कोई किसी के साथ नहीं है

0
81
Spread the love

राजनेताओं और चापलूसों तक के चेहरे अच्छे लगने लगते हैं

सुबह उठो तो दुनिया कितनी निराशा से भरी हुई मिलती है
लेकिन धीमे-धीमे सब ठीक होने लगता है
और खोई हुई मामूली चीज़ों का मिल जाना भी आश्चर्य से भर देता है
लोग उतने बुरे नहीं लगते जितने बुरे वे हैं
राजनेताओं और चापलूसों तक के चेहरे अच्छे लगने लगते हैं
एक ख़त्म नहीं होती असुरक्षा में न्यूनतम अच्छाई की तलाश महत्त्वपूर्ण लगने लगती है
समूह में विवेक जागता हुआ नज़र आता है
और सब जगह सब कुछ के लिए थोड़ी-थोड़ी जगह बनने लगती है
साँस में साँस आने लगती है
और रंग में और बहुत सारे रंग
सुर में और सुर
सब तरफ़ हर्ष और उल्लास से भरा कोरस गूँजने लगता है

इस तरह अंततः सब कुछ ठीक होता है और तकिये पर पड़ा हुआ मस्तिष्क शिथिल

– अंततः सब कुछ ठीक हो जाने के दिन

  • अविनाश मिश्र को अपने भीतर का कवि बचाए रखने और अंततः सब कुछ ठीक हो जाने के दिन की आशा के लिए शुभकामनाएं।

कोई किसी के साथ नहीं है:

क़रीब सौ सिरों के एक समूह को एक साथ देखता हूँ—मास्क सिर्फ़ एक ने पहन रखा है, मुखौटे सबने। कोई किसी के साथ नहीं है, सब अपने साथ हैं। उनका अधिकांश अपनी-अपनी स्क्रीन के ज़रिए कुछ न कुछ सुन और देख रहा है। स्क्रीनमुक्त आँखें वक्ष-रेखाओं और नितंबों को घूर रही हैं। यों लगता है कि कोई पर्यावरण के बारे में नहीं सोच रहा, सब संभोग के बारे में सोच रहे हैं। इनके बीच राजनीति, समाजशास्त्र, लोकप्रियता और गुरुत्वाकर्षण बहुत है। मैं इसे प्रदूषण नहीं कहने पाता हूँ, कविता कहता हूँ। इस समूह से दूर हटो, तब इसके बारे में कुछ पंक्तियाँ नज़र आती हैं और एक पार्क में सत्रह ख़ाली बेंचें…

  • अविनाश मिश्र 

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here