा मैं और सचिन पायलट अलग-अलग कब थे। हम तो हमेशा से साथ हैं। दोनों में खूब मौहब्बत भी है। यह तो मीडिया हमारे बीच अनबन की खबरें चलाता है। यानी अशोक गहलोत जिसे मौहब्बत करते हैं,उसे वह नाकारा और निकम्मा मानते हैं। लेकिन पायलट से पहले उन्होंने ऐसी अनूठी मौहब्बत राजस्थान के किसी दूसरे कांग्रेसी नेता से नहीं की। यूं गहलोत ने राज्य में अपने से कई वरिष्ठ और समकक्ष नेताओं को समय-समय पर ठिकाने लगाया है और सत्ता में उनका हक भी मारा है। लेकिन इस तरह खुलकर मौहब्बत का इजहार किसी के लिए नहीं किया। सबको राजनीतिक चौसर पर अपनी चालों और गांधी परिवार से अपने करीबी संबंधों का शिकार बनाया। लेकिन पायलट को निपटाने के लिए वो अपनी शब्दावली ओर गांधीवादी आचरण को न्यूनतम स्तर पर ले आए और हर तरह से कोशिश की कि पायलट कांग्रेस के आसमान पर उड़ान ना भर सकें। लेकिन नाकाम रहे। पायलट बगावत के बाद भी फिर अपने कदम मजबूत करने में कामयाब रहे।

    7 जून को जब सचिन पायलट अपने पिता स्वर्गीय राजेश पायलट की 25वीं पुण्यतिथि पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम के लिए गहलोत को आमंत्रण देने उनके घर गए थे ,तभी से सोशल मीडिया पर गहलोत के वो वीडियो वायरल हो रहे हैं। जिसमें वह पायलट को मौहब्बत के शब्दों से नवाजते हुए हैं और कह रहे हैं कि वो राजनीति में बैंगन बेचने के लिए नहीं आए हैं। अब इन रिकार्डेड बयानों के बाद भी अगर वह अपने और पायलट में मतभेदों का ठीकरा मीडिया पर फोड़ते हैं,तो इससे वह अपनी ही विश्वसनीयता और राजनीतिक मजबूरी को बताते हैं।

    पायलट ने भी गहलोत के मौहब्बत वाले बयान के बाद प्रतिक्रिया देते हुए कहा कि वह सब पुरानी बातें हो गई है। अगर कोई मतभेद होता है,तो बैठकर सुलझा लिया जाता है। गहलोत के पुराने बयानों पर कहा की रात गई, सो बात गई। किसने क्या कहा, यह अतीत का हिस्सा है। बीता समय वापस नहीं आता। हमें भविष्य को देखना है। तो,क्या यह है माना जाए कि गहलोत और पायलट के बीच मतभेद खत्म हो गए हैं और दोनों राजस्थान में कांग्रेस को जमाने के लिए साथ काम करेंगे? क्या दोनों के बयान राजस्थान में निचले स्तर तक गुटों में बंटी पार्टी के कार्यकर्ताओं को फिर एकजुट कर देंगे? क्या इस बयानबाजी और समझौते की राजनीति में दोनों का स्वार्थ और भविष्य छिपा हुआ है? क्या यह माना जाए कि दोनों ने एक- दूसरे के सामने सरेंडर इसलिए किया है कि दोनों को लगने लगा है कि एक-दूसरे की खिलाफत करके दोनों और पार्टी गंवा ही ज्यादा रहे हैं? या फिर आलाकमान यानी गांधी परिवार से इशारा मिल गया है कि या तो दोनों साथ हो जाओ, नहीं तो किसी तीसरे को राजस्थान में कमान सौंपकर भविष्य के नेता के रूप में तैयार किया जाएगा ? ऐसे तमाम सवाल है, जिसका जवाब अब राजनीतिक विश्लेषक कि नहीं,कांग्रेस के नेता और कार्यकर्ता भी ढूंढ रहे हैं,जो इन दोनों बड़े नेताओं के मतभेदों के चक्कर में दुश्मनी की हद तक एक-दूसरे के विरुद्ध हो गए थे और अजमेर सहित कुछ जिलों में तो दोनों गुटों के नेताओं-कार्यकर्ताओं में मारपीट और मुकदमेबाजी भी हो चुकी है। कांग्रेस के कई नेताओं का मानना है कि भले ही गहलोत और पायलट समझौते की बयानबाजी करते रहे,लेकिन निचले स्तर पर बंटी कांग्रेस को एकजुट कर भाजपा से मुकाबले के लिए खड़ा करना नामुमकिन नहीं, तो बहुत मुश्किल जरूर है।

    फिर अचानक प्रेम, मौहब्बत और सद्भाव क्यों? माना जा रहा है कि गहलोत और पायलट दोनों को अब एक-दूसरे की जरूरत महसूस होने लगी है,जबकि पार्टी को भी इनकी एकता की जरूरत है। इसमें कोई शक नहीं है कि पायलट अब राजस्थान और केंद्र में कांग्रेस की राजनीति में गहलोत से भी बड़ा चेहरा बन चुके हैं। ऐसा पहली बार हुआ है जब गहलोत लंबे समय से ( राज्य में कांग्रेस की हार के बाद) पार्टी में किसी पद पर नहीं है।अन्यथा पहले चुनाव हारने के बाद भी उन्हें केंद्र में संगठन में कोई पद आसानी से मिल जाता था। जबकि पायलट अभी राष्ट्रीय महामंत्री और छत्तीसगढ़ राज्य के प्रभारी हैं। मुख्यमंत्री पद पर बने रहने की लालसा के चलते अशोक गहलोत ने राष्ट्रीय अध्यक्ष नहीं बनने के लिए सितंबर 2022 में जो ड्रामा जयपुर में अपने समर्थक विधायकों से कराया था, उसने गांधी परिवार में उनकी इमेज को खराब कर दिया। जबकि पायलट की आज भी गांधी परिवार से करीबी है। गहलोत के तमाम बयानों और राजनीतिक नुकसान पहुंचाने की कोशिशों के बावजूद भी पायलट ने जिस तरह सब्र किया, उससे भी सोनिया, राहुल, प्रियंका उनसे प्रभावित हैं। गहलोत कांग्रेस के बड़े फंड मैनेजर रहे हैं। जो सीएम नहीं रहने के बाद नहीं रहे। ऐसे में हो सकता है अब दोनों में सहमति बनी हो या आलाकमान ने बनाई हो कि गहलोत को केंद्र में संगठन में कुछ पद देकर राजस्थान से विदा कर दिया जाएगा और पायलट को राजस्थान की कमान सौंप दी जाएगी। हालांकि यह बहुत दूर की कौड़ी है कि एऐसा हुआ तो गहलोत समर्थक पायलट के साथ जुड़ जाएंगे। लेकिन पायलट जानते हैं कि राजस्थान के कोने-कोने में जितने राजनीतिक मुखबिर अशोक गहलोत के हैं,राजस्थान पुलिस के पास भी नहीं होंगे। उनके पास पायलट ही नहीं,बलिक अन्य कांग्रेसी नेताओं के मूवमेंट की भी पल-पल की खबर पहुंचती हैं। गहलोत को अपने बेटे वैभव को भी राजनीति में सैटल करने के लिए पायलट की जरूरत होगी। बेटों की योग्यता देंखे, तो पायलट अपने पिता की विरासत को आगे बढ़ाते हुए बड़े नेता बन चुके हैं।लेकिन मुख्यमंत्री रहते हुए भी गहलोत अपने बेटे को सांसद का चुनाव नहीं जिता पाए। दौसा में आयोजित कार्यक्रम में जिस तरह कांग्रेस के नेताओं की भीड़ रही,उससे यह संकेत तो मिला ही है कि कांग्रेस आलाकमान ने भी पायलट के इस कार्यक्रम को अपना वरदहस्त दिया। राजस्थान के प्रभारी रंधावा सहित सभी आठ सांसद, 66 में से 47 विधायक और सौ के लगभग पूर्व सांसदों, विधायकों की मौजूदगी इसमें रही और ये सभी गुटों के थे।

    अब देखना होगा कि गहलोत और पायलट में यह मौहब्बत कब तक बनी रहती है और दोनों किस तरह अपने गुट के नेताओं और कार्यकर्ताओं को एक दूसरे के लिए मतभेद और दुश्मनी बुलाकर एकजुट कर सकते हैं। इसका पहला परिणाम इसी साल होने वाले निकाय चुनाव में देखने को मिलेगा कि टिकट वितरण और चुनावी मैदान में क्या होता है। वैसे कांग्रेस का अपना थिंक टैंक है। लेकिन एक सुझाव अपन भी दे सकते हैं। जिस तरह कल गहलोत और पायलट मिले, उसी तरह यह दोनों नेता एक साथ पूरे राजस्थान का दौरा करके यह संदेश दें कि वह एक है। स्थानीय नेताओं को साथ बैठाएं। अगर यह दोनों नेता एक होते हैं, सत्तारूढ़ भाजपा के लिए थोड़ी चिंता की बात जरूर होगी, क्योंकि भाजपा की चुनावी जीत में इन दोनों के मतभेदों ने भी बड़ी भूमिका अदा की थी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के कई उम्मीदवार बहुत कम वोटो के अंतर से हारे हैं और इस हार म़े गहलोत और पायलट की एक दूसरे को निपटाने की सोच थी। अजमेर भी इसका उदाहरण ह़ै। यूं जिस तरह राजस्थान में भजनलाल शर्मा की सरकार चल रही है,वह अभी भी अपना प्रभाव छोड़ने में नाकाम रही है। कई मोर्चों पर सरकार की नाकामी को कांग्रेस निकाय चुनाव में भुना सकती है। राजस्थान में सब कुछ यानि सत्ता लुटाकर कर कांग्रेस और गहलोत- पायलट होश में तो आए हैं, लेकिन इस होश में उन्हें अपने गुटों में बंटे कार्यकर्ताओं में जोश पैदा करने एक साथ लाना होगा,वरना भाजपा की जड़ें राजस्थान में और मजबूत हो जाएगी।

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